फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   we are journlist, not politician

हम पत्रकार हैं राजनेता नहीं

Sun, 08 Sep 2013 07:25 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 08 Sep 2013 07:25 PM IST
विज्ञापन
we are journlist, not politician

अजीब इत्तफाक था। जिस दिन नरेंद्र मोदी के तथाकथित गुनाहों का पुलिंदा खोलने की हर तरह से कोशिश की गई थी पिछले सप्ताह, उसी दिन खबर मिली न्यूयॉर्क से कि वहां की एक अदालत ने सोनिया गांधी को सम्मन भेजा है। जिस 'जुर्म' को लेकर सोनिया जी को पेश होने का आदेश दिया गया, वह यह है कि उन्होंने उन लोगों को बचाने का काम किया, जिन पर आरोप है 1984 में सिखों के कत्ल-ए-आम में हिस्सा लेने का।

विज्ञापन


मुकदमा कहां तक चलेगा, कौन कह सकता है, लेकिन मामला आगे बढ़े या न बढ़े, उसने याद तो हम राजनीतिक पंडितों को दिला दिया है कि राजीव गांधी के नेतृत्व में वही हुआ था सिखों के साथ दिल्ली में, जो गुजरात में हुआ था 2002 में।
विज्ञापन


सच तो बल्कि यह है कि गुजरात के दंगे में हिंदू और मुसलमान, दोनों मरे थे। दिल्ली में जो हिंसा हुई इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, उसमें एक भी हिंदू का नाम नहीं आया था मरने वालों में। दुनिया यह भी जानती है कि राजीव गांधी ने उस हिंसा को सही ठहराया था यह कहकर कि जब बड़ा पेड़ गिरता है, धरती हिलती है। दुनिया यह भी जानती है कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने उसका जवाब देते हुए कहा था, बच्चे हैं। जानते नहीं कि धरती जब हिलती है, तो पेड़ गिरते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


कहने का मतलब यह है मेरा कि नरेंद्र मोदी अगर इतने बड़े अपराधी हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाया जाना चाहिए, तो यही बात राजीव गांधी के बारे में भी कही जा सकती थी। लेकिन इस बात को ऐसा भुला चुकी हैं सोनिया जी कि हर दूसरे दिन कांग्रेस के प्रवक्ता कहते फिरते हैं टीवी पर कि मोदी अपराधी हैं, हत्यारे हैं। यही बात कहते फिरते हैं ‘सेक्लूयर’ राजनीतिक दलों के लोग, जिनको कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं है।

हम जैसे राजनीतिक पंडित भी मोदी का नाम सुनते ही ऐसे बहक जाते हैं कि भूल जाते हैं अक्सर कि हम पत्रकार हैं, राजनेता नहीं। पिछले सप्ताह जब एक ही दिन डी जी वंजारा ने अपना पत्र अखबारों में प्रकाशित होने दिया और कांग्रेस ने दिल्ली में पत्रकारों को बुलाकर स्टिंग वाली वह सीडी दी थी, हमने इन खबरों को वैसी ही अहमियत दी, जैसी अहमियत किसी भी बड़ी खबर को दी जाती है। कांग्रेस की पत्रकारों से भेंट को लाइव कवरेज दी गई और वंजारा साहिब के पत्र को सुर्खियों में छापा गया देश भर के अखबारों में। ऊपर से हर समाचार चैनल पर वंजारा के पत्र पर लंबी-चौड़ी बहस हुई।

मेरी समझ में यह नहीं आता कि अगर हम इतनी आसानी से मोदी पर लगा सकते हैं हत्यारा होने का इल्जाम, तो राजीव गांधी पर कभी क्यों नहीं लगा? इस पर विचार करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची हूं मैं कि हम मीडिया वाले कांग्रेस के प्रचार का हिस्सा बन चुके हैं। दिल्ली स्थित पत्रकारों को नरेंद्र मोदी से नफरत है, जबकि पत्रकारों को कभी पक्षपात नहीं करना चाहिए।

पक्षपात के इस खेल में बड़े-बड़े संपादक शामिल हैं और जाने-माने टीवी एंकर भी। हाल यह है कि अगर हम जैसा कोई राजनीतिक पंडित इतना ही कह दे कि अगर नरेंद्र मोदी गुनाहगार है, तो राजीव गांधी भी गुनाहगार थे, तो फट से लग जाता है हम पर सांप्रदायिक होने का इल्जाम। लेकिन आउटलुक के पूर्व संपादक विनोद मेहता जब स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं कि उनकी नजरों में सोनिया गांधी के अलावा किसी राजनेता में गरीबों के प्रति सहानुभूति नहीं, तो उनके बारे में कोई नहीं कहता कि पत्रकारिता के दायरे से बाहर निकल रहे हैं वह।


डीजी वंजारा ने अपने पत्र में लिखा है कि फर्जी मुठभेड़ करने का निर्देश उनके पास मुख्यमंत्री के दफ्तर से आया था। वह यह भी लिखते हैं कि इस तरह के काम सिर्फ इसलिए किए, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि उनके भगवान नरेंद्र मोदी उनको हर हाल में बचाने का काम करेंगे। हम मीडिया वालों ने यह पत्र पढ़ने के बाद यह पूछने की कोशिश भी नहीं की कि जेल में वंजारा को कंप्यूटर कैसे उपलब्ध हुआ। यह भी नहीं पूछा हमने कि उनका पत्र प्रकाशित करने में मदद किसने की। हमारे लिए बस यह काफी था कि मोदी का एक पुराना साथी बन गया है उनका दुश्मन। यह पत्रकारिता है या राजनीति?

क्या ऐसा करके हम पाठकों के साथ धोखा नहीं कर रहे हैं? ऐसे सवाल मुझे इन दिनों बहुत सताते हैं, बहुत शर्मिंदा करते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed