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पश्चिम एशिया ः चालीस साल बाद

Mon, 24 Sep 2018 06:05 PM IST
थॉमस एल. फ्रीडमैन
थॉमस एल. फ्रीडमैन Updated Mon, 24 Sep 2018 06:05 PM IST
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West Asia: Forty years later
कैंप डेविड संधि

इस हफ्ते पश्चिम एशिया में शांति के सबसे बड़े समझौते कैंप डेविड संधि के चालीस वर्ष पूरे हो गए हैं। तब से हम कितना आगे बढ़े हैं, इसका आकलन करने पर आप बेचैन हो उठेंगे। शांति के बजाय इस्राइल और फलस्तीन के रिश्ते बिल्कुल खत्म होने के करीब आ गए हैं। बिना किसी नाटकीय प्रगति के इस बात की वास्तविक आशंका है कि फलस्तीन में फिलहाल जो भी शासन है, वह खत्म हो जाएगा और इस्राइल को पश्चिमी तट में रह रहे पच्चीस लाख लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी। तब इस्राइल को यह फैसला करना होगा कि एक या दो वैध प्राधिकरण के साथ शासन करना है या नहीं, इसका मतलब होगा कि इस्राइल को द्वि-राष्ट्रवाद या नस्लवाद में से एक का चुनाव करना होगा, ये दोनों यहूदी लोकतंत्र के लिए विनाशकारी हैं। इस क्षेत्र में अनेक लोगों और संगठनों का रवैया गलत है। हमास गाजा में मानव बलिदान की रणनीति अपना रहा है-इस्राइली सीमा की बाड़ के खिलाफ वह प्रदर्शनकारियों के एक के बाद एक झुंड को निरुद्देश्य लड़ने या और ज्यादा ध्यान केंद्रित करने के लिए झोंक रहा है, जो शर्मनाक है।


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इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान का मुकाबला करने और सीरिया में रूस की स्थिति मजबूत करने में कमाल की रणनीति दिखाई। लेकिन फलस्तीन के मुद्दे पर उनके पास केवल पीआर रणनीति है। वह अपनी सारी बुद्धि का उपयोग उस तरीके को खोजने में करते हैं कि कैसे फलस्तीनियों की प्रगति को रोकने के लिए अमेरिका को दोषी ठहराया जाए। द्वि-राष्ट्रवाद और नस्लवाद के भयानक विकल्पों से फलस्तीनियों को कैसे अलग रखा जाए, इसको लेकर उनके पास कोई विचार नहीं है।

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिनके पास न सिर्फ इस्राइल समर्थक रणनीति है, बल्कि दक्षिणपंथी यहूदी निवासी समर्थक रणनीति भी है। शेल्डन एडेलसन जैसे धुर दक्षिणपंथी बड़े यहूदी दानदाता और ईसाई धर्म के प्रचारक को खुश करने के लिए ट्रंप ने अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से येरूशलम स्थानांतरित कर दिया, इस्राइल से बदले में कुछ मांगे बगैर। अब वह फलस्तीन में विकास कार्यों, अस्पतालों एवं शिक्षा कार्यक्रमों के लिए अमेरिकी सहायता खत्म कर रहे हैं, क्योंकि फलस्तीनी जेरेड कुशनर की अस्पष्ट  शांति योजना के प्रति उत्सुक नहीं हैं। हालांकि ट्रंप निरंतर बन रही इस्राइली बस्तियों के बारे में एक शब्द भी नहीं बोल रहे। इस बीच पश्चिमी तट में फलस्तीनी प्राधिकरण ने एक रणनीति अपना ली है कि 'जब तक आप खत्म नहीं हो जाते, मैं कुछ नहीं बोलने वाला।' उसने ट्रंप के हास्यास्पद एकतरफा दृष्टिकोण, उनके दूतावास स्थानांतरण और पश्चिमी तट की सुरक्षा में सहयोग के बदले इस्राइल या अमेरिका से प्रशंसा न मिलने की हताशा में क्रोधित होकर बातचीत से इन्कार कर दिया है। इसी समय हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 78 फीसदी फलस्तीनी मानते हैं कि फलस्तीनी प्राधिकरण में भ्रष्टाचार है। प्राधिकरण को अब नई रणनीति की जरूरत है, क्योंकि चुनौती देने और शिकार होने की पुरानी रणनीति काम नहीं कर रही। ऐसे में, प्राधिकरण को बातचीत की मेज पर लौटने की जरूरत है।
 
ट्रंप की टीम कहती रही है कि वह अपनी शांति योजना पर अमेरिका के अरब सहयोगियों का समर्थन हासिल करना चाहती है। लेकिन अगर यह शांति योजना फलस्तीनियों की न्यूनतम मांगें पूरी नहीं करतीं, तो अरब समर्थन नहीं करेंगे। और अरब के हस्तक्षेप के बिना फलस्तीनी उन मांगों से पीछे हटने वाले नहीं हैं। फलस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास को अमेरिका के चार अरब सहयोगियों-मिस्र, जॉर्डन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास जाना चाहिए और प्रस्ताव रखना चाहिए कि अगर अमेरिकी शांति योजना में दो प्रावधान शामिल हों, तो उन्हें ट्रंप-कुशनर योजना के लिए सामूहिक रूप से 'हां' कहना चाहिए। ये दो प्रावधान हैं-पश्चिमी तट में अलग-अलग शहरों का समूह नहीं, बल्कि आपस में मिला हुआ फलस्तीनी राज्य मिलना चाहिए, और पूर्वी येरूशलम में फलस्तीनियों को कुछ संप्रभुता मिले, जहां पहले से ही तीन लाख अरब रहते हैं। अगर ट्रंप की टीम ने फलस्तीन-अरब की इस पहल को स्वीकार कर इसे अपनी योजना का हिस्सा बना लिया, तो यह नेतन्याहू को भी कुछ फैसले लेने के लिए बाध्य करेगा। क्योंकि न तो फलस्तीनी राज्य के सवाल पर उनके पास कोई विचार है और न ही येरूशलम में फलस्तीनियों की संप्रभुता पर।
 
यदि कुशनर-ट्रंप योजना में अरब-फलस्तीन की न्यूनतम मांगों को शामिल कर लिया गया, तो बीबी को या तो इसे अस्वीकार करना होगा या अपने कुछ धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक समर्थकों को हटाना होगा और अमेरिकी शर्तों पर बातचीत के लिए एक नई सरकार बनानी होगी। अगर वह ऐसा चाहते हैं, तो निश्चित रूप से बाद वाला विकल्प चुनेंगे। पश्चिम एशिया मामलों के अनुभवी वार्ताकार डेनिस रॉस कहते हैं, 'फलस्तीनी पश्चिमी तट में अपने शासी निकाय को खोना नहीं चाहते। और ट्रंप प्रशासन तथा इस्राइल वहां पूरी तरह शून्य उभरने नहीं देना चाहते, क्योंकि पश्चिम एशिया में सभी खाली जगहों पर बुरे लोग काबिज होते हैं।' रॉस आगे कहते हैं, वार्ता के लिए फलस्तीनी और अमेरिका के अरब सहयोगियों द्वारा न्यूनतम ढांचा फलस्तीनियों को वार्ता की मेज पर लाएगा और ट्रंप प्रशासन पर विश्वसनीय योजना को लागू करने या गंभीर न होने के खुलासे का दबाव बनाएगा। और यह इस्राइल को एक साथी और कुछ भाग्यशाली विकल्प प्रदान करता है।
 
चालीस साल पहले अनवर सादात, मेनाखेम बेगिन और जिमी कार्टर द्वारा किए गए समझौते के बारे में आप चाहे जो कहें, लेकिन कैंप डेविड में वे एक बिंदु पर पहुंचे थे, जबकि उनके पास सिर्फ कठिन विकल्प थे-और उन्होंने सही विकल्प का चुनाव कर समझौता किया। हमें एक बार फिर एक अच्छा अवसर मिला है। फलस्तीनियों के पास विनाश या शांति का विकल्प है, जबकि इस्राइल के पास फलस्तीन से अलग होने या द्विराष्ट्रवाद अथवा नस्लवाद को अपनाने का विकल्प है। कुशनर और डोनाल्ड या तो गंभीर हों और इस्राइल समेत सभी पक्षों के प्रति कठोर रुख अख्तियार करें या फिर अपने घर बैठें। शांति के लिए सभी को सच्चाई बताने की जरूरत होती है।

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