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अधूरी तैयारियों से नहीं निपट सकते हम
अजय साहनी
Updated Tue, 16 Dec 2014 08:52 PM IST
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सिडनी के ‘लिंट चॉकलेट’ कैफे की घटना को मुंबई की पुनरावृति बताया जाना अचंभे में डालता है। मुंबई में आतंकियों ने एक खास योजना के साथ पूरी तैयारी करके हमले को अंजाम दिया था। मगर ऑस्ट्रेलिया में एक सिरफिरे ने जज्बाती होकर लोगों को बंधक बनाया। ऐसा भी नहीं लगता कि आतंकवाद की किसी खास मुहिम का वह हिस्सा था। फिर भी इस घटना को ऐसे देखा जा रहा है, जैसे आतंक का साया वहां पहली बार पड़ा हो। सच तो यह है कि पहले से ही कहा जाता रहा है कि ऑस्ट्रेलिया में अल कायदा का प्रभाव बना हुआ है।
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असल में, दुनिया के तमाम देशों में आतंक अपनी तरह से पसरा हुआ है। हर देश की परिस्थितियों के अनुरूप आतंकी अपने मंसूबों के साथ रणनीति बनाते हैं। नब्बे के दशक के बाद आतंकवाद बकायदा एक तंत्र के साथ अपनी उपस्थिति का एहसास करा रहा है। कभी वह अल कायदा के रूप में ताकतवर होता है, तो कभी इस्लामिक स्टेट के रूप में। यह एक तरह का ग्लोबल जेहाद है। उसकी शक्ति में छिटपुट उतार-चढ़ाव जरूर आते हैं, उसकी दिशा भी बदलती रहती है, मगर विफल कोशिशों के साथ भी आतंकी अपने हौसले और इरादे जताते रहे हैं। लिहाजा सिडनी की घटना के संदर्भ में आतंकवाद के खतरे के फैलाव को लेकर जो उबाल दिख रहा है, उससे हटकर हमें यह सोचना चाहिए कि क्या वास्तव में भारत आतंकियों की किसी बड़ी वारदात को रोकने के लिए तैयार है। आतंकी अगर अत्याधुनिक हथियारों के साथ हमारे देश में आते हैं, तो हम उन्हें किस कदर चुनौती दे पाएंगे? यहां यह सवाल कोई मायने नहीं रखता कि मुंबई की घटना से हमने कैसे निपटा और ऑस्ट्रेलिया के सुरक्षा तंत्र ने सिडनी की घटना से कैसे निपटा। क्योंकि दोनों घटनाओं में बड़ा फर्क है।
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ऐसे कई उदाहरण हैं, जो हमें बताते हैं कि किसी देश की सरकार ने आतंक की किसी बड़ी घटना का सफलतापूर्वक मुकाबला किया है। याद कीजिए उस घटना को, जब युगांडा में फलीस्तीनियों के एक समूह ने इस्राइली यात्रियों को बंधक बना लिया था। युगांडा में ईदी अमीन के शासन के दौरान इस्राइल ने जिस तरह इस संकट को खत्म किया और अपने बंधकों को छुड़ाया, वह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। रूस में भी स्कूली बच्चों को आतंकियों के कब्जे से छुड़ाया गया था। क्या हम ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार हैं? जवाब शायद नहीं में होगा। इतिहास के इन पन्नों से तुलना न भी करें, तो अभी पेशावर में जिस तरह एक सैनिक स्कूल पर हमला किया गया है, क्या ऐसे हादसों को रोकने के लिए हमारा तंत्र सक्रिय है? इसका जवाब भी न में ही होगा।
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दरअसल, मुंबई के 26/11 हमले के बाद सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने को लेकर कई बातें कही गई थीं। लेकिन दुर्भाग्य से हमने दिखावे भर का काम किया। हमने एनआईए बनाया। आर्म्ड कार खड़ी कर दी। लेकिन इससे आगे कुछ नहीं सोचा। आज भी यह बात मन में कौंधती है कि कैसे 800-900 जवानों की सीआरपीएफ की टुकड़ी पर पचास नक्सली भारी पड़ जाते हैं। तकनीक, तंत्र, रणनीति- प्रायः हर चीज में हमारे पास विफलता के सिवाय और कुछ नहीं होता। सबसे अहम बात यह कि इन तमाम हालातों के बावजूद सियासत, सेना और पुलिस में समन्वय नहीं बिठ पाता। निश्चय ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी सांविधानिक शक्ति होने के कारण संसद की है। मगर हमारा राजनीतिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया है। राजनेताओं में जूझने और आतंकवाद से लड़ने की इच्छा ही नहीं दिखती। हालांकि केंद्र में नई सरकार बनने के बाद इस दिशा में पहल करने की बात जरूर कही गई है, मगर इसका परिणाम भी भविष्य के गर्भ में ही है।
आतंकवाद का फैलाव किस रूप में हो रहा है, इसे हाल की तीन घटनाओं से समझा जा सकता है। बंगलूरू से गिरफ्तार मेहदी मसरूर बिस्वास का आईएस से संदिग्ध जुड़ाव, सिडनी के कैफे में लोगों को बंधक बनाया जाना और पाकिस्तान के सैनिक स्कूल में बच्चों को मारना- इन घटनाओं का सीधा अर्थ है कि आंतकवादी घटनाओं का स्वरूप बढ़ रहा है। लिहाजा ऐसी घटनाओं पर चौंकने के बजाय हमें इन चुनौतियों से निपटने के बारे में सोचना चाहिए। मुंबई हमले के बाद कुछ तेजी दिखाने के बावजूद हम ठहर-से गए हैं। बेशक हम कह सकते हैं कि पिछले एक दशक में आतंकी घटनाओं में कुछ कमी आई है। मगर इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि यह हमारे समाज में अब भी मौजूद है और वक्त-बेवक्त हमें डराता रहता है।
- काउंटर टेररिज्म के विशेषज्ञ और द इंस्टीट्यूट फॉर कन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के कार्यकारी निदेशक