इस समय का विवेक
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हमने स्वामी जी के उपदेशों को लोगों तक पहुंचाने के लिए यथेष्ट प्रयत्न नहीं किया है। कई सभाओं में जहां मुझे युवाओं को संबोधित करने का अवसर मिलता है, मैं अक्सर उनसे यह पूछता हूं कि 'क्या स्वामी विवेकानंद के उपदेश आज के संदर्भ में प्रासंगिक हैं?' मैं इसलिए यह प्रश्न उनके सामने रखता हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि आज का युवा स्वामी जी के भाव को पूर्ण रूप से अपनाने में सफल नहीं हो पाया है। तो आइए, हम इस सोच का एक सटीक मूल्यांकन करने का प्रयत्न करें।
एक धनी परिवार में जन्म लेने के बावजूद नरेंद्रनाथ (स्वामीजी का पूर्वाश्रम का नाम) को प्रारंभिक जीवन में ही कठिन दरिद्रता का सामना करना पड़ा। जो व्यक्ति भविष्य में अपनी मेधा व भाषणों से विश्व-विजयी बनने वाला था, उसके पास अपनी मां और भाई-बहनों को दो वक्त का भोजन उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं होती थीं। परंतु असीम साहस, आत्मविश्वास एवं आदर्श के प्रति अनुराग के साथ वह सारे दुख-क्लेश को सहते हुए जीवन में आगे बढ़े।
वह तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी थे और बिना परखे और समझे किसी भी सिद्धांत को मानते नहीं थे। अपने गुरु श्री रामकृष्ण से जब उनकी भेंट हुई, तो उन्होंने उन्हें अनायास स्वीकार नहीं किया। उन्हें कई बार परखने के बाद ही अपनाया। अपने गुरु से उन्हें यही शिक्षा मिली कि परमात्मा से दुनियादारी के लिए छोटी-मोटी चीजें नहीं मांगनी चाहिए। बल्कि उच्च उद्देश्यों के लिए ही उसका अनुग्रह मांगना चाहिए। परमात्मा जगत का नियंता है, तो उससे दैनंदिन की कठिनाइयों के निवारण अथवा छोटी-मोटी सफलताओं के लिए आशीर्वाद क्या मांगना। आज के युवा अगर स्वामी जी के इन गुणों को अपना सकें, तो वे जीवन में बहुत कुछ हासिल कर पाएंगे।
1893 में शिकागो शहर में विश्व धर्म महासभा में सफलता पाने के बाद स्वामी जी अमेरिका के कई धनी परिवारों में अतिथि बनकर रहे। लेकिन यह ऐशो-आराम उनको आनंद नहीं देता था। विश्व धर्म महासभा में भाग लेने से पहले उन्हें अपार कष्ट सहने पड़े। कई बार तो उनके लिए भोजन और विश्राम का भी समुचित प्रबंध नहीं होता था। विश्व धर्म महासभा में उनके व्याख्यानों ने वेदांत धर्म का जयघोष कर दिया, तो उन्हें उस देश के धनी लोगों के निमंत्रण मिलने लगे। पर स्वामी जी उनके आकर्षण से मुक्त रहकर सादा जीवन जीते रहे। वह अक्सर जमीन पर सोते और मातृभूमि की दुर्दशा याद कर आंसू बहाते थे।
वह इतिहास के मेधावी छात्र थे और साथ ही उनमें असाधारण दूरदृष्टि थी। उन्होंने पैदल पूरे देश का भ्रमण किया था। भारतीय संस्कृति तथा परंपरा का पूरा ज्ञान उनको था। भारत के महान अतीत के साथ-साथ उसकी वर्तमान स्थिति के बारे में वह अवगत थे। लेकिन वह इस बारे में भी निश्चित थे कि भारत का पुनरोत्थान अवश्य होगा। देश की युवा पीढ़ी पर उनकी अशेष आस्था थी और वह कहते थे कि देश के युवा ही सारे संकटों का सामना करेंगे। उन्होंने कहा था, 'तुम सब का जन्म ही इसलिए हुआ है। अपने में विश्वास रखो। महान आत्मविश्वास से ही महान कार्य संपन्न होते हैं। निरंतर आगे बढ़ते रहो।'
हमारा देश आज परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। एक ओर जहां देश की अधिसंख्य आबादी युवाओं की है, अर्थव्यवस्था में गति दिख रही है, वहीं समाज में भ्रष्टाचार व्याप्त है और नारियों के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं। आर्थिक उन्नति के साथ धनी और निर्धन के वर्ग के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में स्वामी विवेकानंद युवाओं के प्रेरणास्रोत हो सकते हैं। स्वामी जी की वाणी उनके जीवन में व्यापक श्रेष्ठता लाने में सक्षम है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्वामी जी की प्रेरणा बुनियादी मूल्यों पर आधारित है जैसे कि श्रद्धा, साहस, त्याग, सेवा इत्यादि। स्वामी जी ने कहा था, 'मैं चाहता हूं कि मेरे सारे शिष्य मुझसे भी सौ गुना महान बनें। आज्ञा का पालन करना, तत्परता और आदर्श के प्रति प्रतिबद्धता, अगर तुममें यह तीन गुण हैं, तो कुछ भी तुम्हे रोक नहीं सकेगा।'
कुछ महीने पहले की बात है। एक सभा में मुझे सीबीएसई स्कूलों के प्रधानाचार्यों को संबोधित करना था। वहां मेरा परिचय एक विद्वान अध्यापक महिला से हुआ। बातचीत के दौरान उन्होंने अपने जीवन की एक घटना बताई। 20 वर्ष की पारिवारिक अशांति के बाद वर्ष 2005 में उनका विवाह विच्छेद हो गया था। वह वैवाहिक जीवन की इस परिणति से क्षुब्ध थीं। विवाह विच्छेद के कुछ दिन बाद वह छात्राओं के दल के साथ बेलूर मठ घूमने गईं। स्वामी जी की समाधि के पीछे गंगा तट पर करीब दो मिनट तक वह आंखें बंद कर खड़ी थीं। अचानक उनकी आंखें भर आईं और विवेकानंद साहित्य की कई प्रेरणाएं मन में हिलोरे लेने लगीं। ध्यान की इस अवस्था में रहने के बाद उन्हें लगा कि समय और स्थितियों से हार मानने के बजाय लड़ना चाहिए। युवाओं का ही नहीं, वृद्धजनों का भी अनुभव है कि इससे उन्हें कठिनाइयों के समय लड़ने की प्रेरणा मिलती है। युवाओं में वैसे भी ऊर्जा का स्वाभाविक संचार रहता है। शक्तिदायी विचार उन्हें और भी ऊर्जावान बना सकते हैं।