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योजना आयोग की जगह नया क्या लाएगी सरकार
कुमार प्रशांत
Updated Mon, 14 Jul 2014 06:57 PM IST
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इस सरकार को क्या नहीं चाहिए, यह तो समझ में आ रहा है, क्या चाहिए, यह समझना टेढ़ी खीर है! योजना आयोग नहीं चाहिए, तो क्यों, सरकार ने यह नहीं बताया। इतना बड़ा फैसला लेने से पहले क्या इस पर देश में कोई विमर्श हुआ? आप ऐसा पूछें, तो जवाब शायद यह होगा कि मजबूत सरकारें विमर्श नहीं करतीं, निर्णय करती हैं!
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छनती-उड़ती खबरें बताती हैं कि कोई अजय छिब्बर साहब हैं, जो किसी इंडिपेंडेंट इवोल्यूशन ऑफिस के प्रमुख हैं, और जिन्हें सरकार ने इसका आकलन करने का ठेका दिया था कि क्या योजना आयोग की उपयोगिता रह गई है? छिब्बर साहब कौन हैं, यह तो हम नहीं जानते, पर जब छिब्बर रिपोर्ट कहती है कि कई दूसरे संस्थानों ने योजना आयोग का काम उससे अच्छी तरह व वैज्ञानिक पद्धति से संभाल लिया है, और इसलिए इसकी उपयोगिता खत्म हो गई है, तो कई सवाल खड़े हो जाते हैं।
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ऐसा नहीं है कि प्रशासन और प्रबंधन की नई व्यवस्थाओं की खोज-बीन नहीं करनी चाहिए। लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले देश में उस पर विमर्श तो होना ही चाहिए। योजना आयोग के जनक नेहरू थे, और केंद्रित विकास तंत्र की यह कल्पना उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ से मिली थी। वह राष्ट्र निर्माण का दौर था। लेकिन धीरे-धीरे सत्ता का केंद्रीकरण होता गया और नौकरशाही का बोलबाला बढ़ा। ऐसे में, योजना आयोग भी विकास की धुरी पर चलने के बजाय वित्तीय राजनीति का हथियार बनता गया। राज्यों के मुख्यमंत्री अपना-अपना बजट लेकर याचक बन, इसके दरबार में उपस्थित होने लगे, और आयोग का उपाध्यक्ष उनकी क्लास लेने लगा। मनमोहन-दौर में तो यह मोंटेक सिंह अहलूवालिया का निजी अभिक्रम-सा बन गया था, जहां से आर्थिक राजनीति का संचालन होता रहा।
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योजना आयोग को खत्म करने के बाद मोदी सरकार क्या करेगी? वह चल तो रही है उसी रास्ते, जिस रास्ते अब तक की सरकारें चली हैं। न उसने विकास के प्रतिमान बदले हैं, न योजना बनाने में राज्य सरकारों या दूसरे गुणी लोगों को जोड़ने की पहल की है। क्या मोदी सरकार विकास के इस स्वरूप से असहमत है? अगर इस सरकार की महत्वाकांक्षा सौ नए शहर बसाने की है; नदियों को जोड़ने का जिसका सपना अब तक टूटा नहीं है; जो बुलेट रेल चलाना अपनी प्राथमिकता में रखती है, उसके सामने विकास की दूसरी तस्वीर हो कैसे सकती है? गांवों को उजाड़े बिना न नए शहर बनेंगे, न नदियों को जोड़ा जा सकेगा, न बुलेट गाड़ियां दौड़ सकेंगी! फिर उस योजना आयोग से कैसा वैर, जो यही मॉडल सामने रखकर चल रही थी? फिर तो बात इतनी ही है कि आप योजना आयोग अपने लोगों से भरना चाहते थे, जो आसान नहीं था। इसलिए इसे बंद करने का फैसला लिया। अब एक दूसरा आयोग बनेगा, जिसमें कोई दूसरा मोंटेक सिंह बैठेगा।
विकास का प्रतिमान वह संरचना नहीं, जो आप खड़ी करते हैं, बल्कि वह आदमी है, जो उस संरचना को बनाता और उसका इस्तेमाल भी करता है। योजना आयोग को बदलने से वह आदमी नहीं बदलेगा। वह बदलेगा योजनाएं बदलने से!