निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
ऐसे समय में, जब गांवों से शहरों की ओर पलायन, औद्योगिक व सेवा क्षेत्र का विस्तार और बेहतर जीवन सुविधाओं की तलाश ने शहरों पर अभूतपूर्व दबाव डाला हुआ है, तब केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा एक लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के साथ अर्बन चैलेंज फंड (यूसीएफ) को मंजूरी दिया जाना देश के शहरी भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम साबित हो सकता है। देश की लगभग 35 फीसदी आबादी शहरों में रहती है और अनुमान है कि 2047 तक यह आंकड़ा 50 फीसदी तक पहुंच जाएगा। यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का इंजन माने जाने वाले शहर, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 60 फीसदी से अधिक योगदान भी देते हैं, बुनियादी सुविधाओं की कमी, अव्यवस्थित यातायात, जलभराव, प्रदूषण, कचरा प्रबंधन और आवास संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। स्मार्ट सिटी मिशन और अमृत योजना से कुछ चीजें बेहतर हुई हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर निवेश की कमी और स्थानीय निकायों की वित्तीय कमजोरी प्रगति की राह में अड़चन बनी हुई है। अर्बन चैलेंज फंड इन्हीं कमियों को दूर करने का प्रयास है। इस फंड के तहत, केंद्र सरकार परियोजना की कुल लागत का 25 फीसदी तक केंद्रीय सहायता के रूप में देगी, लेकिन शर्त यह है कि कम से कम 50 फीसदी राशि बाजार से जुटाई जाए। हालांकि किसी भी योजना की कामयाबी केवल धन के आवंटन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके क्रियान्वयन की क्षमता पर भी निर्भर करती है। भारत के अधिकांश नगर निगम वित्तीय रूप से कमजोर हैं और उनकी आय के स्रोत भी सीमित हैं। आर्थिक सर्वेक्षण- 2026 के अनुसार भारतीय शहर अपने राजस्व से सकल घरेलू उत्पाद का 0.6 फीसदी से भी कम प्राप्त करते हैं। दूसरी चुनौती समावेशिता की है, क्योंकि अगर फोकस केवल बड़ी परियोजनाओं पर रहा, तो असमानता बढ़ सकती है। निष्पादन और पारदर्शिता का भी सवाल है। ऐसे में, परियोजना की मजबूत निगरानी और स्वतंत्र ऑडिट को शामिल करना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि परियोजनाएं वाकई लोगों की जरूरतों के अनुरूप बन सकें। इसके अतिरिक्त, देश के कई शहर बाढ़, हीटवेव और प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। लिहाजा, शहरी नियोजन में पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी महंगी पड़ सकती है। एक और महत्वपूर्ण पहलू है निजी निवेश की भागीदारी, जिसे सरकार शुरुआती प्रोत्साहन तो दे सकती है, लेकिन शहरी बुनियादी ढांचे की विशाल जरूरतों को पूरा करने के लिए पीपीपी मॉडल को मजबूत करना होगा। पारदर्शी नीतियां, समयबद्ध मंजूरी और जोखिम-साझेदारी की स्पष्ट व्यवस्था निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकती है। वस्तुत:, अर्बन चैलेंज फंड की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और निजी क्षेत्र कितनी गंभीरता और समन्वय से काम करते हैं।