आस्था पर आधारित नजरिया है महिला विरोधी
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वह रहती तो मेरे ही शहर में हैं, लेकिन मुझे उनके बारे में एक अंग्रेजी अखबार से पता चला। उनका नाम आशारानी है, और वह तमाम संस्कारों और यज्ञों के अवसर पर पुरोहिती करती हैं। यह आश्चर्यचकित करने वाली बात है, क्योंकि माना तो यही जाता है कि ऐसा करना महिलाओं के लिए वर्जित है। मगर आशारानी इस धारणा को 35 साल पहले ही तोड़ चुकी हैं। अखबार में छपे आशारानी के साक्षात्कार के अनुसार, संस्कृत की पढ़ाई के दौरान उन्होंने इस बात का पता लगाना चाहा कि महिलाओं को हवन और संस्कार में पुरोहिती करने से क्यों रोका जाता है, तो उन्हें यह पता लगा कि तमाम धर्मग्रंथों और चारों वेदों में यह कहीं भी नहीं लिखा है कि महिलाएं अंतिम संस्कार या अन्य संस्कारों में पुरोहिती नहीं कर सकतीं। इस रुकावट को समाज ने तैयार किया है।
आशारानी से बात करने की इच्छा अखबार पढ़ने के बाद जागी। उस बातचीत के आधार पर उनकी कहानी और उनकी मान्यताएं कुछ इस प्रकार हैं- आशारानी का जन्म 1958 में कानपुर के एक आर्य समाजी परिवार में हुआ था। उन्होंने संस्कृत में बीए और एमए करने के बाद धर्मशास्त्र में पीएचडी की। उनके अनुसार, वेदों और उपनिषदों में कहीं भी महिलाओं को संस्कृत पढ़ने या मंत्रों के उच्चारण करने से मना नहीं किया गया है। बाद में धर्मग्रंथों और मनुस्मृति में कई श्लोक और बातें जोड़ी गईं, जिन्हें प्रक्षित्र कहा जाता है, और इन्हीं में महिला-विरोधी बातें कही गई हैं।
आशारानी का कहना है कि महिला-विरोधी और जाति-भेद की बात को हिंदू धर्म से जोड़कर देखने वाले तमाम पुरोहितों में कई ऐसे हैं, जो खुद अशिक्षित या कम शिक्षित हैं। ऐसे लोग वेदों के बारे में बहुत कम जानते हैं। आशारानी यह भी कहती हैं कि वेदों में हिंदू धर्म का कोई जिक्र नहीं है, केवल धर्म की बात कही गई है। इसका मतलब है कि धर्मों में भेद करना कम से कम वैदिक धर्म की भावना के विपरीत है। जब श्राद्ध और पिंडदान के बारे में उनसे मैंने पूछा, तो उनका कहना था, चन्दोज्ञ उपनिषद और तमाम अन्य शास्त्र पुनर्जन्म के सिद्धांत पर बहुत सारी व्याख्या करते हैं। यजुर्वेद के अनुसार, भस्म होने के बाद (जलाए जाने के बाद) शरीर खत्म हो जाता है और उसी समय उसमें बसने वाली आत्मा किसी दूसरे शरीर को अपना लेती है। ऐसी स्थिति में मरने के बाद किसी को पिंड चढ़ाने या उसकी आत्मा की शांति के लिए पूजा-आराधना-यज्ञ करना व्यर्थ है। वह कहती हैं, परिवार या समाज में जिंदा वृद्ध लोगों के प्रति श्रद्धा दिखाना ही श्राद्ध है।
मान्यताओं का जन्म सामाजिक परिस्थितियों में होता है और उनमें बदलाव भी बदलती सामाजिक परिस्थितियां लाती हैं। अगर आशारानी के विचारों को इस संदर्भ में हम देखें, तो वे काफी तार्किक लगते हैं। अपने अध्ययन के माध्यम से वह जिन नतीजों पर पहुंची हैं, वे स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं और श्रम करने वाली जातियों के बारे में धार्मिक मान्यताएं वैदिक काल में जो थीं, वे धर्मशास्त्रों के काल में बदल गईं। उन्होंने इसके लिए उन लोगों को दोषी माना है, जिन्होंने मूल ग्रंथों में अपनी तरफ से प्रक्षित्र जोड़े थे, लेकिन इसका भी मतलब तो यही हुआ कि उनकी इन अलग से जोड़ी गई बातों को व्यापक समर्थन समाज में मिला, जो आज तक कायम है।
(लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं)