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इस तरह चार जन्म का इंतजार चार पल में खत्म हुआ

Wed, 18 Mar 2015 12:01 PM IST
धर्मरक्षित
धर्मरक्षित Updated Wed, 18 Mar 2015 12:01 PM IST
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waiting for four year ended in four second

बुद्ध उस समय मृत्युशैय्या पर थे। उनके विषय में अप्रिय आशंका से डरकर सुभद्र नामक परिव्राजक शालवन में, जहां भगवान बुद्ध विश्राम कर रहे थे, जा पहुंचे और आनंद से कहा, अपनी धर्मसंबंधी कुछ शंकाओं को यदि मैं इस समय न मिटा सका, तो वे फिर कभी न मिट सकेंगी। मुझे बुद्ध के दर्शन कराइए।

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आनंद ने उन्हें रोकते हुए कहा, यह शंका समाधान का समय नहीं है। भगवान निर्वाण-शैय्या पर हैं। उन्हें कष्ट मत दें। यह सुनकर सुभद्र सिर्फ दर्शन के लिए ही प्रार्थना करने लगे। आनंद ने उन्हें फिर रोका। इस संवाद की ध्वनि बुद्ध के कानों में भी पहुंची। उन्होंने आवाज लगाई, आनंद, सुभद्र को आने दो। वह ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से आया है, मुझे कष्ट देने के लिए नहीं। सुभद्र बुद्ध के पास पहुंचे। बुद्ध के उपदेश सुनकर वह बोले, मैं बौद्ध धर्म और संघ की शरण में आना चाहता हूं।
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बुद्ध ने कहा, सुभद्र, संघ का नियम है कि किसी दूसरे संप्रदाय का प्रव्रजित व्यक्ति यदि बौद्ध संघ में आना चाहे, तो उसे चार मास तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह सुनकर सुभद्र ने कहा, भंते, चार मास तो क्या, मैं चार वर्ष और चार जन्म तक भी प्रतीक्षा करने को तैयार हूं। बुद्ध ने तत्काल कहा, आनंद, सुभद्र को अभी प्रव्रजित करो। वह संघ के लिए निर्धारित अनुशासन की सीमा से बाहर चला गया। आनंद ने सुभद्र को प्रव्रजित किया। इसके बाद तथागत ने कहा, सुभद्र ही मेरा अंतिम शिष्य हुआ। इसके बाद इस शरीर की साक्षी में कोई और प्रव्रज्या नहीं लेगा।

एक ओर जीवन की सबसे बड़ी इच्छा गरिमापूर्ण ढंग से पूरी हो रही थी, तो दूसरी ओर बुद्ध की सशरीर उपस्थिति भी तिरोहित होने के करीब थी। सुभद्र हर्ष और शोक की समन्वित अनुभूति से अभिभूत था।

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