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वाजपेयी का अटल विकास मॉडल

Thu, 23 Aug 2018 07:12 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Thu, 23 Aug 2018 07:12 PM IST
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Vajpayee's Atal development model
अटल बिहारी वाजपेयी

तेरह अक्तूबर, 1999 को भारतीय जनता पार्टी ने आम चुनाव में दूसरी बार जीत दर्ज की थी। शुभचिंतक प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के तीसरे कार्यकाल की बधाई देने आ रहे थे। उनमें महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं का एक दल भी था-उसके एक हफ्ते पहले शिवसेना-भाजपा गठबंधन विधानसभा चुनाव हार गया था। उस दल का नेतृत्व नितिन गडकरी कर रहे थे, जिन्होंने मुंबई और पुणे के बीच भारत को अपना पहला एक्सप्रेस-वे दिया। वाजपेयी ने फूल स्वीकार करते हुए मजाक में गडकरी से पूछा, नितिन, क्या हम इंडिया और भारत को जोड़ने वाला फ्लाइओवर बना सकते हैं? नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली में ग्रामीण कनेक्टिविटी के लिए नीति तैयार करने वाले गडकरी ने कहा, 'निश्चित रूप से' और दस दिन बाद एक योजना के साथ वह वाजपेयी के पास लौटे। यह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत थी। तब से पीएमजीएसवाई ने भारत और इंडिया को जोड़ने के लिए 5.5 लाख किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है।


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कनेक्टिविटी वाजपेयी के विकास मॉडल का एक प्रमुख विषय और मंत्र था। उनके लिए राजनीति लोगों के लिए और शासन लोगों को सेवा, विकास और समृद्धि से जोड़ने के लिए था। यह सरल, किंतु उत्कृष्ट नीति वाजपेयी की आर्थिक नीति का सार थी। पूरब और पश्चिम तथा उत्तर और दक्षिण को हाई-वे से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज योजना इसी तरह आर्थिक विकास में सक्षम बनाने के लिए योजक का निर्माण कर रहा था। 1998 में जिन लोगों के पास मोबाइल फोन था, वे याद कर सकते हैं कि उस समय फोन करने की दर प्रति मिनट 16 रुपये थी, जो काफी खर्चीली थी। कंपनियों ने लाइसेंस के लिए अवास्तविक रकम की बोली लगाई थी, कई कंपनियां भुगतान करने के लिए संघर्ष कर रही थीं और दिवालिया होने के कगार पर थीं। वाजपेयी ने उच्च लाइसेंस फी से कमाई के अनुसार राजस्व साझा करने वाले मॉडल में दूरसंचार कंपनियों को सक्षम बनाया। इस कदम ने जहां फोन की दर घटाई, वहीं दूरसंचार कनेक्टिविटी को भी प्रेरित किया। इस बदलाव और उदारीकरण के चलते 2005 में ग्राहकों की संख्या प्रति माह करीब 50 लाख तक पहुंच गई। उनकी नीति का अंतर्निहित सिद्धांत था कि जब प्राकृतिक संसाधनों की बात आती है, तो सरकार को उसे सक्षम बनाने वाला होना चाहिए, न कि मुनाफा कमाने वाला। भारत में जन वितरण प्रणाली का लाभ समृद्ध लोग ही उठाते थे और वंचित लोगों को भूखे छोड़ दिया जाता था। दिसंबर, 2000 में वाजपेयी ने दीनदयाल उपाध्याय के मानव धर्म की अवधारणा से प्रेरित होकर अति निर्धन व्यक्तियों को 35 किलो अनाज देने के लिए अंत्योदय कार्यक्रम की घोषणा की। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का विचार अंत्योदय कार्यक्रम से ही पैदा हुआ। किसान क्रेडिट कार्ड का विचार भी उन्हीं के कार्यकाल में पैदा हुआ। उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए उनकी सरकार ने बीटी कपास के बीजों के प्रयोग को मंजूरी दी, चीनी के मूल्यों का विनियंत्रण किया, डेयरी विकास को प्रोत्साहन दिया और कानकुन विश्व व्यापार संगठन की बैठक में किसानों के लिए मूल्य का नेतृत्व किया।
 
1991 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से राहत पैकेज के लिए आवेदन करते समय भारत लाइसेंस राज को खत्म करने और विकास के संसाधनों को मुक्त करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) में विनिवेश के लिए प्रतिबद्ध था। लगभग एक दशक से पीएसयू में मामूली प्रगति हुई थी। वाजपेयी ने अरुण शौरी को आगे बढ़ने का अधिकार दिया। उनके कार्यकाल में बाल्को, वीएसएनएल, सीएमसी, आईपीसीएल, हिंदुस्तान जिंक लि., मॉडर्न फूड और होटलों-यानी कुल 16 उपक्रमों का विनिवेश किया गया।

 न तो उससे पहले और न ही 2004 के बाद किसी सरकार में सरकार को कारोबार से बाहर करने का साहस था। वित्तीय दक्षता निजीकरण के साथ रुकी नहीं। जाहिर है, निजीकरण और उदारीकरण का विरोध हो रहा था। जब वीएसएनएल का निजीकरण होना था, तो उनके मंत्रियों ने आपत्ति जताई थी, जिनमें से कुछ अभी मंत्रिमंडल में हैं। विवाद के बीच वाजपेयी मुस्कराए और 'अच्छा यह करना है', कहते हुए बैठक खत्म कर दी। उसके बाद किसी में बोलने की हिम्मत नहीं थी। वह अपनी सीमाओं से भी परिचित थे। 2002 में एक वैश्विक परामर्शी कंपनी ने उनके सामने दस फीसदी विकास दर का प्रजेंटेशन पेश किया। अंत में मुस्कराते हुए उन्होंने पूछा, लेकिन यह सब होगा कैसे? वाजपेयी ने सर्वसम्मति से सुधार के ढांचे के तहत सुधार के लाभ-हानि को संतुलित रखा। वाजपेयी के कार्यकाल में ही भारत ने बीमा क्षेत्र में एफडीआई खोला, जिसने भावी सरकारों को फसल बीमा के लिए कार्यक्रम तैयार करने और गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा शुरू करने में सक्षम बनाया। एफडीआई खोलने के लगभग सभी कदम एन के सिंह कमेटी की रिपोर्ट में सुझाए गए थे। 1991 के बाद उदारीकरण का पहला बड़ा कदम वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में उठाया गया था। नदियों को जोड़ने का विचार भी उन्हीं के शासन में पुनर्जीवित किया गया। वह नौकरशाही को भी फटकारने से परहेज नहीं करते थे।
 
वाजपेयी ने जब प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब दुनिया एशियाई आर्थिक संकट से जूझ रही थी। वित्त मंत्री के रूप में यशवंत सिन्हा और रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में बिमल जालान ने अनिश्चित स्थिति में अर्थव्यवस्था का प्रभार संभाला था। इसके बावजूद तब नई सहस्त्राब्दि के कुछ महत्वपूर्ण सुधार लागू किए गए-एफआरबीएम ऐक्ट से जीएसटी पैदा हुआ, एसएआरएफईएसआई द्वारा संपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों को सक्षम बनाया गया, बीमा में एफडीआई ने रोजगार का सृजन किया, 2003 में बिजली अधिनियम लाया गया। याद रखने की बात यह है कि ये सभी सुधार तब हुए, जब भारत ने पोकरण में अपनी परमाणु क्षमता दिखाई, अमेरिकी प्रतिबंध झेला, कारगिल में युद्ध का सामना किया और ऑपरेशन पराक्रम चलाया।
 
राजनीति की तरह आर्थिक क्षेत्र में भी उनकी लोकप्रिय छवि थी। आर्थिक प्रबंधन के बारे में उनके पास साझा दृष्टिकोण था। उनका कद इतना बड़ा था कि कभी अपने शब्दों, तो कभी अपनी चुप्पी के जरिये वह नाराज लोगों को भी मना लेते थे। 2.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की नींव वाजपेयी की अनूठी अटल नीति द्वारा ही रखी गई। 

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