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सहमति से निकलता रास्ता
सुभाष गाताडे
Updated Wed, 21 Feb 2018 03:55 PM IST
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सुभाष गाताडे
धर्म की दुहाई देते हुए जहां छोटे-छोटे मसलों को बड़े बवाल में बदल देने की जिन दिनों हवा चल रही हो, उस वक्त मुफ्फरनगर से आई यह खबर ताजा बयार मालूम पड़ती है। मुजफ्फरनगर में नेशनल हाइवे पर संधावली गांव के पास रेलवे लाइन पर पुल निर्माण का काम अधूरा पड़ा था, जिसके चलते न केवल पैदल यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता था, बल्कि जान भी जोखिम में रहती थी। दरअसल पुल के नीचे स्थित अल्पसंख्यक समुदाय के प्रार्थनास्थल और शिक्षा संस्थान के चलते काम पूरा नहीं हो पा रहा था।
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पिछले दिनों पुलिस प्रशासन, स्थानीय सांसद एवं मुस्लिम समुदाय के तमाम लोगों की मौजूदगी में उपरोक्त मस्जिद और मदरसे को स्थानांतरित करने पर अमल हुआ। जब आस्था की दुहाई देते हुए व्यापक जनहित के प्रस्तावों की मुखालफत करना आम होता जा रहा है, वहां ऐसी कोशिशें काबिलेतारीफ हैं।
पिछले ही साल मुंबई के उपनगर माहिम में स्थानीय निवासियों और नगर प्रशासकों के बीच अभूतपूर्व सहयोग की मिसाल सामने आई, जब इलाके में सड़कों के किनारे बने आठ प्रार्थनास्थलों को हटा या स्थानांतरित कर दिया गया, क्योंकि वे यातायात या पैदल यात्रियों की आवाजाही में बाधा पैदा कर रहे थे। इनमें देश के तीन प्रमुख धर्मों से जुड़े प्रार्थनास्थल शामिल थे।
उच्च अदालत के आदेश पर संपन्न की गई इस कार्रवाई को अंजाम देने के लिए अधिकारियों ने इन प्रार्थनास्थलों के ट्रस्टियों से कई बैठकें कीं और उन्हें बताया कि इनका प्रतिस्थापन किस तरह जनहित में है।
ऐसी पहल एक अन्य हस्तक्षेप की याद ताजा करती है, जब आम नागरिकों के संगठित हस्तक्षेप के चलते एक-दो नहीं, बल्कि एक हजार से अधिक अवैध प्रार्थनास्थलों को वहां प्रशासन ने हटा दिया था। दरअसल यह सिलसिला शुरू हुआ था, एक सामाजिक कार्यकर्ता (श्री भगवान रैयानी) द्वारा वर्ष 2002 में दायर जनहितयाचिका के बाद। समूचे शहर में अवैध प्रार्थनास्थलों की लगातार बढ़ती जा रही तादाद की परिघटना से चिंतित होकर - जिनके चलते आम जनता को विभिन्न किस्म की असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा था - यह याचिका दायर की गई थी। एक साल के अंदर ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए बृहन्मुम्बई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के आला अधिकारियों को निर्देश दिया कि वह शहर भर में फैले अवैध मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों या अन्य धार्मिक स्थलों को हटा दें। आम नागरिकों की सूझबूझ के ऐसे प्रसंग बरबस देश के ऐसे अन्य अनुभवों पर नए सिरे से रोशनी डालते हैं। मध्य भारत के चर्चित शहर जबलपुर को लें, जहां मुल्क के किसी भी अन्य शहर की तरह विभिन्न धर्मों के अनुयायी रहते हैं, वहां पर डेढ़ साल के अंतराल में 168 धार्मिक स्थल प्रतिस्थापित किए गए! शहर के यातायात एवं सामाजिक जीवन को तनावमुक्त बनाए रखने के लिए सभी आस्थाओं से संबंधित लोगों ने इसके लिए मिल-जुलकर काम किया और ‘सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश की।
जबलपुर की इस नायाब पहल के पहले ‘मंदिरों के शहर’ कहे जाने वाले दक्षिण के मदुरई ने भी कुछ साल पहले अपने यहां इसी किस्म की कार्रवाई की थी। ऐसी तमाम खबरें अपने क्षेत्रों तक सीमित रह गईं, शेष अवाम को पता नहीं चल सका कि यदि सही ढंग से समझाया जाए, तो जनसाधारण आस्था के प्रश्न को जनहित के मातहत करने को तैयार हो जाते हैं।