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डिजिटल भारत: सड़क किनारे क्यूआर कोड, महामारी से बदली जीवन शैली और बढ़े विकल्प

Fri, 29 Dec 2023 07:10 AM IST
गुलाम अहमद अद्वैता काला
अद्वैता काला Published by: गुलाम अहमद Updated Fri, 29 Dec 2023 07:10 AM IST
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सार
परंपरागत गढ़ ध्वस्त हो रहे हैं। लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था और खर्च क्षमता के साथ भारतीयों के लिए बेहतर और ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे देसी ढंग से रहने को तैयार हैं, और वह भी बटन के केवल एक क्लिक के साथ।
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UPI Digital Payments changed lifestyle and choices of people after Covid-19 pandemic in India
UPI Digital Payments - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कोविड के बाद के परिदृश्य में न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में लोग अपनी जीवन शैली और इसके विकल्पों पर ज्यादा गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित हुए हैं। चाहे बड़े शहर हों या छोटे, लोग अब ज्यादा जागरूक और सुविचारित जीवन जी रहे हैं। इतनी ज्यादा तादाद में आकस्मिक मौतों के आघात के बाद लोगों की सोच में आया यह बदलाव स्वाभाविक था और स्वागतयोग्य भी। पर, जहां ये परिवर्तन सोच के स्तर पर आए हैं, वहीं, देश में आ रहे तेज बदलावों से प्रेरित होकर कई व्यवहारिक परिवर्तन भी देखने को मिले। इनमें सबसे प्रमुख ट्रेंड था, दैनिक जीवन में डिजिटल भुगतान का महत्व लगातार बने रहना।



जब प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड से पहले के वर्षों में डिजिटल भारत और डिजिटल भुगतान की बात की, तब इसे अपनाना वास्तविकता से काफी दूर समझा जा रहा था। लेकिन कोविड के समय में जब एटीएम तक जाना भी जोखिम से भरा था, तब डिजिटल भुगतान का विकल्प वाकई जीवन-रक्षक साबित हुआ। आज सड़क के किनारे नारियल का पानी बेचने वाले के पास भी क्यूआर कोड दिखता है और छुट्टे पैसे के लिए मारामारी अब अतीत की बात हो चली है। बस 'स्कैन और भुगतान' आज के युग का मंत्र बन गया है।


पिछले साल जब मैं अमेरिका और तुर्किये की यात्रा पर थी, तो मुझे आश्चर्य होता था कि जेब में हर वक्त पैसा लेकर चलना कितना असुविधाजनक हो सकता है। साल की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया के उप प्रधानमंत्री का डिजिटल भुगतान करते हुए एक वीडियो काफी चर्चा में रहा था। उनके चेहरे पर मौजूद आश्चर्य का भाव सब कुछ कह रहा था। वाकई जब भी डिजिटल भुगतान की बात आती है, भारत उसमें अग्रणी है। आने वाले वर्ष में हम कई दूसरी सेवाओं को भी डिजिटल होते देखेंगे। पर्यावरणीय चेतना बढ़ने के साथ स्मार्ट घर लोकप्रिय होते जाएंगे, जिनमें बिजली और पानी की बचत पर्यावरण और मितव्ययिता को प्रोत्साहित करेगी।

यू-ट्यूब का यदि विश्लेषण करें, तो वहां सबसे ज्यादा लोकप्रिय क्रिएटर 'वेलनेस' गुरु हैं। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों ने हमें सिखाया है कि स्वास्थ्य महज प्रतिरक्षा बढ़ाने का खेल है और इस 'इम्युनिटी' के काफी सारे समाधान हमारे खाने-पीने और जीवन शैली में निहित होते हैं। एप्पल वॉच से लेकर पहनने योग्य मेक इन इंडिया तकनीक तक, ज्यादा से ज्यादा भारतीय अब अपने मोबाइल फोन में फिटनेस ऐप का उपयोग करते हुए नजर आते हैं और शुगर के स्तर का भी हिसाब रख रहे हैं। दुनिया की डायबिटीज राजधानी कहलाने वाले अपने देश में जीवन शैली से जुड़ी इस बीमारी पर नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है।

अच्छी बात है कि जैविक खाद्य सामग्री की कीमतें, जो कभी काफी ऊंची हुआ करती थीं, अब मध्यवर्गीय उपभोक्ता को भी आसानी से सुलभ होने लगी हैं। अब पहले से कहीं ज्यादा लोग वार्षिक स्वास्थ्य जांच करवा रहे हैं। पहले जहां रक्त जांच की रिपोर्ट आने में हफ्तों का समय लगता था, अब कुछ ही दिनों या घंटों में रिपोर्ट मिल जाती है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से कन्टेन्ट बनाने के शौकीनों के अड्डे यानी यू-ट्यूब अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया पर भी बढ़त बना रहा है। ब्लॉगर यानी विजुअल ब्लॉग वाले सेलिब्रिटी बन गए हैं, जो प्रामाणिक व संबंधित अनुभव बताकर लोगों की जिंदगियों में घुले जा रहे हैं। सिनेमा की चमकदार दुनिया का अपना स्थान है, लेकिन अब उसे भी इन ब्लॉगरों से चुनौती मिल रही है। यह खबरों और कन्टेन्ट के लोकतंत्रीकरण का दौर है, जो अपनी जड़ें जमा रहा है। यू-ट्यूब पैसा कमाने का भी जरिया बनता है।

जीवन शैली हो या फिर फैशन, पूरी दुनिया में इन्हें लेकर पर्यावरण के अनुकूल ट्रेंड दिख रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। हाल ही में जब अभिनेत्री आलिया भट्ट सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार लेने पहुंची, तो उन्होंने अपनी शादी वाली साड़ी पहनी हुई थी। एक फैशन आइकन की तरफ से यह एक महत्वपूर्ण कदम था, जो युवा महिलाओं को फैशन में बने रहने के लिए भारी-भरकम खर्चों से निजात दिलाएगा। पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली और फैशन के क्षेत्र में भारत अग्रणी बन सकता है। बगैर किसी शोर के हम सदियों से यही करते आए हैं।

प्लास्टिक को पर्यावरण के लिए खतरनाक माने जाने और चरणबद्ध ढंग से इसे खत्म किए जाने की अवधारणा सामने आने से काफी पहले से भारतीय रसोइयों में दरवाजे के पीछे एक हुक होता था, जिसमें प्लास्टिक के थैलों को फिर से उपयोग के लिए लटका दिया जाता था। इसी तरह साड़ियां भी चाहें अमीर हो या गरीब, विरासत के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आती हैं। बाकी दुनिया बेशक अब इसे अपना रही है। लेकिन यह हमारे जीवन का तरीका रहा है। हमारी नई पीढ़ी को बस याद दिलाने की जरूरत है।

एक दूसरा क्षेत्र ट्रैवल ब्लॉगिंग का है, जो स्थानीय पर्यटन से जुड़ा है। ये ट्रैवल ब्लॉगर अपने ही देश की खोज कर रहे हैं। एक जिज्ञासु यात्री को जीवन भर उत्साहित रखने के लिए पर्याप्त विविधता अपने देश में है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसकी पहचान करते हुए डेस्टिनेशन वेडिंग भारत में और खासकर उत्तराखंड जैसे खूबसूरत स्थानों पर कराने का सुझाव दिया था। पर्यटन में रुचि और भारतीय मसालों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती ख्याति आने वाले वर्षों में ज्यादा बढ़ने की पूरी उम्मीद है।

अगर किसी को संक्षेप में बीते वर्ष और आने वाले वर्ष के बारे में बताना हो, तो उसे केवल 'स्व' का मंत्र देना काफी होगा, जिसका अर्थ है, 'भारतीय खरीदें, भारतीय बनें'। लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ती खर्च क्षमता के साथ भारतीयों के लिए बेहतर और ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे देसी ढंग से रहने को तैयार हैं, और वह भी बटन के केवल एक क्लिक के साथ।
(लेखक- पत्रकार, फिल्म कथा लेखक, ऑलमोस्ट सिंगल व ऑलमोस्ट देयर नामक चर्चित उपन्यासों की रचनाकार।)
 

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