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कश्मीरियत को ये क्या हो गया
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मारूफ रजा
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में हालात इन दिनों अच्छे नहीं हैं। एक तरफ जहां नियंत्रण रेखा पर अक्सर मुठभेड़ की खबरें आती हैं, वहीं घाटी में सुरक्षा बलों के साथ स्थानीय लोगों के टकराव की खबरें भी आती रहती हैं। कश्मीर घाटी के हालात अचानक नहीं बदले हैं। मुझे लगता है कि इसके पीछे चार-पांच मुख्य कारण हैं।
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लगभग डेढ़-दो दशक से वहां वहाबी संस्कृति के प्रसार को देखा जा रहा है। कुछ लोग बताते हैं कि 1996 में श्रीनगर में करीब सौ मस्जिदें थीं, लेकिन वर्ष 2000 में मस्जिदों की संख्या बढ़कर छह सौ हो गई। इन मस्जिदों का स्थापत्य कश्मीरी स्थापत्य में बने मस्जिदों से बिल्कुल अलग है। असल में कश्मीर में बहावी संस्कृति के प्रसार के लिए सऊदी अरब से पैसा आता रहा, लेकिन हमने उस पर कोई अंकुश नहीं लगाया। इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत सरकार को लगता था कि अगर हम इन पर अंकुश लगाएंगे, तो कहा जाएगा कि सरकार मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखल दे रही है। सऊदी अरब ने अपने धन के जरिये पाकिस्तान में वहाबी संस्कृति की दखलंदाजी तो बढ़ाई ही है, उसका इरादा पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सूफी संस्कृति की जगह वहाबी संस्कृति के प्रसार का है। कश्मीर में सूफी संस्कृति का प्रभाव रहा है, जो बहुत हद तक धर्मनिरपेक्ष भारतीय संस्कृति से मेल खाता है, लेकिन वहाबी संस्कृति का रास्ता बिल्कुल अलग है। वहाबी संस्कृति ने धीरे-धीरे कश्मीरियत को खत्म करना शुरू कर दिया, जिसके तहत वहां के हिंदू-मुस्लिम मिल-जुलकर सद्भाव के वातावरण में रहते थे। वहां खुदा की इबादत भी होती थी और भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना भी होती थी। लेकिन अब वहां सूफी संस्कृति और वहाबी संस्कृति के बीच संघर्ष जारी है, और यदि यह चलता रहा, तो बहुत खतरनाक होगा। कश्मीर के राजनेताओं ने इस पर अंकुश नहीं लगाया और इसे अपना वोटबैंक समझकर बढ़ने दिया। बुरहान वानी जैसे आतंकी उसी वहाबी दर्शन की उपज हैं।
इसके अलावा, मैं समझता हूं कि वहां के हालात का अंदाजा लगाने में हमारा खुफिया तंत्र भी विफल रहा है। मसलन, जब सऊदी अरब के पैसों के बल पर वहां वहाबी संस्कृति का प्रसार हो रहा था, तो खुफिया तंत्र ने गृह मंत्रालय को इसके खिलाफ कदम उठाने के लिए क्यों नहीं कहा। दूसरी बात, वहां पच्चीस साल से कम उम्र के जितने भी नौजवान हैं, उन्होंने सिर्फ संघर्ष ही देखा है, कभी अमन नहीं देखा। उन्हें अलगाववादी संगठन यही पाठ पढ़ाते हैं कि अगर लड़ोगे नहीं, तो आजादी नहीं मिलेगी। इसलिए वे ज्यादा ही आक्रामक ढंग से सड़कों पर पत्थरबाजी करते हुए दिखते हैं। वर्षों से जारी पत्थरबाजी को लेकर भी खुफिया तंत्र ने सख्त कदम उठाने की सिफारिश नहीं की। क्या उन्हें पता था कि पत्थर फेंकने वाले बच्चों को हुर्रियत से पैसे मिलते हैं, अगर पता था, तो उस पर रोक क्यों नहीं लगाई। तीसरी बात, जब बुरहान वानी मारा गया था, तो खुफिया तंत्र को यह अंदाजा नहीं था कि उसका इतना प्रतिरोध होगा। अगर पता होता, तो उसकी तैयारी की जाती। चौथी बात, कश्मीर में बहुत से ऐसे केबल टीवी वर्षों से चल रहे हैं, जो पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाते हैं। पर हमने उस पर रोक नहीं लगाया। ये सब खुफिया तंत्र की विफलता को दर्शाते हैं।
चाहे हिजबुल मुजाहिद्दीन हो या हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, दोनों पाकिस्तान के इशारे पर चलते हैं। हिजबुल जहां आतंकी गतिविधियों के जरिये घाटी में अशांति भड़काता है, वहीं हुर्रियत कश्मीर के लोगों का असली प्रतिनिधि होने का दावा करता है। दोनों के अन्नदाता, पाकिस्तान सरकार और उससे ज्यादा वहां की सेना है। हाल ही में हिजबुल के सरगना सैयद सलाहुद्दीन के एक इंटरव्यू से यह स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों की फंडिंग करता है। जब केंद्र सरकार हुर्रियत नेताओं से बात नहीं करती, तो हिजबुल को वहां आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए कहा जाता है। हिजबुल कश्मीर में आग भड़काता है, तो हुर्रियत वहां पाकिस्तानी झंडे लहराता है।
जहां तक केंद्र सरकार की बात है, तो मैं समझता हूं कि कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं रही। भाजपा की मौजूदा केंद्र सरकार की बस यही इच्छा थी कि किसी तरह वहां पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बन जाए। यह तो सबको पता था कि पीडीपी और भाजपा, दोनों की विचारधारा अलग है। पीडीपी अलगाववादियों की समर्थक रही है, तो फिर उसके साथ सरकार बनाने का फैसला क्यों किया गया। इस गठबंधन सरकार के चलते वहां के हालात और बिगड़े। महबूबा मुफ्ती वहां के हालात पर नियंत्रण करने में पूरी तरह से विफल रही हैं।
इसके अलावा, पाकिस्तान को लेकर भी सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं दिखी। पहले तो मोदी सरकार ने कहा कि हम अपने पड़ोसी मुल्क के साथ बातचीत जारी रखेंगे, लेकिन फिर बातचीत से मुकर गई। जब हम यह जानते थे कि यूपीए सरकार के दौरान बातचीत की तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका, तो आपको उससे अलग कोई रणनीति बनानी चाहिए थी। लेकिन हम पुरानी नीति पर ही चलकर पाकिस्तान के साथ छुपम-छुपई खेलते रहे।
अब अगर मोदी सरकार ने सख्त कदम उठाने का फैसला किया है, तो मुझे लगता है कि अगले कुछ महीनों में राजनीतिक, सैन्य और सामाजिक स्तर पर कुछ नई पहल होगी। इस रणनीति के लिए मुझे लगता है कि अमेरिका और यूरोप से प्रोत्साहन मिला है। अगले कुछ महीनों में मुझे यह भी लगता है कि राज्य सरकार को बर्खास्त करके वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाएगा। कश्मीर समस्या का समाधान तभी होगा, जब अब आप सख्त कदम उठाते हुए वहां विकास के एजेंडे को बढ़ाएंगे। अगर कश्मीर के लोगों को तरक्की का एहसास होगा, तो फिर वे क्यों पाकिस्तान की शह पर आजादी के नारे लगाएंगे। वहां के हालात को स्थिर करने के बाद विकास के रास्ते ही कश्मीर के अंदरूनी हालात सुधरेंगे।