उस आपदा से क्या सीखा
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दो साल पहले वर्ष 2013 में 16 और 17 जून को भारी बारिश हुई थी। बादल फटने से समुद्र तल से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर आई बाढ़ से हर तरफ तबाही का मंजर था। बारिश का प्रकोप इतना ज्यादा था कि लोगों को जान बचाने तक का मौका नहीं मिला। कुछ ही मिनटों में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। क्षेत्र के भवन, मवेशी सहित पुल और सड़क सभी कुछ तबाह हो गए। फिर शुरू हुआ अब तक का सबसे बड़ा राहत और बचाव कार्य, जिसे नाम दिया गया 'ऑपरेशन सूर्य होप'। चूंकि तबाही से प्रभावित क्षेत्र की सड़कें और पुल ध्वस्त हो चुके थे, इसलिए सिर्फ हवाई मार्ग ही विकल्प था। इस राह में भी रुकने का नाम नहीं ले रही बारिश एक बड़ी बाधा बनी हुई थी। राशन, दवाएं, टैंट आदि लेकर तैयार खड़े हेलीकॉप्टर उड़ान भरते भी, तो कैसे? ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी सशस्त्र बलों के जवानों और वायुसेना ने तत्परता के साथ अपने काम को अंजाम दिया और अनेक जिंदगियों को मौत के मुंह में जाने से बचाया। जबकि उस दौरान प्रदेश के आपदा प्रबंधन विभाग की कार्यशैली निष्क्रिय साबित हुई।
सेना के बचाव और राहत अभियान से जीवित बचे सभी तीर्थयात्रियों को हादसे वाले क्षेत्रों से सकुशल निकाल लिया गया। कुछ समय तक आपदा वाले स्थानों पर राहत कार्यों में स्वयंसेवी संस्थाओं, नागरिक संगठनों, स्वयंसेवकों और निजी कंपनियों ने योगदान दिया। आखिरकार आपदा के बाद कुछ शेष बचा, तो वह थे अपने परिजनों को हमेशा के लिए खो चुके मायूस लोग। केदार घाटी के देवली गांव में 50 से अधिक पुरुषों की मौत हो गई। इस गांव को नया नाम मिला विधवाओं का गांव। ऐसी ही तस्वीर कई गांवों में देखने को मिली।
राहत कार्यों को लेकर सरकार की ओर से बयानबाजी ज्यादा और काम कम हुआ। कागजों पर योजनाएं बनाई गईं, जमीन पर काम नहीं हुआ। कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्हें देखकर लगा कि मानवीय भावनाओं का कोई मूल्य ही नहीं रह गया। केदार घाटी से दूर राजधानी देहरादून में दुख और आक्रोश का मिला-जुला माहौल था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक प्रकृति से ज्यादा मानवीय हस्तक्षेप को इस आपदा के लिए दोषी मान रहे थे। हालांकि अभी तक कोई औपचारिक अध्ययन उनकी ओर से प्रस्तुत नहीं किया गया था, पर यह बात स्वीकार कर ली गई कि वर्षों से हिमालयी संसाधनों का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया जाना इस तबाही का बड़ा कारण रहा।
दो साल बाद वहीं खड़े
आपदा के दो साल बीत चुके हैं। राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्यों में राज्य सरकार के रिपोर्ट कार्ड पर नजर डालें, तो परिणाम निराशाजनक है। भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक अफसरों की कमी और दक्षता के अभाव में पुनर्निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ। लचर तरीके से बनाई गई योजनाओं का वजूद ही नहीं है। उनका निष्पादन आधा-अधूरा और गुणवत्ता का स्तर घटिया रहा। सड़क, पुल, भवन, स्वास्थ्य, शिक्षा-कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं, जिससे प्रदेशवासियों में आत्मविश्वास पैदा हो। बेरोजगारी आज भी युवाओं के लिए चुनौती है। पहाड़ में उद्योग एक सपना है, तो स्वरोजगार पर गंभीरतापूर्वक काम नहीं किया जा रहा। हाल ही में उत्तराखंड की उस आपदा में घोटाले की खबर सुर्खियों में रही। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदेश के आपदाग्रस्त जिलों में रसूखधारी अधिकारियों ने आपदा के नाम पर सरकारी पैसे का जमकर दुरुपयोग किया। मुख्यमंत्री हरीश रावत ने घोटाले की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने प्रदेशवासियों को आश्वासन दिया है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के मामले में उत्तराखंड का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। पहले भी चर्चा में आए कई तरह के घोटालों की जांच आज तक सामने नहीं आ पाई, दोषियों को दंडित करना तो बहुत दूर की बात है। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि जून, 2013 की आपदा के दो साल बीत जाने के बाद भी समस्याएं जस की तस हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह योजनाबद्ध तरीके से कार्य न किया जाना रहा है। अब समय की मांग कार्यप्रणाली में सुधार लाने की है।
बहुत कुछ करने की जरूरत
प्रदेशवासियों की उम्मीदों पर छाई धुंध हटाने के लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। बेरोजगारी और पलायन प्रदेश के प्रमुख मुद्दे हैं। स्कूलों में शिक्षकों और अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के कारण लोगों की नाराजगी बढ़ती ही जा रही है। उत्तराखंड एक स्वच्छ छवि वाला राज्य अभी तक नहीं बन पाया है। लगातार राजनीतिक बदलाव प्रदेश के विकास में बाधा बना हुआ है। राज्य गठन के बाद से अब तक आठ मुख्यमंत्री बने, जो राजनीतिक स्थिरता लाने में नाकामयाब रहे। एक समय यह राज्य जल, जंगल और जमीन के लिए जाना जाता था, पर अब यह माफियाओं की पकड़ वाला राज्य बन चुका है।
अब भी आशा की किरण बाकी है। ईको टूरिज्म, पारिस्थितिकी, खेती-बाड़ी और बागवानी, ग्रामीण पर्यटन आदि राज्य के विकास में बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। पर्यावरणीय चिंताओं और सतत विकास की जरूरत ने एक नई सोच की आवश्यकता पैदा की है। वास्तविक मायनों में हिमालय एक संसाधन है। पर देश के विकास में हिमालय का योगदान क्या है? इसे रोजगार का जरिया कैसे बनाया जाए और हरित विकास की अवधारणा की कैसे शुरुआत की जाए? प्रदेश में पहाड़ के साथ-साथ मैदानी समुदाय के लोगों की आकांक्षाओं और जरूरतों को भी साथ लेकर आगे बढ़ा जाए, जिसके लिए प्रखर राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व चाहिए। उत्तराखंड आपदा की दूसरी बरसी पर नई सोच के साथ प्रदेश हित का संकल्प लेने की जरूरत है।
-लेखक उत्तराखंड सरकार की 108 आपातकालीन सेवा के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं