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सीरिया में उलझा अमेरिका

Fri, 27 Apr 2018 07:40 PM IST
harsh kakkad हर्ष कक्कड़
Updated Fri, 27 Apr 2018 07:40 PM IST
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US entangled in Syria
सीरिया में अमेरिका
डाउमा शहर में इसी महीने सात अप्रैल को किए गए रासायनिक हमले के बाद से पश्चिमी जगत भयाक्रांत है। लंदन में स्क्रीपल पर हुए हमले से उपजा गुस्सा अभी शांत भी नहीं हुआ है। ट्रंप ने कार्रवाई की बात की थी और रूस ने खामियाजा भुगतने की धमकी दी थी। अमेरिका के लिए सीरिया वह जगह है, जहां वह इस कदर फंस गया है, जहां से उसे निकलने का रास्ता नहीं दिख रहा है। ट्रंप ने हाल ही में इस देश से अमेरिकी फौज की वापसी का एलान किया था, मगर उन्हें अपने इस फैसले को टालने को मजबूर होना पड़ा। जवाबी हमले के जरिये ट्रंप ने पीड़ितों के प्रति अपना समर्थन तो जताया ही इसके जरिये अमेरिकी सैनिकों की वापसी की अपनी नाकामी से भी ध्यान बंटाने में सफल हो गए।

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अभी तकरीबन दो हजार अमेरिकी सैनिक सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्स (एसडीएफ) के साथ पूर्वी सीरिया में तैनात हैं। एसडीएफ एक कुर्द लड़ाका गुट है, वहीं अमेरिकी सैनिकों में ज्यादातर विशेष बल के जवान और इंजीनियर शामिल हैं। इन लोगों ने अधिकांश क्षेत्र को आईएस से मुक्त करा लिया है। यूफ्रेट्स नदी के एक ओर अमेरिकी समर्थित सीरिया के विद्रोही हैं, तो दूसरी ओर रूस और ईरान समर्थित सीरिया की सरकारी सेना। अमेरिका को एहसास है कि यदि वह वहां से वापस जाता है, तो सीरियाई सेना रूस और ईरान के समर्थन से उन हिस्सों पर दोबारा कब्जा कर लेगी, जहां अभी अमेरिका समर्थित एसडीएफ ने कब्जा कर रखा है। इसके साथ ही तुर्की भी अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए वहां इन बलों को तबाह करना चाहेगा। जाहिर है, ट्रंप के शेखी बघारने और प्रलाप करने के बावजूद अमेरिका लंबे समय तक सीरिया में उलझा रहेगा। 

अमेरिका ने जब सीरिया पर हमले की घोषणा की तो ब्रिटेन और फ्रांस ने तुरंत ही उसे समर्थन दिया। रूस की धमकियों और युद्धोन्माद भड़काने के बावजूद 14 अप्रैल की सुबह वहां हमला किया गया, जिसमें तीन जगहों को निशाना बनाया गया। पश्चिमी मीडिया के मुताबिक, ये वे जगहें थीं, जिनका संबंध सीरिया के रासायनिक हथियारों से है। कुल 110 मिसाइलें दागी गईं। सीरिया ने दावा किया कि उसकी प्रतिरक्ष प्रणाली ने अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही नाकाम कर दिया, जबकि कुछ मिसाइलें लक्ष्य तक पहुंच गईं, जिनमें बारजेह स्थित अनुसंधान केंद्र भी शामिल था। रूस ने दावा किया कि इनमें से एक भी मिसाइल उस देश में स्थित रूसी वायुसेना और नौसेना अड्डे तक नहीं पहुंच सकी, जोकि उसकी वायु प्रतिरक्षा प्रणाली की निगरानी में है। अमेरिका का कहना था कि यह सिर्फ एक बार किया गया हमला था और कड़ा संदेश देने के लिए किया गया था।  

संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध ऑर्गनाइजेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वीपन्स (ओपीसीडब्ल्यू) के प्रतिनिधियों ने यह जानने के लिए 21 अप्रैल को डाउमा की यात्रा की कि क्या वाकई वहां रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया है। डाउमा अभी सीरियाई सरकार के कब्जे में है, जबकि विद्रोही वहां से पीछे हट चुके हैं। यह आने वाले समय में ही पता चलेगा कि क्या वाकई वहां उन्हें रासायनिक हथियार मिले या नहीं और क्या उनका उपयोग किया गया था। ऐसी पिछली जांच की तरह यह भी हो सकता है कि यह सब ठंडे बस्ते में चला जाए। 

सीरिया ने चार साल पहले अपने सारे रासायनिक हथियार समर्पित कर दिए थे। यदि किसी रसायनिक फैक्टरी या फिर ऐसी सामग्री के भंडार की जगह या इससे संबंधित सक्रिय शोध स्थल पर भी कोई हमला किया जाए तो वहां से रासायनिक का रिसाव होगा या फिर उस क्षेत्र में ऐसी धुंध जरूर छाएगी, जिसकी शिनाख्त आसानी से की जा सके। जहां पर ये स्थित थे, वहां तो बस्ती भी है, जिससे ऐसे किसी हमले से नागरिकों का मारा जाना भी तय है। मगर इस हमले में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिससे संभव है कि यह हमला खाली पड़े भवनों पर किया गया। 

पश्चिमी ताकतों द्वारा इस हमले के बारे में जिस तरह के बढ़ा-चढ़ा कर दावे किए गए, उससे तो वहां काफी मौतें होनी चाहिए थी और ऐसा नुकसान होना चाहिए था, जिसकी भरपाई न हो सके। सीरिया ने सिर्फ तीन लोगों के घायल होने की सूचना दी है, जिससे इस हमले की प्रकृति और इरादे का पता चलता है। इस बात की पूरी संभावना है कि तनाव न बढ़ाने के लिए रूस को दी गई चेतावनी सीरिया के पक्ष में काम कर गई, जिससे वह अपनी मानवशक्ति को वहां से हटाने में सफल हो गया हो, लेकिन यदि वहां रासायनिक हथियारों का भंडार होता, तो उनकी तबाही के कुछ तो प्रमाण मिलते। अमेरिका इस हमले के एक पखवाड़े बाद भी यही दावा कर रहा है कि वह स्थिति का आकलन कर रहा है, इससे तो लगता है कि या तो यह हमला नाकाम था या फिर यह उसकी कोई चाल थी। पश्चिम जगत बरसों से सीरिया में असद को बेदखल करने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उसे एहसास हो गया होगा कि रूस और ईरान के समर्थन के कारण वह सफल नहीं होगा। सीरिया में रूस और ईरान ने अपने सैन्य अड्डे बनाकर पश्चिम के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। 

इस्राइल, जिसकी सरहद सीरिया से मिलती है और जिसने हाल ही में ईरान पर मिसाइलें दागी थीं, चौकन्ना होने के साथ ही चुप्पी साधे हुए है। उसकी सबसे बड़ी परेशानी क्षेत्र में ईरान का बढ़ता प्रभाव और पकड़ है। इसलिए वह रूस और तुर्की से बात कर रहा है, ताकि ईरान को नियंत्रित रखा जा सके। इस खेल का नया खिलाड़ी सऊदी अरब है, जोकि अमेरिका के साथ सैनिकों की तैनाती पर बात कर रहा है। 
ऐसा लगता है कि सीरिया पर किया गया मिसाइल हमला दुनिया को पश्चिम की चिंता से वाकिफ करवाने के लिए किया गया था, मगर यह असद को बेदखल न कर पाने की हताशा भी थी। इसलिए फ्रांसीसी राष्ट्रपति मेक्रों ने जब यह कहा कि इस हमले से कोई समाधान नहीं निकलेगा और यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सम्मान के लिए किया गया था, तो लगता है कि संभवतः वही ऐसे नेता हैं, जिसने इस बारे में सच कहा।
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