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शहरों से महंगे हो रहे गांव, महंगाई के आंकड़े कर रहे इसे साबित

Sat, 21 Nov 2020 06:07 AM IST
उमेश चतुर्वेदी उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Published by: उमेश चतुर्वेदी Updated Sat, 21 Nov 2020 06:07 AM IST
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Villages are becoming more expensive than cities, inflation figures are proving this
retail inflation

गांव-देहात की संस्कृति वाले अपने देश में माना यह जाता है कि गांव की तुलना में शहर महंगे होते हैं। लेकिन अब यह सोच उलट जाए, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। उपभोक्ता सूचकांक आधारित ताजा आंकड़े इसी ओर इशारा कर रहे हैं। अक्तूबर, 2019 के मुकाबले अक्तूबर, 2020 में महंगाई बढ़ने के जो आंकड़े आए हैं, वे उनके मुताबिक, जिन गांवों पर आज भी अनाज और सब्जियों के पैदावार की जिम्मेदारी है, उन्हीं गांवों में शहर की तुलना में महंगाई दस फीसदी अधिक बढ़ी है। यह महंगाई भी खाने-पीने की चीजों में दिखी है। 


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कोरोना के चलते जब महाबंदी (लॉकडाउन) लागू की गई थी, तब जैसे पूरा देश ठप पड़ गया था। इस वजह से सब्जियों और फलों की आपूर्ति एक तरह से रुक ही गई थी। इससे तब सब्जियों और फलों की कीमत सामान्य स्तर से भी नीचे आ गई थी। लेकिन महाबंदी में धीरे-धीरे बढ़ती छूट और परिवहन व्यवस्था के पटरी पर आने के बाद जैसे महंगाई दर ने उछाल भरनी शुरू कर दी। सब्जियों और फलों की कीमत में यह तेजी ज्यादा दिखी, और हैरानी की बात यह कि यह महंगाई गांव में ज्यादा दिख रही है। उपभोक्ता सूचकांक के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल की तुलना में इस साल अक्तूबर में महंगाई दर 7.61 फीसदी ज्यादा रही। शहरों में जहां यह 7.4 फीसदी रही, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह 7.69 प्रतिशत पर पहुंच गई। अक्तूबर में ग्रामीण क्षेत्रों में सब्जियों के दाम में 24.05 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई, जबकि शहरों में यह वृद्धि 19.84 प्रतिशत रही। सितंबर में भी गांवों में सब्जियों की महंगाई दर 22.71 प्रतिशत थी, जबकि शहरों में 17.41 प्रतिशत थी।

शहरों की तुलना में गांवों में बाजारू तेल-घी की खपत कम होती है, क्योंकि ग्रामीण समाज का बड़ा हिस्सा अपने उपभोग लायक घी-तेल का इंतजाम खुद करता है। इस कारण शहरों की तुलना में गांवों में घी-तेल सस्ते मिलते रहे हैं। पर विगत अक्तूबर में ग्रामीण इलाकों में तेल-घी की महंगाई दर शहरों से अधिक रही। उपभोक्ता सूचकांक के आंकड़े पर गौर करें, तो अपेक्षाकृत धीमे शहरीकरण वाले राज्य-जैसे, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और तेलंगाना के साथ ही कारोबारी संस्कृति वाले गुजरात के गांवों में शहरों की तुलना में महंगाई ज्यादा है। जबकि शहरीकरण की ओर बढ़ रहे हरियाणा, शहरीकृत हो चुकी दिल्ली के साथ ही ग्राम केंद्रित बिहार और झारखंड में शहरों की तुलना में गांवों में महंगाई कम है। 

आधुनिक व्यवस्था में शहरीकरण को विकास का पर्याय मान लिया गया है। हालांकि शहरीकृत हो चुके देशों में प्रकृति की गोद में लौटने के लिए गांवों की ओर लौटने की भी प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में उनके यहां तो शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में महंगाई बढ़ने को जायज ठहराया जा सकता है, क्योंकि वहां शहरी इलाकों में आपूर्ति का स्थापित ढांचा है। लेकिन भारत जैसे देश में, जहां अब भी करीब 67 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, ग्रामीण महंगाई बढ़ने की वजह चौंकाती है। अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि खपत और आपूर्ति में अंतर होने से महंगाई बढ़ती है। तो क्या यह मान लिया जाए कि गांवों में सब्जियों और घी-तेल की खपत जितनी  बढ़ी है, उसकी तुलना में इन चीजों की आपूर्ति कम है? ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि यह खपत बढ़ी क्यों। अगर सरकार के इस दावे पर यकीन कर लिया जाए कि कोरोना काल में मुफ्त अनाज, तीन महीने तक उज्ज्वला कनेक्शन पर मुफ्त गैस, जन-धन खाते में तीन महीने तक पांच-पांच सौ रुपये के साथ ही किसान सम्मान निधि देने और मनरेगा के जरिये काम बढ़ाने की वजह से गांवों में नगदी बढ़ी है, जिसके चलते खपत बढ़ी है। 

लेकिन इस विश्लेषण को स्वीकार करें, तब भी भारतीय ग्रामीण जीवन के लिए चिंता की बात है। बेशक बाढ़ और रबी की बुआई से ठीक पहले कुछ इलाकों में बारिश के चलते सब्जियों की फसल खराब हुई है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि देश के गांवों में पैदावार घटी है। तो ऐसे में शक बढ़ना स्वाभाविक है कि गांवों में बढ़ती महंगाई की वजह वे बिचौलिये तो नहीं हैं, जिनके फोकस में अब ग्रामीण उपभोक्ता हैं? महंगाई से गांव कराहने लगे, इससे पहले इसका जवाब ढूंढा जाना जरूरी है।

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