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बजट से हम नहीं डरते

Fri, 01 Mar 2013 10:23 PM IST
गोपाल चतुर्वेदी
गोपाल चतुर्वेदी Updated Fri, 01 Mar 2013 10:23 PM IST
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we are not afraid to budget

मध्यवर्गीय जीवन क्या डर का एक उबाऊ उपन्यास है? किसी और को लगे या न लगे, पर हमें तो यही लगता है। और लगने की वजह भी है। असल में, डरने का अध्याय बचपन से ही शुरू हो जाता है। उसका खलनायक स्कूल का मास्टर है। वह क्लास में हमेशा ऐसे सवाल पूछता है, जिनके जवाब हमें नहीं पता। क्लास में सबसे पीछे बैठो, तब भी उस खलनायक की नजर हम पर ही होती है। नतीजतन डांट-डपट और पिटाई। इतना ही काफी नहीं है।

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हमारे होमवर्क से भी वह असंतुष्ट है। वह हमेशा धमकाता रहता है कि हमारी नाकामी के बारे में पिता जी को ‘रिपोर्ट’ कर देगा। क्लास के अंदर से बचे, तो बाहर क्लास का ‘दादा’ है, जो हमसे गेंद ही नहीं छीनता, बल्कि हमारा टिफिन भी चट कर जाता है। कॉलेज-यूनिवर्सिटी में भी डर से राहत नहीं है। हमें छात्रावास का अनुभव है। जीवन में उधार का अनवरत सिलसिला वहीं से शुरू हुआ है। चैन हरने को क्या-क्या नहीं है वहां। लड़कियां, यूनियन के चुनाव, सिगरेट, कॉफी हाउस जैसे सताने के अनेक मसले हैं। इम्तहान का डर तो बहुत बाद की शै है। फिर परीक्षा के नतीजे के बाद भविष्य का भय है।
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प्रयाग विश्वविद्यालय के उस समय के छात्रों को रोजगार के तीन-चार किस्म के विकल्प उपलब्ध थे। मसलन, अगर कोई टॉपर टाइप है, तो यूनिवर्सिटी या किसी कॉलेज में प्राध्यापन। बेकारी का पर्याय दूसरा एम.ए. या शोध। एजी. ऑफिस में क्लर्की, नहीं तो प्रतियोगिता परीक्षाओं के माध्यम से आईएएस आदि में कहीं नियुक्ति। हमारे साथियों में से हालांकि कुछ नेता भी बने लोहिया जी के प्रभाव में। पर राजनीति को धंधे का दर्जा तब तक नहीं दिया गया था।
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नतीजतन ज्यादातर लोगों ने उधर रुख नहीं किया। अगर करते, तो उनमें से अनेक लोगों की पांचों उंगलियां आज घी में होतीं और सिर कड़ाही में। उल्लेखनीय है कि इन सब में इंतजार का अंतराल अनिश्चय के कारण डर के संचार का बायस बनता है। परीक्षा तो परीक्षा है। कौन भरोसा कर सकता है कि नतीजा क्या होगा? सबसे अधिक डर उन पहले के डिग्रीयाफ्ताओं को देखकर लगता है, जो कॉफी हाउस में बैठकर कॉफी के प्याले पीकर बेकारी के दिन काटते हैं, और दूसरों में इतना अपराध-बोध जगाते हैं कि वे उनका बिल अदा करने से खुद को रोक नहीं सके।

हम इतना जानते हैं कि नौकरी पाकर कोई ऐसा तुर्रम खां नहीं बनता कि डर की फाख्ता उससे कहीं दूर जा उड़े। डर अपना स्थायी सहचर है। दिन हो या रात, यह हर वक्त दिल के कोने में अपना अड्डा बनाए रखता है। अब हमें हर फाइल से डर लगता है। कहीं गलत प्रस्ताव पर चिड़िया बन गई, तो विजिलेंस-सीबीआई धर दबोचने को कमर कसे है। सरकार में ईमानदारों की ऐसे भी खैर नहीं है। फिर जांच एजेंसियों का तो कर्तव्य ही निरीह और बेगुनाह शिकार ढूंढना है। बेईमानों से वह भी खौफ खाती है। कदाचारियों पर बड़ों का वरदहस्त है।

दफ्तर के अंदर और बाहर भी डर से मुक्ति नहीं है। आजकल न दफ्तर में सुंदर लड़कियों की कमी है, न दफ्तर के बाहर। लेकिन किसी को जी भर के देख नहीं पाते। किसी ने ताकते देख लिया तो? किसी ने पत्नी से इस अवांछित हरकत की शिकायत कर दी तो? वह बड़े बाप की बेटी हैं और सत्ता से हमारा इकलौता संपर्क।


साल दर साल महंगाई से जूझने के बाद हम अब जाकर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह जीवन का शाश्वत सच है। हर व्यक्ति की नियति यही है कि कमाई जरूरतों के अनुपात में हमेशा कम ही पड़े। फिर महंगाई की शिकायत क्या करना! मूल्यवृद्धि पर क्यों रोना! कीमतों की प्रवृत्ति बढ़ने की है। वह बजट से पहले ही हम आम आदमी को कहां बख्शती है, जो हम बजट को कोसें? आतंक अब अपनी आदत में शुमार है। सच कहें, तो वित्त मंत्री भी तो आर्थिक मोर्चे पर डर ही पैदा करते हैं। लेकिन हम उसके बजट से क्यों डरें? वर्षों से सह रहे हैं, फिर सह लेंगे!

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