{"_id":"625f40e4a0cdc9e479824cf49bea23fb","slug":"what-about-the-resolution-of-parliament","type":"story","status":"publish","title_hn":"संसद के उस संकल्प का क्या हुआ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
संसद के उस संकल्प का क्या हुआ
विवेक शुक्ला
Updated Fri, 21 Feb 2014 07:35 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत की कश्मीर नीति की रोशनी में 22 फरवरी, 1994 एक बेहद खासमखास दिन है। बीस साल पहले इसी दिन संसद ने एक प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर अपना हक जताते हुए कहा था कि यह भारत का अटूट अंग है। पाकिस्तान को वह हिस्सा छोड़ना होगा, जिस पर उसने कब्जा जमा रखा है।
विज्ञापन
संसद का वह प्रस्ताव मोटे तौर पर इस तरह था, यह सदन पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकियों के शिविरों पर गंभीर चिंता जताता है। इसका मानना है कि पाकिस्तान की तरफ से आतंकियों को हथियारों और धन की आपूर्ति के साथ-साथ आतंकियों को भारत में घुसपैठ करने में मदद दी जा रही है। सदन भारत की जनता की ओर से घोषणा करता है कि पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। भारत अपने इस भाग के विलय का हरसंभव प्रयास करेगा। भारत में इस बात की पर्याप्त क्षमता और संकल्प है कि वह उन नापाक इरादों का मुंहतोड़ जवाब दे, जो देश की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ हों; और मांग करता है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के उन इलाकों को खाली करे, जिसे उसने कब्जाया हुआ है। भारत के आंतरिक मामलों में किसी भी हस्तक्षेप का कठोर जवाब दिया जाएगा।
विज्ञापन
कोई नहीं जानता कि बीते बीस वर्षों में देश ने पीओके के विलय की दिशा में क्या कदम उठाए। बीते दिनों नवाज शरीफ ने अमेरिका दौरे के दौरान बराक ओबामा और दूसरे अमेरिकी नेताओं से कश्मीर मसले के हल का आग्रह किया। जब जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट अंग है, तब वह कश्मीर मसले का क्या हल चाहते हैं?
विज्ञापन
विशेषज्ञों का मानना है कि शिमला समझौते की रोशनी में, जिसमें नियंत्रण रेखा को दोनों देशों के बीच सरहद के रूप में स्वीकार किया गया था, संसद में पारित प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है। 1972 में वह समझौता प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के वजीरे आजम जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुआ था। उस समझौते के बाद अब दोनों देशों के नक्शे नहीं बदल सकते। उल्लेखनीय है कि जिसे हम पाक अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है, वह जम्मू का हिस्सा था, कश्मीर का नहीं। इसलिए उसे कश्मीर कहना ही गलत है। वहां की जुबान कश्मीरी न होकर डोगरी और मीरपुरी का मिश्रण है।
अब चूंकि भारत और पाकिस्तान परमाणु अस्त्रों से सुसज्जित देश हैं, इसलिए इस मसले के सैन्य समाधान की भी उम्मीद नहीं है। अगर इतिहास के पन्ने पलटें, तो पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत का पक्ष साफ हो जाएगा। विभाजन के बाद कश्मीर के महाराजा हरी सिंह भारत में अपने राज्य के विलय के प्रस्ताव को मान गए थे। विलय के उपरांत भारत को तत्कालीन कश्मीर राज्य के वर्तमान भाग पर अधिकार मिला। भारत का दावा है कि महाराजा हरी सिंह से हुई संधि के परिणामस्वरूप पूरे कश्मीर पर भारत का अधिकार है। इस कारण भारत का दावा पूरे कश्मीर पर सही है।
ऐसे में, हमारी सरकार से यह पूछना चाहिए कि संसद में पारित प्रस्ताव को अमली जामा पहनाने के लिए वह क्या किसी तरह की कूटनीतिक पहल कर रही है। क्या उसे पाक अधिकृत कश्मीर के भारत में विलय के लिए युद्ध भी मंजूर है? यह क्यों न माना जाए कि सरकार ने इस संबंध में जो प्रस्ताव पारित किया था, वह देश की आंखों में धूल झोकने के समान था।
अब तो पीओके में चीन की भी बड़ी उपस्थिति है। चीन के प्रधानमंत्री ली केचियांग के साथ हुई बातचीत के बाद नवाज शरीफ ने जिन आठ समझौतों पर दस्तखत किए, उनमें पीओके से होते हुए 200 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने का समझौता भी है। पीओके से गुजरने वाले पाक-चीन आर्थिक गलियारे से चीन का रणनीतिक हित जुड़ा है। इस सुरंग के बनने से चीन की पश्चिम एशिया स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज तक पहुंच सुगम होगी, जहां से दुनिया के एक तिहाई तेल का परिवहन होता है।
बीते दो दशकों के दौरान केंद्र में संयुक्त मोर्चा, भाजपा और कांग्रेस की सरकारें रहीं। पर किसी की तरफ से कभी देश को यह बताने की चेष्टा नहीं हुई कि पाक अधिकृत कश्मीर पर संसद के प्रस्ताव का क्या हुआ।