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जो बात फॉरेन रिटर्न में है...
मूलचन्द गौतम
Updated Tue, 18 Dec 2012 01:10 AM IST
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जब भी 'फॉरेन रिटर्न' का हिंदी की सोचता हूं, तो माथे पर पसीना आने लगता है। दिमाग पर बहुत जोर डालने, शब्दकोष खंगालने और जानकारों की मदद लेने बावजूद जब उसकी हिंदी करता हूं, तो वह बात नहीं बनती, जो फॉरेन रिटर्न में है। इसीलिए राष्ट्रवादी, संकीर्ण, कूढ़ मगजों के लाख विरोध के बावजूद मैं एफडीआई के पक्ष में हूं। मैं तो महात्मा गांधी के 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' नारे के भी खिलाफ था। यदि विदेश से उन्हें ऐसी चिढ़ थी, तो पढ़ने के लिए वह परदेश क्यों गए थे। अब तो तमाम लोग विदेश जाने लगे हैं।
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पड़ोस के भार्गव साब जबसे अमरीका से लौटे हैं, उनकी नाक ठिकाने पर नहीं है। उन्हें काले रंग से एलर्जी हो गई है। डॉक्टरों ने उन्हें देश छोड़ने की सलाह दी है। अब तो उन्हें देश का पानी भी नहीं पच रहा। पहले वह गर्मजोशी से हाथ मिलाते थे, अब देखते तक नहीं। उनका पप्पी तक नहीं भौंकता हर ऐरे-गेरे पर।
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अब देशभक्तों की नस्ल खतरे में है। पुराने स्वतंत्रता सेनानी समाप्तप्राय हैं। सरकार इसीलिए हर साल उनकी पेंशन बढ़ा देती है। अब उनकी कमी आपातकाल के दौरान जेल जाने वालों से पूरी की जा रही है। किसी तरह पैसा ठिकाने तो लगे। हमारे नेता मजबूरी में आम आदमी का नाम लेने को विवश हैं, वर्ना तो उन्हें घिन आती है, इन नाक पोछुओं से। सऊर नहीं खाक का, सपना है लाख का। कई लोग तो परमानेंट विदेश चले गए हैं-कभी न लौटने की धमकी देकर।
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हमारे देश का गरीब आदमी भी विदेशी माल का दीवाना है। वह शान से एस्केलेटर पर चढ़कर मॉल में जाना चाहता है, बस में चढ़ना ही नहीं चाहता। जब से उसने मेट्रो का मजा लिया है, कुछ देश के दुश्मन उसे हमेशा के लिए पटरी पर ही डाले रहना चाहते हैं। उसका भी दिल चाहता है, टीवी में दिखने वाली दुनिया का मजा लेने का। अब धोती और लंगोटी मार्का नेता उसके आदर्श नहीं। जबसे उसे पता चला है कि अमरीका में जींस मजदूरों का पहनावा है, वह भी जींस पहनकर रिक्शा चलाना चाहता है। गांधी जी का खादी भंडार तक आधुनिक हो गया है, तो देश के नागरिकों पर क्या पाबंदी है।
गरीब को गरीब बनाए रखने की इस साजिश का विरोध किसान भी कर रहे हैं। उन्हें विदेशी खाद-बीज से कोई चिढ नहीं। आर्गेनिक खेती का धंधा उन्हें खूब पसंद आ रहा है। वह भी विदेश जाने का इरादा रखता है, कोई ले तो जाए ?