फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   What changed Nirbhaya Tragedy

निर्भया कांड के बाद क्या बदला

Thu, 22 Dec 2016 06:43 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 22 Dec 2016 06:43 PM IST
विज्ञापन
What changed Nirbhaya Tragedy
सुभ‌ाषिनी सहगल अली

निर्भया के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार और उसके बाद उसके साथ की गई बर्बरता, 16 दिसंबर की ठंडी रात को उसके अर्धनग्न शरीर को बस के बाहर फेंका जाना, उसका वहां पर तड़पना, उसकी व्यथा का कुछ लोगों द्वारा देखा जाना और फिर आंखें फेर लेना, ये सब हमारे मस्तिष्क में जैसे बस गए हैं। फिर उसके साथ हुए अत्याचार के खिलाफ सड़कों पर उतरे लड़के-लड़कियों पर सरकार ने जिस तरह बर्फीले पानी की बौछार की, लाठियां बरसाईं और उन्हे थानों में ले जाकर जलील किया, उस सबने व्यवस्था के संवेदनहीन रवैये का पर्दाफाश किया था। लेकिन विरोध बढ़ता ही गया। निर्भया तो नहीं बची, पर यह उम्मीद जागी कि शायद ऐसा फिर किसी के साथ नहीं होगा।

विज्ञापन


चार साल बाद विगत 16 दिसंबर को तमाम महिला संगठन के सदस्य निर्भया की बहादुर मां के साथ जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए। वह बोलीं, कुछ भी तो नहीं बदला। हुआ तो बहुत कुछ था। बदला भी बहुत कुछ था। पूरी की पूरी सरकार बदल गई। जो लोग तब की सरकार को कोस रहे थे, उन्होंने जनता को आश्वासन दिया कि उनके राज्य में महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित होंगी। उन्होंने अपनी सरकार बना डाली। लेकिन महिलाओं पर होने वाली हिंसा और बढ़ गई। वर्ष 2012 में बलात्कार की संख्या 24,923 थी, जो 2016 में बढ़कर 33,707 हो गई। अब रोज बलात्कार के साठ नए मामले दर्ज किए जाते हैं।
विज्ञापन


यह सब तब है, जब सरकार के अनुसार, 40 से 60 प्रतिशत मामले सामने आते ही नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि महिला के साथ जो कुछ भी होता है, उसके लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। उनके मुकदमे भी वर्षों तक चलते रहते हैं। निर्भया कांड के बाद बहुत सारे फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू करने का वायदा किया गया था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। जब पीड़ित युवती अदालत जाती है, तो उसे ‘बलात्कार वाली लड़की’ कहकर पुकारा जाता है। वह मन ही मन हजारों बार हजारों मौतें मरती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार सरकारों से कहा है कि वे बलात्कार पीड़ितों को मुआवजा दें, उनके पुनर्वास के लिए कुछ करें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ है। केंद्र सरकार ने ऐसी महिलाओं की मदद के लिए जो ‘निर्भय फंड’ बनाया था, उस फंड को भी वह खर्च नहीं कर पाई है। न उस सरकार ने, न इस सरकार ने!

फिर भी कुछ लोग हैं, जो न्याय के लिए लड़ते हैं। कुछ महिला संगठन हैं, कुछ वकील हैं और कुछ बहादुर पीड़ित महिलाएं और उनके परिवार के लोग हैं। लखनऊ की आशियाना मामले की बारह वर्षीया पीड़िता, जो कूड़ा बीनने वाले की बेटी थी, दस साल तक उन रईसजादों से लड़ी, जिन्होंने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया था। उनमें सपा के एक बड़े नेता का भांजा भी था। उस लड़की का पूरा साथ उसके गरीब मां-बाप ने दिया। जनवादी महिला संगठन के सदस्य भी उनके साथ खड़े रहे। पचासों बार उस लड़की ने अपना बयान एक के बाद दूसरे न्यायालय के समक्ष दिया। उसने पढ़ाई भी शुरू कर दी।


साफ है कि सरकारों और व्यवस्था को न्याय करने के लिए मजबूर करना पड़ेगा। साहस के साथ जिंदा रहने का हक हर बलात्कार पीड़िता को दिलाने के लिए कुछ करना होगा। सबको मिलकर यह करना होगा। हरियाणा की मंजीत ने, जो जनवादी महिला समिति की नेता है और एक कवयित्री भी, लिखा है : छीनकर कुछ लम्हे, मौत की कोख से, जो बेखौफ कहा उसने, मैं चाहती हूं जीना। मरने से ठीक पहले, गढ़ दी निर्भया ने, बेबाक जीने की एक नई परिभाषा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed