फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   What got sugarcane farmer

गन्ना किसानों को क्या मिला

Fri, 25 Jul 2014 08:14 PM IST
वी एम सिंह
वी एम सिंह Updated Fri, 25 Jul 2014 08:14 PM IST
विज्ञापन
What got sugarcane farmer

पैकेज के बाद फिर पैकेज। किसानों के गन्ना मूल्य भुगतान के नाम पर चीनी मिलों को और कितने पैकेज की जरूरत होगी? हाल ही में बीते पेराई सीजन में केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार चीनी मिलों को करीब 15,000 करोड़ रुपये का पैकेज दे चुकी हैं, लेकिन किसानों का भुगतान ज्यों का त्यों बकाया है। इसके बावजूद चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर अगले पेराई सीजन, यानी आगामी अक्तूबर से चीनी मिलें चलाने में असमर्थता जाहिर कर दी है। चीनी मिलों ने सरकार से एक और पैकेज मांगा है। मतलब साफ है, चीनी मिलों की नीयत में खोट है। उन्हें पता है कि केंद्र और राज्य सरकार को केवल किसानों के नाम पर ब्लैकमेल किया जा सकता है। इसी का चीनी उद्योग फायदा उठा रहा है, जबकि नुकसान किसानों का हो रहा है।

विज्ञापन


चीनी मिलों को इतना बड़ा पैकेज मिलने के बावजूद गन्ना किसानों का 6,500 करोड़ रुपये का बकाया है। इसके अलावा इस रकम पर ब्याज बाकी है, सो अलग। आइए देखें कि क्या वाकई चीनी मिलों को किसी पैकेज की जरूरत थी? उत्तर प्रदेश में जहां बीते गन्ना पेराई सत्र 2013-14 में खाद, डीजल, बीज और कीटनाशकों के दामों में लगातार बढ़ोतरी हुई, वहीं चीनी मिलों के दबाव में राज्य सरकार ने सीजन 2012-13 की तरह 280 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना मूल्य ही बरकरार रखा। इसके बाद भी मिल मालिकों ने 17-18 नवंबर, 2013 को मिलें बंद करने का नोटिस दे दिया। सरकार मिल मालिकों के आगे बेबस थी। इसका फायदा उठाते हुए कोल्हू एवं क्रेशरों ने गन्ने के दाम 140-150 रुपये से घटाकर 90-100 रुपये प्रति क्विंटल कर दिए।
विज्ञापन


जब कोई रास्ता न बचा, तो राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने हाई कोर्ट में गुहार लगाई। कोर्ट ने तीन दिसंबर तक मिलें चलाने के निर्देश दिए। मिल मालिक घबराए, क्योंकि याचिका में मिल न चलाने पर सरकार द्वारा मिलों का अधिग्रहण करने की गुजारिश थी। मिल मालिकों को चीनी मिलें हर हालत में चलानी थी, पर उन्होंने चतुराई से आगामी चुनाव का डर दिखाकर किसानों के नाम पर केंद्र और राज्य सरकार, दोनों से अलग-अलग पैकेज हासिल कर लिए। जहां केंद्र सरकार ने 6,600 करोड़ रुपये का ऋण बिना ब्याज के दिया, वहीं राज्य सरकार ने इंट्री टैक्स, परचेज टैक्स और सोसाइटी कमीशन आदि मिलाकर करीब 1,200 करोड़ रुपये का पैकेज जारी कर दिया। परंतु, इससे भी मिल मालिकों का पेट नहीं भरा। आखिर, सरकार ने मिल मालिकों की बात मानते हुए फैसला किया कि मिलें 260 रुपये प्रति क्विंटल की दर से चीनी का अग्रिम भुगतान करेंगी, बाकी 20 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान मिलें बंद होने के बाद किया जाएगा। लगभग 8,000 करोड़ रुपये के पैकेज और शर्तों के साथ करीब डेढ़ महीने की देरी से उत्तर प्रदेश में गन्ना पेराई शुरू हो पाई।
विज्ञापन
विज्ञापन


इससे पहले रंगराजन समिति की सिफारिशों के मुताबिक लेवी शुगर की व्यवस्था खत्म करके चीनी को नियंत्रण मुक्त कर दिया गया। इससे चीनी उद्योग को 3,000 करोड़ रुपये का सालाना लाभ मिला। कहा गया था कि लेवी चीनी की बाध्यता समाप्त होने से चीनी मिलों को 3,000 करोड़ का जो फायदा होगा, उससे किसानों को गन्ना मूल्य समय पर दिया जाएगा। रंगराजन कमेटी की सिफारिशें दो बिंदुओं पर आधारित थीं। पहली, चीनी उद्योग को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना और दूसरा, गन्ना खरीद मूल्य को चीनी के बाजार भाव से जोड़ना। जब किसानों ने चार दिसंबर, 2012 को रंगराजन कमेटी की सिफारिशों के विरोध में संसद का घेराव किया, तो केंद्र सरकार ने चीनी मिल मालिकों की गुजारिश पर केवल चीनी उद्योग को अपने नियंत्रण से मुक्त किया। गन्ने का खरीद मूल्य राज्य सरकार को ही सौंप दिया। इसमें दो प्रमुख सवाल उठते हैं, जब केंद्र सरकार ने चीनी मिलों पर से अपना नियंत्रण समाप्त कर लिया, तो फिर पैकेज किस आधार पर दिए गए? साफ है कि इसका मकसद शायद चीनी मिलों को नाजायज फायदा पहुंचाना था।

इस तरह के तमाम पैकेज लेने के बाद भी मिल मालिकों ने किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया। किसानों को लगा कि चुनाव के दरम्यान सरकार दबाव डालकर भुगतान करवा देगी, लेकिन शायद उन्हें यह मालूम नहीं था कि मिलों के सामने सरकार बेबस है। चुनाव में हर पार्टी ने गन्ना मूल्य भुगतान को बड़ा मुद्दा बनाया। नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ने यूपी की हर चुनावी सभा में गन्ना भुगतान का वायदा किया था। जब किसानों को कहीं से किसी तरह की राहत नहीं मिली, तब आखिकार विगत 30 मई को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक कड़े फैसले में किसानों को लगभग 10,000 करोड़ रुपये का भुगतान कराने का आदेश राज्य सरकार को दिया।

देखने की बात यह है कि चीनी मिलें गन्ना खरीदने के बाद लगभग हर साल कोर्ट में चीनी के दाम कम होने का हवाला देकर गन्ना मूल्य घटाने की गुहार लगाती हैं। यह सही नहीं है। इसी साल देखें, तो पिछले साल के मुकाबले चीनी के भाव में लगभग 400 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है। फिर, चीनी उद्योग अकेले चीनी उत्पादन से नहीं चलता, बल्कि सहउत्पादों जैसे शीरा, खोई, मैली आदि से लगभग 40 फीसदी गन्ने का भाव मिलता है। तभी तो पिछले दस वर्षों में मिल मालिक दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। राज्य में निजी चीनी मिलों की संख्या 35 से बढ़कर 99 तक पहुंच गई है। अगर सरकारों को किसान के नाम पर पैकेज ही देना हो, तो सीधा किसानों को ब्याज मुक्त पैकेज दे। प्रश्न यह उठता है कि हमेशा किसानों के कंधों पर रखकर ही बंदूक क्यों चलाई जाती है?


कहना अतिशयोक्ति नहीं कि गन्ना किसान आज बदहाली के दौर से गुजर रहा है। उसके सामने रोजी-रोटी के लाले हैं। कोर्ट के आदेश के एक महीने बाद भी चीनी मिलों पर किसानों का साढ़े हजार करोड़ रुपये बकाया है। इसी कारण जहां बेटे-बेटियों की शादियां टल रही हैं, वहीं बच्चों के स्कूल-कॉलेज छोड़ने तक की नौबत आ रही है। इसी मानसिक दबाव के कारण कई किसान आत्महत्या तक जैसा कदम उठा चुके हैं। अगर सरकार वास्तव में किसानों का हित चाहती है, तो उसे मिल मालिकों के दबाव से मुक्त होना होगा। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, केवल अपने द्वारा बनाए गए कानूनों को मजबूती से लागू करने की जरूरत भर है। क्या सरकार इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाएगी?

(लेखक राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक हैं)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed