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विकास की लौ से दूर गांव
अनिल प्रकाश जोशी
Updated Wed, 23 Sep 2015 07:25 PM IST
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देश के कई हिस्सों से आज भी नए राज्य की मांग उठती रहती है। फिर चाहे वह बोडोलैंड हो या हरित प्रदेश। मगर छोटे राज्यों की इन मांगों को पूरा करने के बरक्स पिछले डेढ़ दशकों में जो नए राज्य बने हैं, उनका आकलन भी जरूरी है। उत्तराखंड का ही उदाहरण लें, जो वर्ष 2000 में अस्तित्व में आया। इस राज्य में कुछ विकास हुआ हो या न हुआ हो, मगर पार्टियों में आंतरिक और दूसरी पार्टियों से सत्ता की लड़ाई खूब चल रही है। घोटाले तो यहां चर्चा में रहे ही हैं। स्थिति यह है कि इस राज्य ने पिछले 15 वर्षों में आठ मुख्यमंत्री देख लिए। स्पष्ट है कि राजनेताओं की चिंता राज्य की खुशहाली नहीं, अपनी कुर्सी कायम रखने की है।
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उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड राज्य की अवधारणा के पीछे यहां की दुर्गम परिस्थितियां, कठिन जीवन व संवेदनशील हिमालय की चिंता छिपी थी। लोगों को लगता था कि यहां की दुश्वारियों को समझने की क्षमता मैदानी नीतिकारों में नहीं है। मगर राज्य बनने के डेढ़ दशक बीतने के बाद भी शायद ही राज्य का कोई सपना पूरा हुआ है। स्थिति यह है कि छोटे-छाटे गांवों में बंटे इस राज्य में पिछले 15 वर्षों में 3,600 गांव खाली होने के कगार पर पहुंच गए हैं। जिन गांवों को सरसाज करने की राज्य की अवधारणा थी, वे अब बंजर होने शुरू हो गए। कुछ गांव तो ऐसे हैं, जहां गिने-चुने बुजुर्ग ही रहते हैं। भूतहा होते गांव सरकार को डरा नहीं पा रहे हैं। रोजगार, बेहतर सुविधाएं जैसे सारे सरकारी वायदे फाइलों में ही सिमट कर रह गए हैं। राज्य सरकार ने कस्बों और शहरों की चमक-धमक बढ़ाने की कोशिश तो की, पर गांव को छोड़ दिया। अब भी इस राज्य में 70 प्रतिशत पैसा शहरों में खर्च होता है, जबकि शेष 30 प्रतिशत गांवों में।
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उत्तराखंड में हर राजनीतिक दल की सरकार और उनके रोजाना बदलते मुख्यमंत्री अपनी पारी में जमकर घोषणा कर डालते हैं। अब तो यही लगता है कि डेढ़ दशक में हुई घोषणाओं के बाद शायद ही आने वाले मुख्यमंत्रियों के लिए नई घोषणा की गुंजाइश बची है। अलबत्ता अब कई बार घोषणाओं को वापस करने की भी घोषणा होती है! कहना अतिशयोक्ति नहीं कि राज्य में अगर कुछ हुआ है, तो वह है, बड़े उद्योग घरानों को निमंत्रण देना। इन घरानों ने सभी सुविधाओं के साथ जमीन व टैक्स का भी जमकर लाभ उठाया और फिर पीठ दिखाकर चल दिए। दूसरी तरफ, जब सरकार गांवों के लिए कुछ कर नहीं पाई, तो पीपीपी (सार्वजनिक निजी भागीदारी) मॉडल की तरफ उसने कदम बढ़ा दिए।
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आखिर सरकारी व्यवस्था इतनी बदहाल क्यों हो गई, जबकि राज्य से लगे हिमाचल प्रदेश के लोग सरकारी अस्पतालों, स्कूलों में जाना पसंद करते हैं? सार्वजनिक निजी भागीदारी की इतनी बातें होने लगी हैं कि अब यह भी कहा जाने लगा है कि चूंकि पंचायत ठीक से काम नहीं कर रहीं, इसलिए उसका संचालन भी सार्वजनिक निजी भागीदारी के तहत हो। इसी तरह राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बद से बदतर हो चुकी है। पहाड़ों में डॉक्टर जाने को तैयार नहीं हैं, और सरकार उन्हें वहां ले जाने की ठोस नीति नहीं बना सकी है। शिक्षा का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। राज्य में लगभग 1,800 विद्यालय बंद होने के कगार पर हैं। शिक्षा में ढांचागत विकास में कोई बेहतरी नहीं दिखाई देती। महाविद्यालय की घोषणाएं हर सरकार करके चली जाती है, मगर प्रयास तेज नहीं होते। स्थिति यह है कि न तो विद्यालय हैं, और न ही भवन। पिछले डेढ़ दशक में शिक्षा से जुड़ी 120 घोषणाएं हुई हैं, जिनमें से मात्र 15 ही पूरी हो पाईं। स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में 155 स्कूलों में से 30 स्कूल क्षतिग्रस्त हैं। राज्य के 1,117 स्कूलों में पानी की व्यवस्था नहीं है, जबकि 546 स्कूलों में शौचालय नहीं है। राज्य में करीब 2,020 स्कूलों के भवन खतरे में हैं। ऐसे में भला राज्य प्रगति के पथ पर कैसे आगे बढ़ सकता है?
यहां कृषि क्षेत्र भी काफी बदहाल है। लगभग 70,000 हेक्टेयर खेतिहर जमीन कम हो चुकी है। दुखद यह है कि एक सरकार कई नए प्रयोगों को लेकर खेतों में उतरती है, तो दूसरी का काम उसका नत्थी करना हो जाता है। बेरोजगारी ने भी यहां सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। लगभग चार लाख बेरोजगारों में से मात्र 31,145 को ही नौकरी मिल पाई है। अकेले देहरादून में ही अब भी हजारों बेरोजगार सड़कों पर घूम रहे हैं। सरकार के पास बड़ी-बड़ी योजनाओं के दावे तो जरूर होते हैं, पर छोटी-छोटी योजनाओं के माध्यम से रोजगार बढ़ाने की वह कोई महत्वपूर्ण पहल नहीं करती। इन तमाम दुश्वारियों की वजह से ही लोग राज्य से पलायन करने लगे हैं। अल्मोड़ा और पौड़ी जैसे महत्वपूर्ण जिले जल्द ही बंजर होने के कगार पर हैं। यहां आबादी के घटने की दर गंभीर रूप ले चुकी है। आंकड़े ऐसे भी हैं कि उत्तराखंड में लगभग 35-40 प्रतिशत से ज्यादा की आबादी राज्य छोड़ चुकी है।
बहरहाल, सरकार यह श्रेय लेना नहीं भूलती कि उसने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ाने का काम किया है। जब राज्य बना था, तो यहां की जीडीपी दर 2.5 प्रतिशत थी, जो बढ़कर 6-10 प्रतिशत के आसपास रहने लगी है। इसका कारण या तो शासन-प्रशासन में नौकरियां हैं, बड़े उद्योग घरानों की भागीदारी या फिर विश्व बैंक की बड़ी-बड़ी योजनाएं। मगर सच्चाई यह भी है कि इन आंकड़ों ने देश की तरह यहां भी लोगों को उलझन में रखा है। मसलन, राज्य द्वारा दर्शाई जा रही प्रति व्यक्ति आय एक लाख से ऊपर है, जबकि सच यह है कि यहां लोगों को खाने के लाले पड़े हैं। असल में, औसतन आय में उद्योगपतियों की भी आय जुड़ी होती है। लिहाजा यदि शहरों को घटा दें, तो गांव की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय 17 रुपये के आसपास ही होगी।
कहना अतिशयोक्ति नहीं कि राज्य बनने के बाद सबसे ज्यादा मार गांवों पर पड़ी है। वहां का सबकुछ खो गया है। वहां न संसाधन बचे हैं, और न ही सम्मान। यह निराशा गुस्से के रूप में फूटने का इंतजार कर रही है। अगर ऐसा हुआ, तो गाज राजनीतिक दलों पर ही गिरेगी।