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दीवालें
नई दिल्ली
Updated Sat, 23 Feb 2013 11:23 PM IST
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बिना कान दिए, बिना रियायत, बिना शरम
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उन्होंने मेरे चारों ओर दीवालें चिन दी, मोटी और ऊंची।
और अब मैं यहां बैठ महसूस करता हूं नाउम्मीदी
मुझे कुछ और सूझता नहीं : मेरा यह भाग्य कुतरता है मन---
क्योंकि कितना कुछ था बाहर करने को मेरे पास।
जब वे चिन रहे थे दीवालों को, ओह! क्यों नहीं मैंने तवज्जो दी?
लेकिन मैंने कभी नहीं सुना राजगीरों को, एक हलचल तक नहीं।
उन्होंने मुझे बाहरी दुनिया से अलग बंद कर दिया अननभूत तरह से।
कवाफी, यूनानी कवि
(अनुवाद-पीयूष दईया)