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हमारी इंसानियत का क्या होगा?

Thu, 19 Apr 2018 06:59 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 19 Apr 2018 06:59 PM IST
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What will happen to our humanity?
सुभाषिनी सहगल अली

पिछले पंद्रह दिनों में रोज कोई न कोई ऐसी खबर छपी, जिसने मानस को झकझोर कर रख दिया है। उन्नाव में शासक दल के एक विधायक पर बलात्कार का आरोप दर्ज कराने की कोशिश में एक नाबालिग लड़की महीनों भटकती है। फिर वह मुख्यमंत्री आवास के सामने खुद को जिंदा जलाने का प्रयास करती है। उसकी शिकायत फिर भी दर्ज नहीं होती। उसके पिता के खिलाफ विधायक अपने प्रभाव से झुठे मुकदमे दर्ज करवा लेता है और कचहरी से उसे मारते हुए जेल घसीटकर ले जाया जाता है। कथित मारपीट में विधायक के भाई भी शामिल हैं। लड़की के पिता की मौत के बाद विधायक के भाई गिरफ्तार होते हैं, पर बलात्कार का मामला वहीं का वहीं रह जाता है। जनता और मीडिया के कोलाहल के बीच राज्य सरकार मामले को सीबीआई को सौंपती है। इस बीच उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करते हुए कहता है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था ढह चुकी है, और दूसरे दिन विधायक की गिरफ्तारी का आदेश दिया जाता है। तब जाकर उसे गिरफ्तार किया जाता है।


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पर बड़े सवाल रह जाते हैं। पीड़िता का परिवार बहुत गरीब है और अब कमाने वाला भी मर चुका है। सरकार अपनी तरफ से पुनर्वास और मुआवजे की बात नहीं कर रही। सर्वोच्च न्यायालय कई बार निर्देश दे चुका है कि बलात्कार पीड़ितों को राज्य सरकारों की ओर से मुआवजा मिलना चाहिए। पिछली सरकार ने इसका कुछ हद तक पालन किया और दो लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की, जो बहुत कम थी, पर मौजूदा सरकार इस पर मौन है, जबकि विधानसभा में सरकार ने ही माना है कि उसके एक साल के शासन में पिछली सरकार के आखिरी वर्ष से 761 अधिक बलात्कार, 3,400 से अधिक अपहरण और दहेज मौतों की 200 अधिक घटनाएं घटीं। पर न फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित हुए, न बलात्कारियों के मन में भय पैदा किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार पर उच्च न्यायालय की टिप्पणी का कोई असर नहीं दिख रहा। अपराध रोकने के लिए किनके इन्काउंटर हो रहे हैं? अभी एक पुलिस इंस्पेक्टर को इसलिए बर्खास्त किया गया, क्योंकि वह किसी से कह रहा था कि उसका इन्काउंटर होने वाला है, खुद बचाने के लिए उसे भाजपा के विधायक और नेता को ‘मैनेज’ करना चाहिए। सरकार उन अपराधियों के खिलाफ संगीन मामलों को समाप्त करने की पहल कर रही है, जो शासक दल के करीब हैं।

सूरत में एक अज्ञात बच्ची का शव मिला, जिसके शरीर पर 86 घाव थे। कठुआ की पीड़िता आठ साल की ही थी। उस बच्ची का अपहरण और बलात्कार एक समुदाय को भयभीत कर उसे इलाका छोड़ने के लिए मजबूर करने के लिए किया गया था। जो आरोपी पकड़े गए, उनमें एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी थे, जिसने वह धर्मस्थान बनाया था, जिसमें बच्ची के साथ बलात्कार हुआ। बलात्कार में पुलिसकर्मी भी शामिल थे, जो मामले की छानबीन कर रहे थे। उनमें एक नाबालिग और एक लड़का था, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जम्मू सिर्फ बलात्कार करने गया था। जब इनकी गिरफ्तारी हुई, तो इनके पक्ष में जुलूस निकले, जिसमें मंत्री भी शामिल थे। जब न्यायालय में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल करने का प्रयास किया, तो वकीलों की भीड़ ने उन्हें रोका। सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही चार्जशीट दाखिल की गई और आरोपी जेल गए। बच्ची का धर्म, बलात्कारियों का धर्म, मंत्रियों का दल-सब रहने दीजिए। पहले विचार कीजिए। अगर ऐसा होगा, तो हमारी बच्चियों का ही नहीं, हमारी इंसानियत का क्या होगा?

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