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अर्थव्यवस्था: विदेशी व्यापार में सतर्कता जरूरी, आईपीईएफ में शामिल होने से प्रभावित होगा राष्ट्रीय हित
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विस्तार
भारत अमेरिका समेत 14 देशों के साथ इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) में शामिल हुआ है। आईपीईएफ के चार स्तंभ हैं-आपूर्ति शृंखला, हरित अर्थव्यवस्था, निष्पक्ष अर्थव्यवस्था और व्यापार। पहले भारत ने इसके मात्र तीन स्तंभों-आपूर्ति शृंखला, हरित अर्थव्यवस्था, निष्पक्ष अर्थव्यवस्था से जुड़ने के लिए सहमति जताई, और व्यापार को अपने राष्ट्रीय हित के विपरीत बताते हुए इससे खुद को अलग कर लिया था। पर अब बताया जा रहा है कि भारत व्यापार स्तंभ से भी जुड़ने के लिए सहमत हो गया है।
संयुक्त किसान मोर्चा समेत और नागरिक समाज के 32 संगठनों ने प्रधानमंत्री और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री को पत्र लिखकर आईपीईएफ के व्यापार स्तंभ में शामिल होने से उत्पन्न खतरे के प्रति सचेत करते हुए इसमें शामिल न होने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि भारत अभी श्रम, पर्यावरण मानकों व डिजिटल व्यापार जैसे मुद्दों से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं है। किसान संगठनों के अनुसार, इससे अमेरिका स्थित कृषि-तकनीक फर्मों और खुदरा सेवाओं तथा बुनियादी ढांचा सेवाओं के आपूर्तिकर्ताओं को हमारे देश में प्रवेश की खुली सुविधा मिलेगी, जो भारत के हितों को प्रभावित कर सकते हैं। फ्रेमवर्क सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार को बढ़ावा देता है।
अगर भारत आईपीईएफ के कुछ देशों से ज्यादा आयात करता है, तो उसे अन्य सहभागी देशों के साथ व्यापार असंतुलन का सामना करना पड़ सकता है, जिसका भारतीय वाणिज्यिक घाटे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, और समग्र आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। फ्रेमवर्क के अंदर व्यापार की वृद्धि होने से भारतीय उद्योगों को विदेशी सामान से अधिक प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है। इससे भारतीय उद्योगों को अपने उत्पाद बेचने में कठिनाइयों का सामना तो करना ही पड़ेगा, कुछ क्षेत्रों में रोजगार की कमी भी हो सकती है। खासकर, भारत के छोटे और मध्यम उद्यमों को बड़ी विदेशी कंपनियों से अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा, पहले से संकटग्रस्त भारतीय कृषि को भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इससे किसानों की आय तो प्रभावित होगी ही, कृषि आपूर्ति शृंखला पर भी बुरा असर पड़ेगा। साथ ही, इससे ई-कॉमर्स के जरिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खाद्य खुदरा क्षेत्र में प्रवेश की भी अनुमति मिल जाएगी। आईपीईएफ का मुक्त व्यापार समझौता बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बीजों पर एकाधिकार नियंत्रण सुनिश्चित करेगा और छोटे किसानों के बीज बचाने के अधिकार को भी प्रभावित करेगा। फ्रेमवर्क के अंदर व्यापार में वृद्धि के साथ, भारत वैश्विक मूल्य शृंखला में अधिक एकीकृत हो सकता है। विनिमय दर के विचलन से आयात और निर्यात की लागत पर भी असर पड़ सकता है, जिससे भारत की व्यापार प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। विदेशों से आयात बढ़ने से भारत के कुछ पारंपरिक उद्योगों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों और समुदायों को रोजगार की हानि और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत अब तक अपने सर्वोत्तम राष्ट्रीय हित में कार्य करता रहा है और इसे आगे भी जारी रखना चाहिए। आज के दौर में आईपीईएफ एक गैर-पारदर्शी और अलोकतांत्रिक व्यापार समझौता प्रतीत होता है, जिसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था द्वारा एकतरफा तैयार करके दूसरे सदस्यों पर जबर्दस्ती थोपने का प्रयास किया जा रहा है। भारत लोकतांत्रिक मान्यताओं वाली उभरती अर्थव्यवस्था है, जिसे अपने संसाधनों का उपयोग राष्ट्रहित में ही करना चाहिए, न कि दूसरे देशों को खुश करने के लिए। इसलिए सरकार को किसी भी समझौते में शामिल होने से पहले विभिन्न श्रमिक, किसान व नागरिक संगठनों एवं व्यापारिक प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए एक कमेटी का गठन करना चाहिए।
-केसी त्यागी पूर्व सांसद, एवं बिशन नेहवाल आर्थिक चिंतक हैं।