फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   What does Tabla say today Ustad Zakir Hussain explained relationship with the musical instrument

आज तबला क्या कहता है: उस्ताद जाकिर हुसैन ने बताया... वाद्ययंत्र के साथ रिश्ता जरूरी, ताकि वह आज्ञा का पालन करे

Tue, 17 Dec 2024 05:25 AM IST
अमर उजाला Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 17 Dec 2024 05:25 AM IST
विज्ञापन
सार
आप चाहते हैं कि वाद्ययंत्र आपकी आज्ञा का पालन करे, तो सबसे पहले आपको उसे स्वीकार करना होगा।
loader
What does Tabla say today Ustad Zakir Hussain explained relationship with the musical instrument
उस्ताद जाकिर हुसैन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संगीत की दुनिया में, और खासकर जब बात पारंपरिक संगीत की हो, तो जल्दबाजी करना ठीक नहीं है। आपको अपने वाद्ययंत्र के साथ रिश्ता बनाने के लिए समय चाहिए। वाद्ययंत्र की आत्मा से जुड़ना होता है, तब जाकर चीजें होती हैं। ऐसा नहीं होता कि आज आप नया सितार खरीदें और कल जाकर मंच पर उसे बजाना शुरू कर दें। सितार और आपके बीच एक रिश्ता बनना चाहिए। कुछ महीनों तक इसे बजाने के बाद ही आप सहज महसूस करेंगे कि हां, अब मैं इसे मंच पर बजा सकता हूं। मैं तबले के साथ क्या करता हूं? मुझे लगता है कि खुलापन और स्पष्टता ही है, जो हम इससे निकालकर दर्शकों-श्रोताओं के बीच लाते हैं। मैं जो प्रस्तुत करता हूं, वह अर्थपूर्ण होना चाहिए, चाहे वह वाद्ययंत्र और संगीतकार के बीच दिल से दिल की बातचीत हो या विचार प्रक्रिया में निःसंकोचपन का भाव हो या मानदंडों के बारे में निश्चिंतता हो, आपका संगीत यथासंभव स्पष्ट होना चाहिए।



मुझे एक प्यारी घटना याद आ रही है। किशन महाराज जी मंच पर जाने वाले थे, तभी किसी ने कहा, महाराज जी, एक शानदार संगीत कार्यक्रम होना चाहिए। उन्होंने जवाब दिया, देखेंगे भैया, आज तबला क्या कहता है। यह सभी वाद्ययंत्रों के साथ होता है- गिटार, पियानो, बास या वायलिन। आपको वाद्ययंत्र के साथ एक रिश्ता बनाने की जरूरत है, क्योंकि आप चाहते हैं कि वह आपकी आज्ञा का पालन करे। उसे आपको स्वीकार करना होगा, और आपको दिखाना होगा कि वह आपके साथ विश्वास की छलांग लगाने के लिए तैयार है। उदाहरण के लिए, मुझे तबले की चमड़ी में एक निश्चित मात्रा में लचीलापन चाहिए-ताकि जब मैं इस पर थाप दूं, तो यह एक निश्चित तरीके से प्रतिक्रिया और प्रतिध्वनि करे। स्वर में मंद्र, तिहरा और मध्यमा की एक निश्चित मात्रा होनी चाहिए। मेरे हाथ का दबाव किसी और के हाथ के दबाव से अलग है, इसलिए यह चमड़ी की मोटाई को प्रभावित करता है-चमड़ी इतनी मोटी होनी चाहिए कि यह उस तरह से झुक सके, जैसा मैं चाहता हूं।


उस्तादों का कहना है कि आपका अपने वाद्ययंत्रों के साथ ऐसा रिश्ता होना चाहिए कि वाद्ययंत्र घुटने टेककर आपसे कहे कि आप जो चाहें करें, जो स्वर निकालना चाहें, निकालें-यानी आप अपने वाद्य पर नियंत्रण रखें, उसे अपने अनुसार बजाएं एवं उस पर महारत हासिल करें। एक और विचारधारा है, जो मानती है कि वाद्ययंत्र संगीत प्रस्तुत करने का एक माध्यम मात्र है। इससे मुझे एक और दिलचस्प घटना याद आती है। सुल्तान खान साहब और मैं एक बार कैलिफोर्निया में अली अकबर खान साहब की कक्षा में बैठे थे और उन्होंने कहा, सुल्तान, क्या तुम अपनी सारंगी लाए हो? क्या तुम कुछ बजाओगे? सुल्तान भाई ने जवाब दिया, खान साहब, मुझे खेद है कि मैं उसे होटल में छोड़ आया हूं। मैं बस आपको नमस्ते कहने आया था। अली अकबर खान साहब ने जोर देकर कहा, हमारे म्यूजिक स्टोर में एक सारंगी है, चलो उसे निकालते हैं। उन्होंने सारंगी निकाली और उसे नीचे रख दिया। सुल्तान भाई ने उसे देखा और कहा, खान साहब, यह सारंगी टूट गई है। इसकी हालत खराब है। मुझे नहीं लगता, मैं इसे बजा पाऊंगा। अली अकबर साहब मुस्कराते हुए बोले, सारंगी अगर ठीक नहीं है, तो क्या हुआ? हाथ तो तुम्हारा है। सुल्तान भाई बोले, ओह! फिर उन्होंने सारंगी को जितना हो सका, उतना ठीक किया और उसे बजाने लगे।  (‘जाकिर हुसैनः ए लाइफ इन म्यूजिक इन कन्वर्सेशन विद नसरीन मुन्नी कबीर’ के अंश)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed