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अन्न की बर्बादी भी एक साजिश
सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Tue, 30 Apr 2013 03:19 PM IST
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इस वर्ष गेहूं की 9.23 करोड़ टन बंपर पैदावार का अनुमान है। केंद्रीय भंडारण निगम और भारतीय खाद्य निगम के सरकारी और गैर सरकारी गोदामों की क्षमता 5.79 करोड़ टन है। पहले ही 6.54 टन खाद्यान्न बचा हुआ, जिसमें 3.78 करोड़ टन गेहूं और 2.76 करोड़ टन धान शामिल है। इस खाद्यान्न का शेष हिस्सा खुले में या पॉलिथीन कवच में रखा हुआ है। ऐसे में इस वर्ष गेहूं के सरकारी खरीद लक्ष्य 4.4 करोड़ टन को कहां रखा जाएगा?
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अपने देश में इन्हीं कुप्रबंधों के कारण दो करोड़ 10 लाख टन अनाज, जिसकी कीमत 58,000 करोड़ रुपये होगी, प्रति वर्ष सड़ जाता है। यह पूरे ऑस्ट्रेलिया के अन्न उत्पादन के बराबर है। कृषि मंत्री ने मात्र 50 लाख टन अनाज निर्यात कर भंडारण की जगह बनाने की जो बात की है, वह खरीद लक्ष्य की तुलना में कुछ भी नहीं है। ऐसे में हमें अन्न भंडारण और वितरण में व्याप्त उस खोट को ढूंढने का प्रयास करना चाहिए, जिसके कारण अनाज के होते हुए भी विगत वर्ष की तुलना में गेहूं मूल्य में 20 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। जबकि सरकारी निगमों के पास जितना गेहूं है, वह बफर स्टॉक नियमों के अनुसार तीन गुना ज्यादा है।
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यह विडंबना ही है कि एक ओर अनाज गोदामों में जगह न होने के कारण सड़ रहा है, तो दूसरी ओर गरीब भूखों मरने को अभिशप्त हैं। अनाजों के सड़ाने का एक अर्थशास्त्र यह भी देखा गया है कि 12 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीदे गए गेहूं को सड़ाकर 6.20 प्रति किलो की दर से शराब कंपनियों को बेच दिया जाता है। यानी जितना अधिक अन्न सड़ेगा, शराब कंपनियों को उतना ही अधिक लाभ होगा। अतिरिक्त खाद्यान्न खरीद कर किसानों को समर्थन मूल्य देने, आपदा, अकाल या जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित करने के उद्देश्य से स्थापित भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए सार्थक पहल नहीं की है।
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नतीजा, न तो हम अतिरिक्त उत्पादन को गोदामों में सुरक्षित रख पा रहे हैं और न वक्त-जरूरत जनसामान्य को उपलब्ध करा कर भुखमरी रोक पा रहे हैं। सरकारी नीतियों के अनुसार किसानों को समर्थन मूल्य देने के लिए एफसीआई को कुल उत्पादन का 15-20 प्रतिशत गेहूं तो खरीदना ही पड़ेगा। बेशक खरीदा हुआ अन्न खुले में रख कर सड़ा दिया जाए और सस्ते में शराब माफियाओं को सौंप दिया जाए। यही जनकल्याणकारी व्यवस्था का चेहरा है!
दरअसल देखा जाए तो अनाज से शराब या ईंधन उत्पादन के लिए रास्ता निकालने के बहाने उन्हें सड़ाने या नष्ट करने का खेल वैश्विक स्तर पर खेला जा रहा है। इंस्टीट्यूशन ऑफ मैकेनिकल इंजीनियर्स की वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में जितना अनाज पैदा होता है, उसमें से करीब-करीब आधा अनाज ही मनुष्यों के काम आ पाता है। अमेरिका और यूरोप में जितना अन्न बर्बाद किया जाता है, उससे बाकी दुनिया की भूख मिटाई जा सकती है। अमेरिका अपने उत्पादित अन्न का 40 प्रतिशत फेंक देता है और ब्रिटेन में साल भर में 83 लाख टन अन्न कूड़े में डाल दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका में भूखे नहीं हैं। पूरे विश्व में 2010 में 92 करोड़ 50 लाख लोगों को भरपेट अन्न नहीं मिला। ऐसे में वैश्विक स्तर पर भूखों के प्रति व्यवस्था का क्रूर चेहरा दिखाई देता है ।
सरकार को कारगर कदम उठाना होगा कि किसी भी दशा में उत्पादित अन्न बर्बाद न होने पाए। अगर सरकार के पास अन्न भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है, तो उसे खरीदकर सड़ाने से अच्छा होगा कि किसानों को समर्थन मूल्य की दर से कुल उत्पादन के 15 प्रतिशत के बराबर आर्थिक सहायता दे दी जाए और अन्न को उन्हीं के पास छोड़ दिया जाए। इससे महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और देश का अन्न बर्बाद होने के बजाय उत्पादनकर्ता के उपयोग में आ जाएगा।
दूसरा तरीका यह अपनाया जा सकता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत प्रत्येक कार्डधारक को हर माह के बजाय एक ही साथ छह माह का राशन दे दिया जाए। इससे जहां एक ओर गोदाम खाली होंगे, वहीं अनाज के रखरखाव पर खर्च कम आएगा। आज एक किलो अनाज के रखरखाव पर 4.40 रुपए का वार्षिक खर्च आता है। ऐसे में अनाज के बेहतर उपयोग की व्यवस्था किए बिना, खरीदकर सड़ा देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।