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उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन में टूट: विचारधारा विहीन राजनीति का अंत

Sun, 09 Jun 2019 02:24 PM IST
Nilesh Kumar भूपेन्द्र यादव, भाजपा सांसद
भूपेन्द्र यादव, भाजपा सांसद Published by: Nilesh Kumar Updated Sun, 09 Jun 2019 02:24 PM IST
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Uttar Pradesh: SP-BSP alliance crashed by selfishness of Akhilesh yadav and Mayawati
गाजीपुर में गठबंधन की जनसभा(File Photo) - फोटो : अमर उजाला

चुनाव परिणाम आने के बाद देश की राजनीति में बड़े परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व बना सपा-बसपा का महागठबंधन टूट गया। हालांकि यह गठबंधन टिकने वाला नहीं है, इसको लेकर चुनाव से पहले ही सभी को अंदाजा था। हालांकि हार का ठीकरा सपा के माथे फोड़ते हुए गठबंधन से अलग होने का निर्णय बसपा ने एकतरफा लिया है। बसपा सुप्रीमो का यह निर्णय दर्शाता है कि विपक्ष की राजनीति समाज में होने वाले परिवर्तन के मूल मुद्दों एवं विचारों से भटक गई है। विचारधारा की अस्पष्टता और दृष्टिकोण में असमानता के साथ जब राजनीतिक गठबंधन सिर्फ सत्ता के अवसरवाद में बनते हैं, तो उनका स्वाभाविक हश्र कुछ इसी तरह का होता है। 


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चुनाव परिणाम आने के बाद देश की राजनीति में बड़े परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व बना सपा-बसपा का महागठबंधन टूट गया। हालांकि यह गठबंधन टिकने वाला नहीं है, इसको लेकर चुनाव से पहले ही सभी को अंदाजा था। हालांकि हार का ठीकरा सपा के माथे फोड़ते हुए गठबंधन से अलग होने का निर्णय बसपा ने एकतरफा लिया है। बसपा सुप्रीमो का यह निर्णय दर्शाता है कि विपक्ष की राजनीति समाज में होने वाले परिवर्तन के मूल मुद्दों एवं विचारों से भटक गई है। विचारधारा की अस्पष्टता और दृष्टिकोण में असमानता के साथ जब राजनीतिक गठबंधन सिर्फ सत्ता के अवसरवाद में बनते हैं, तो उनका स्वाभाविक हश्र कुछ इसी तरह का होता है। 

भारत की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करने वाले नेताओं में बाबा साहेब आंबेडकर, डॉ राममनोहर लोहिया और पंडित दीन दयाल उपाध्याय प्रमुख हैं। लोहिया ने राजनीति में सप्तक्रांति का विचार दिया। यह सामाजिक परिवर्तन एवं सुधारों के बुनियादी आवश्यकताओं को परिभाषित करने वाले बिंदु की तरह है। सप्तक्रांति की बात करते हुए डॉ. लोहिया ने लैंगिक भेदभाव से मुक्ति तथा स्त्री-पुरुष समानता की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने राजकीय, आर्थिक और मानसिक स्तर पर भेदभाव से मुक्त होने की जरूरत का विचार दिया है। सप्तक्रांति के विचारों में जन्मजात रूप से जातिगत पिछड़ापन को सामाजिक समस्या के रूप में चिह्नित करते हुए, इसके निराकरण की बात की गई है। पैदावार बढ़ाने, पूंजीगत विषमता, आर्थिक असमानता आदि विषयों को डॉ. लोहिया ने अपने विचारों में सही ढंग से रेखांकित किया है।

इन विचारों के जरिये लोहिया की दृष्टि समाज के वंचित और गरीब को न्याय दिलाकर समाज और राजनीति की मुख्यधारा में शामिल करने की थी। किंतु वर्तमान में लोहिया और आंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले ऐसे अवसरवादी दलों का आचरण उनके विचारों से ठीक उलट है। यही कारण है कि सपा के वर्तमान अध्यक्ष राम मनोहर लोहिया की वैचारिक विरासत तो दूर, अपने पिता की राजनीतिक विरासत को भी नहीं सहेज पाए। यह भी सच है कि राजनीति को केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार के सत्ता हितों का साधन बनाकर एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करने की इजाजत अब देश की जनता नहीं देने वाली। 

महागठबंधन में हुए हालिया घटनाक्रमों में निहित राजनीति ने सिद्ध किया है कि बसपा सुप्रीमो ने खुद को एक जातिवादी अहंकार में कैद कर लिया था और अब भी वह उस अहंकार से खुद को उबार नहीं पा रहीं। बाबा साहब ने उच्च नैतिकता का चुनाव करते हुए सार्वजनिक जीवन जिया, जिसे बसपा प्रमुख ने कभी नहीं अपनाया। मैं मानता हूं कि अनुसूचित जाति के समाज की जो बड़ी समस्याएं हैं, उनसे जुड़ा जो चिंतन है, युवाओं की आकांक्षाएं है, उसको भी दरकिनार करने का काम बसपा ने अपनी संकीर्ण राजनीति के कारण किया है। 

एक बात और गौर करनी होगी कि चुनाव परिणामों का सटीक आकलन कर पाने में अनेक राजनीतिक विश्लेषक इसलिए चूक गए, क्योंकि उन्होंने इस चुनाव को गठबंधनों के वोट-ट्रांसफर का चुनाव मानकर आकलन किया। जबकि यह चुनाव वोट ट्रांसफर का चुनाव नहीं था, ये नए भारत के निर्माण का चुनाव था। जब केंद्र में कोई सरकार बनती है अथवा केंद्र का चुनाव होता है तो देश की सुरक्षा, विदेश नीति, अर्थनीति जैसे मूल मुद्दों पर किसी भी दल का राजनीतिक चिंतन उभर कर आना चाहिए। विपक्ष ऐसे किसी भी चिंतन को रखने का प्रयास करता भी नहीं दिखा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि विचारधारा विहीन और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों से विमुख होकर अगर राजनीति को हमने महज वोट ट्रांसफर के चुनाव में तब्दील कर लिया, तो ये राष्ट्र की नहीं बल्कि कबीलों की राजनीति बनकर रह जाएगी। लेकिन एक स्वस्थ एवं परिपक्व लोकतंत्र के रूप में देश ने डॉ राममनोहर लोहिया, बाबा साहेब आंबेडकर और दीन दयाल उपाध्याय जैसे विचारकों के चिंतन के अनुरूप गरीब आदमी को ताकत देने की राजनीति को इस देश में स्वीकार किया। यह भारत के लोकतंत्र के लिए उत्कर्ष का विषय है। वैसे बेमेल गठबंधन में हाल तक रहे दलों की बौखलाहट से किसी को निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आज भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के गरीबों को सम्मान से जीवन जीने का मार्ग दिखाया है और लगातार इस दिशा में कार्य कर रही है। 

लोग अपनी सहज सामाजिक परंपरा, अपनी वेश भूषा, खान-पान और रहन-सहन जैसी चीजों के साथ नए भारत की आकांक्षा के लिए आगे बढ़ सकते हैं, ये रास्ता भाजपा ने दिखाया है। वहीं विपक्षी दलों की बिखराव की राजनीति यह दिखाती है कि भारत की जनता द्वारा नकारी गई ताकतें अपना वोट ट्रांसफर न होने से हताश हैं। हर गरीब अब भारत निर्माण में अपनी भूमिका के साथ आगे बढ़ रहा है। राजनीति करते समय हमें महात्मा गांधी के उस ताबीज को याद करना चाहिए जो उन्होंने देश की दिशा देते हुए सत्तर साल पहले दिया था,'जब भी कोई निर्णय लो तो समाज के अंतिम व्यक्ति का भला कैसे हो सकता है, ये सोचकर निर्णय करो।'

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं राज्यसभा सदस्य हैं।)
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