असंतोष की आवाज
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिछले हफ्ते दिल्ली विश्वविद्यालय में एक विषय पर, जिसमें युवा विद्वान की विशेषज्ञता होनी चाहिए, बहस रद्द करने से असहज स्थिति पैदा गई, जिसमें विरोध प्रदर्शन, विरोध प्रदर्शन के विरोध और पुलिस हस्तक्षेप के बाद अंततः उस सेमिनार को रद्द कर दिया गया। इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है। स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई अवसर आए, जब विश्वविद्यालयों में बहस एवं विचार-विमर्श की जगह अवरोधों ने जगह ले ली। ऐसे व्यवधान इसके बावजूद पैदा हुए, जब हमारे संविधान में विभिन्न सार्वजनिक मंचों से, जिनमें विश्वविद्यालय और अन्य उच्च शिक्षण संस्थान भी शामिल हैं, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और विभिन्न विचारों के प्रचार-प्रसार की गारंटी दी गई है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति चौथे स्तंभ का आधार है, जो एक उदारवादी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण घटक है और विश्वविद्यालयों में हिंसक घटनाएं इस अवधारणा पर सवाल उठाती हैं कि विचारों की लड़ाई विचार से ही लड़ी जानी चाहिए।
हालांकि 1975 में 19 महीने के आपातकाल के दौरान हमारे लोकतंत्र को पुलिस राज्य बना दिया गया था, जब सर्वोच्च न्यायालय तक ने कहा था कि संविधान में जीवन के अधिकार की गारंटी नहीं दी गई है। आपातकाल के बाद नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की बहाली के बाद यह उम्मीद जताई गई थी कि आपातकाल की घटनाओं को फिर नहीं दोहराया जाएगा। एक नए भारत का तभी उदय होगा, जब विभिन्न विचारों की निर्भय अभिव्यक्ति के लिए जगह होगी। इसकी पुष्टि वाल्टेयर के इस कथन से होती है-'आपके कथन को मैं नामंजूर करता हूं, लेकिन अभिव्यक्ति के आपके अधिकार की मैं रक्षा करूंगा।'
आत्मज्ञान की यह भावना राममोहन राय जैसे प्रारंभिक राष्ट्रवादियों द्वारा आत्मसात की गई थी, जिन्होंने उत्साह से मुश्किल औपनिवेशिक परिस्थितियों में भी प्रेस और संस्था की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बचाए रखी। ब्रिटिश सरकार के दमनकारी वर्नाकुलर प्रेस ऐक्ट से बचने के लिए अमृत बाजार पत्रिका ने अपने अखबार की भाषा बांग्ला से अंग्रेजी कर दी, पर अंततः अंग्रेजों ने जीवंत अंग्रेजी और क्षेत्रीय अखबारों के प्रकाशन एवं प्रसारण तथा गांधी जी को शांतिपूर्ण जनांदोलन का नेतृत्व करने की अनुमति दी।
हालांकि हाल के दिनों में उच्च शिक्षा केंद्रों, मीडिया पर और विरोधी लेखकों के विचारों की मुक्त अभिव्यक्ति पर बढ़ा हमला यह बताता है कि हमारा लोकतंत्र परिपक्वता की उस स्थिति में नहीं पहुंचा है, जो सहिष्णुता और दूसरों के प्रति सम्मान पर आधारित होता है। ज्ञान प्राप्त करने का बुनियादी तथ्य यह है कि आपको सुकरात बनना पड़ेगा। यानी संवाद से ही सच सामने आएगा।
गांधी जी ने खुलेआम घोषणा की कि सत्य सापेक्ष होता है, सच जो मैंने देखा, वह दूसरे व्यक्ति की सच्चाई से भिन्न हो सकता है। इसे समझाने के लिए उन्होंने वही प्रसिद्ध कथा बताई, जिसमें पांच नेत्रहीन लोग एक हाथी के विभिन्न अंगों को छूते हैं और कोई भी सत्य के करीब नहीं होता। अमर्त्य सेन भारत में प्राचीन काल से विचार-विमर्श और बहस की परंपरा के बारे में जोश से बताते हैं और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक एन आर्गुमेंटिव इंडिया में कहते हैं कि यह आज भी जारी है। इस तरह स्थापित तथ्यों और परंपराओं के बावजूद भारत और विदेश, दोनों में बहुलता और बहस का जश्न मनाने के बजाय उसे बाधित और भंग करने की कोशिश होती रही है। उदार विचार और उदार कामकाज के लिए एक उदार समाज के सृजन की आवश्यकता होती है, जिसमें न केवल सांविधानिक अधिकारों की रक्षा हो, बल्कि जो व्यक्तिगत और सामाजिक फर्क से भी संबद्ध हो। यदि हम ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी होना चाहते हैं, तो सहिष्णुता का वातावरण बनाना होगा।
जे एस मिल के मुताबिक, यदि कोई राय गलत है, तो भी उसे प्रकट करने की अनुमति मिलनी चाहिए। केवल सक्रिय संपर्क और संवाद के माध्यम से इसे विकसित किया जा सकता है, अन्यथा यह अपनी जीवनी शक्ति खो देगा। मिल सच के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में दो तर्क पेश करते हैं-पहला, असहमतिपूर्ण विचार सच हो सकता है और उसका दमन मानव जाति को उपयोगी ज्ञान से वंचित करता है। और दूसरा, भले कोई राय गलत हो, लेकिन सही विचार को मजबूती उसे चुनौती देने से ही मिलेगी।
आंद्रे सखारोव पूर्व सोवियत संघ में परमाणु कार्यक्रमों के जनक थे। उन्होंने ब्रेझनेव के शासनकाल में एक महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की कि सभी महत्वपूर्ण आविष्कार और खोज सोवियत संघ के बजाय पश्चिमी देशों में हुए हैं। ब्रेझनेव ने उन्हें जेल में डालकर चुप करा दिया। उस कार्रवाई ने उसी दिन साम्यवाद की नियति पर मोहर लगा दी। अनुरूपता और एकरूपता लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा नहीं है। इसे समझने के लिए सबसे बड़ा उदाहरण गैलिलियो के साथ कैथोलिक चर्च द्वारा किया गया व्यवहार है। इस तरह विज्ञान भूमध्यसागर से उत्तरी यूरोप की तरफ चला गया, जो अपेक्षाकृत ज्यादा सहिष्णु और विविध विचारों को अपनाने के प्रति उदार था। इसने ब्रिटेन को औद्योगिक क्रांति का गवाह बनने और प्रमुख वैश्विक शक्ति बनने का रास्ता साफ कर दिया।
जब भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति का दमन किया जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर और अनुत्पादक होते हैं, क्योंकि यह प्रगति, रचनात्मकता और निजता, यानी प्रगति के लिए जरूरी सभी चीजों का मार्ग अवरुद्ध करता है। विश्वविद्यालय के छात्र जीवन के सबसे प्रभाववादी और आदर्शवादी चरण में होते हैं। वे अपने रॉल मॉडल से उचित मार्गदर्शन चाहते हैं। यदि हमारे सांसद और विधायक संसदीय कामकाज को बाधित कर सकते हैं, तो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में वैसी ही कार्रवाई के लिए छात्रों को क्यों दोष दिया जाए। हमें गंभीरता दिखाने की जरूरत है और शांतिपूर्ण व व्यवस्थित ढंग से विश्वविद्यालयों एवं सार्वजनिक मंचों पर विचारों के स्वतंत्र प्रवाह एवं मुक्त अभिव्यक्ति के लिए सहिष्णुता का वातावरण सुनिश्चित करना होगा।
-लेखक दिल्ली विवि के प्रोफेसर रहे हैं