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जिसे कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा हथियार बनाया था उस राफेल मुद्दे का क्या हुआ?

Mon, 14 Oct 2019 07:05 AM IST
तवलीन सिंह तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Published by: तवलीन सिंह Updated Mon, 14 Oct 2019 07:05 AM IST
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What happened to the Rafale issue?
तवलीन सिंह

वायुसेना के पहले राफेल विमान पर पिछले सप्ताह जब रक्षा मंत्री को शस्त्र पूजा करते देखा, तो वह 'घोटाला’ याद आया, जिस पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने चुनाव जीतने की अपनी सारी उम्मीदें बांध रखी थीं। वे आम सभाएं याद आईं, जिनमें राहुल गांधी चिल्ला-चिल्लाकर कहा करते थे कि 'चौकीदार चोर है।' कानों में फिर गूंजा वह आरोप कि नरेंद्र मोदी ने 30,000 करोड़ रुपये चुराकर अनिल अंबानी की जेब में डाल दिए हैं। उस घोटाले का क्या हुआ? आज जब यह लड़ाकू विमान भारत आने वाला है, तो कांग्रेस के आला नेता वही आरोप फिर क्यों नहीं लगा रहे हैं?


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इन ख्यालों में मैं डूब ही रही थी कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मेरे पुराने दोस्त सलमान खुर्शीद का वक्तव्य आया कि कांग्रस लोकसभा चुनाव में अपनी हार के कारणों का अभी तक विश्लेषण ही नहीं कर पाई है, क्योंकि राहुल गांधी मैदान छोड़कर भाग गए। मेरी अपनी राय है कि राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी व्यक्तिगत तौर पर लेकर अच्छा किया, पर मैं यह भी मानती हूं कि राजनीति कभी भी ‘पार्ट टाइम’ नौकरी नहीं हो सकती। जो ईमानदारी से जनता की सेवा करने निकल कर आते हैं, वे कभी छोड़ने की बात नहीं करते। सो राहुल गांधी पर सवाल उठता है कि क्या वह वास्तव में जनता की सेवा करने आए थे या अपने परिवार की विरासत बचाने?

पिछले सप्ताह जब पहले राफेल विमान को भारत लाने की तैयारी हो रही थी, तब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष फिर से विदेश यात्रा पर निकल गए। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव सिर पर हैं, सो कई लोगों ने पूछा कि क्या यह छुट्टी पर जाने का समय था? उनके साथियों ने जवाब दिया कि राजनेताओं का भी निजी जीवन होता है। यह बात गलत है। दूसरे लोकतांत्रिक देशों में जब कोई बड़ा राजनेता यात्रा पर कहीं जाता है, तो उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक करके जाता है। ऐसा कुछ तो सुरक्षा के कारण किया जाता है और कुछ इसलिए कि यह जानना जनता का अधिकार है कि उनके राजनेता कहां और किसलिए जाते हैं।

राहुल गांधी कई बार बिना कोई खबर दिए चुपके से विदेश चले जाते हैं। सो लोगों का उनके नेतृत्व पर सवाल उठाना स्वाभाविक है। विशेष तौर पर इसलिए कि कांग्रेस दशकों से गांधी परिवार के नाम से जानी जाती है। कांग्रेस के दौर में प्रधानमंत्री चाहे कोई भी रहा हो, सब जानते थे कि असली सत्ता किसके हाथ में रही है। सो आज अगर कांग्रेस का यह हाल है कि वफादार नेता भी उसको छोड़कर जा रहे हैं, तो सिर्फ इसलिए कि गांधी परिवार में आज अजीब बिखराव-सा दिखने लगा है।

हाल ही में मेरी बात एक ऐसे राजनीतिज्ञ से हुई, जिसका कांग्रेस से पुश्तैनी रिश्ता है। बड़ी मायूसी से उसने मुझे कहा कि परिवार के अंदर अलग-अलग खेमे बन गए हैं, जिनमें कुछ लोग ‘पीजी’ (प्रियंका गांधी) के साथ हैं, तो कुछ लोग ‘आरजी’ (राहुल गांधी) के साथ। कांग्रेस के बुजुर्ग राजनेताओं का तीसरा खेमा भी है, जो अब भी मानता है कि भविष्य में कांग्रेस का पुनर्जीवन सोनिया गांधी के नेतृत्व में ही होगा। ऐसे हाल में किससे पूछा जाए कि जिस रक्षा सौदे को कांग्रेस ने पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था, वह इतनी जल्दी कैसे गायब हो गया है? किससे पूछा जाए कि कहां हैं वे 30,000 करोड़ रुपये, जिसको लेकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने इतना हंगामा किया था? बोफोर्स घोटाला अभी तक एक दुखी रूह की तरह मंडराता है देश की राजनीति में, सो राफेल कैसे गायब हो गया?

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