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नहीं जानते होंगे, अकबर ने ली थी राजपूतों के बारे में यह कसम
आचार्य चतुरसेन
Updated Fri, 17 Apr 2015 03:25 PM IST
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उन दिनों सम्राट अकबर की हुकूमत थी। सभी धर्मों का आदर, दूसरे धर्म-संप्रदाय के लोगों पर धर्म जाति का भेद भुलाकर विश्वास, केवल प्रतिभा, शौर्य और निष्ठा को ही वफादारी की कसौटी मानने जैसी नीतियों के कारण प्रजा में राजा की लोकप्रियता बढ़ रही थी।
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अकबर के दरबार में कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या बताने के लिए बेहिचक आ सकता था। एक बार युवावस्था की दहलीज पर कदम रख चुके दो वीर राजपुताना से आए। बादशाह के दरबार में उन्होंने सिर्फ इतना ही बताया कि वे राजपूत हैं और शाही सेना में शामिल होना चाहते हैं।
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उन वीरों ने अपनी बहादुरी के कुछ किस्से भी बादशाह को सुनाए। बादशाह यों तो बहुत पारखी थे, लेकिन पता नहीं, उस वक्त उनके दिमाग में क्या सूझा कि उन्होंने पूछ लिया, किस तरह विश्वास करें कि आप राजपूत हैं? प्रमाण तो दीजिए।
उन युवकों ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कमर तक हाथ उठाया और कमान में रखी तलवारें खींच ली। उसी क्षण दोनों युद्ध करने लगे। लंबे संघर्ष में दोनों ने एक दूसरे को बराबर की टक्कर दी। बादशाह उनकी तलवारबाजी देखकर दंग रह गए। दो-ढाई घड़ी बीत जाने पर भी दोनों में से कोई पीछे हटता या कम पड़ता नहीं दिखाई दिया। बादशाह ने कहा, हो गई आपके कौशल की परीक्षा। अब रहने दीजिए।
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तलवारों की झंकार के आगे बादशाह की आवाज उन्हें सुनाई नहीं दी। कुछ ही पल और बीते होंगे कि दोनों ने एक-दूसरे के सीने में अपनी-अपनी तलवारें भोंक दीं। बादशाह अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। उनके मुंह से उफ्फ की आवाज निकली और बस। इस घटना के बाद बादशाह अकबर ने फिर कभी किसी राजपूत को शौर्य प्रमाणित करने के लिए नहीं कहा।