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धूप आने दो: विदुर के गुप्त-संदेश ने बचाए पांडवों के प्राण, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

Sun, 29 Dec 2024 05:40 AM IST
शुभम कुमार आशुतोष गर्ग
आशुतोष गर्ग Published by: शुभम कुमार Updated Sun, 29 Dec 2024 05:40 AM IST
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सार
युधिष्ठिर ने लाक्षागृह को चारों ओर से देखकर कहा, इस घर का एक-एक कोना आग भड़काने वाली सामग्री से बना है। शत्रु ने बड़ी चतुराई से इसका निर्माण किया है, ताकि हम जब सो रहे हों, तो वह इसे जला दे।
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Vidur's secret message saved the lives of the Pandavas, know the whole story from the pages of culture
पांडव - फोटो : MetaAI

विस्तार

दुर्योधन के सुझाव पर धृतराष्ट्र ने पांडवों को वारणावत जाने की आज्ञा दे दी। वारणावत भेजकर दुर्योधन पांडवों को मरवाना चाहता था। उसने अपने मंत्री पुरोचन से कहा, ‘पांडव कुछ दिन तक वारणावत में रहेंगे। तुम पहले ही वहां चले जाओ और नगर के छोर पर सन, सर्जरस (राल) और लकड़ी आदि से ऐसा भवन बनवाओ, जो चिंगारी लगते ही भस्म हो जाए। उसकी भीतों पर घी, तेल, चर्बी और लाख मिली हुई मिट्टी का लेप करा देना। फिर उस भवन में कुंती, पांडव आदि के रहने का प्रबंध कर देना। वे सब निश्चिंत होकर सो जाएं, तो तुम उसमें आग लगा देना। इस तरह जब वे अपने घर में ही जल जाएंगे, तो हमारी निंदा भी नहीं होगी।’


पुरोचन ने वारणावत जाकर दुर्योधन की आज्ञानुसार, एक महल तैयार करवाया। इस बीच पांडव वारणावत जाने की तैयारी में जुट गए। यात्रा आरंभ करने से पूर्व विदुर ने युधिष्ठिर से सांकेतिक भाषा में कहा-
  • एक ऐसा अस्त्र है, जो लोहे का तो नहीं है, परंतु शरीर को नष्ट कर सकता है। यदि शत्रु के इस दांव को कोई समझ ले, तो वह मृत्यु से बच सकता है। (अर्थात शत्रुओं ने तुम्हारे लिए एक ऐसा भवन तैयार किया है, जो आग से भड़क उठने वाले पदार्थों से बना है।)
  • आग, घास-फूस और सारे जंगल को जला डालती है। परंतु बिल में रहने वाले जीव उससे अपनी रक्षा कर लेते हैं। यही जीवित रहने का उपाय है। (अर्थात उससे बचने के लिए तुम एक सुरंग तैयार करा लेना।)
  • अंधे को रास्ता व दिशाओं का ज्ञान नहीं होता। बिना धैर्य के समझदारी नहीं आती। यह बात भली-भांति समझ लो। (अर्थात दिशा आदि का ज्ञान पहले से ही ठीक कर लेना, जिससे रात में भटकना न पड़े।)
  • शत्रुओं के दिए हुए बिना लोहे के हथियार को जो स्वीकार करता है, वह बिल में घुसकर आग से बच जाता है। (अर्थात उस सुरंग से यदि तुम बाहर निकल जाओगे, तो उस भवन की आग में जलने से बच जाओगे।)
विदुर ने कहा, घूमने-फिरने से रास्ते का ज्ञान हो जाता है। नक्षत्रों से दिशा का पता लग जाता है, जिसकी पांचों इंद्रियां वश में हैं, शत्रु उसकी कुछ भी हानि नहीं कर सकते। (अर्थात यदि तुम पांचों भाई एकमत रहोगे, तो शत्रु तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।)

विदुर का यह संकेत युधिष्ठिर ने समझ लिया था...इसके बाद पांडव, वारणावत की ओर प्रस्थान कर गए। वहां पहुंचकर युधिष्ठिर ने भवन को चारों ओर से देखकर कहा, ‘इस घर का एक-एक कोना आग भड़काने वाली सामग्री से बना है। घी, लाख और चर्बी की मिश्रित गंध से यही प्रमाणित होता है। शत्रु ने बड़ी चतुराई से इसका निर्माण किया है, ताकि हम जब सो रहे हों, तो वह इसे जला दे, परंतु विदुर ने पहले ही यह जान लिया था और तभी उन्होंने हमें गुप्त संदेश द्वारा इसकी सूचना दे दी। अब हमें यहां रहकर रास्तों का पता लगाना चाहिए और फिर एक सुरंग बनाकर हम यहां से निकल जाएंगे।’

इस बीच विदुर ने एक सुरंग खोदने वाले विश्वासपात्र को पांडवों के पास भेजा। उसने आते ही लाक्षागृह के अंदर से एक सुरंग बनाने का काम आरंभ कर दिया। इस कार्य को एक वर्ष बीत गया था। पुरोचन ने देखा कि पांडव भवन में निश्चिंत होकर रहने लगे हैं। पुरोचन को प्रसन्न देखकर युधिष्ठिर समझ गया कि वह भवन में आग लगाने वाला है। इसलिए पांडवों ने तय किया कि वह तत्काल सुरंग के रास्ते निकल भागेंगे।

एक दिन कुंती ने दान देने के लिए ब्राह्मण-भोज कराया। जब सब खा-पीकर चले गए, तब संयोगवश एक भील स्त्री अपने पांच पुत्रों के साथ भोजन मांगने आई। पांडवों ने उन्हें भोजन और मदिरा दी। उसके बाद वे सब लाक्षागृह में ही सो गए। पुरोचन भी वहीं सो रहा था। तभी भीमसेन ने भवन में आग लगा दी, जिसमें भील स्त्री का पूरा परिवार और पुरोचन आदि सब लोग जलकर मर गए। उनके शव जलकर भस्म हो गए थे, इसलिए कोई उन्हें पहचान नहीं पाया और दुर्योधन बहुत समय तक यही समझकर खुश होता रहा कि पांडव लाक्षागृह की आग में मारे गए। इस तरह विदुर के गुप्त संदेश का पालन करके पांडव अपनी माता कुंती के साथ सुरंग में से सुरक्षित निकल गए।
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