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प्लीज, समर्थन वापसी की धमकी न दें

Wed, 03 Apr 2013 10:27 PM IST
राजेंद्र शर्मा
राजेंद्र शर्मा Updated Wed, 03 Apr 2013 10:27 PM IST
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upa govt and pm manmohan singh

सच पूछिए, तो जरूरत बिल्कुल नहीं थी। हाथ कंगन को आरसी क्या? फिर भी प्रधानमंत्री जी ने साफ कर दिया कि सरकार मजबूत है। सपा समर्थन वापस ले सकती है, पर सरकार मजबूत है। और क्यों न हो? तृणमूल कांग्रेस दोस्त से दुश्मन हो गई, पर सरकार मजबूत बनी रही।

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हैदराबादी इत्तेहाद वाले, झारखंडी विकास मंच वाले नाता तोड़कर चले गए, पर सरकार का कुछ नहीं बिगड़ा। द्रमुक वाले साझीदार से विरोधी हो गए, पर सरकार का बाल भी बांका नहीं हुआ। जब भीतरवालों के समर्थन उठाने से ही सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा, तब सपा के बाहर से समर्थन खींच लेने से कोई आसमान नहीं गिर पड़ेगा। अपने मनमोहन सिंह की सरकार को तो आदत-सी हो गई है-सरकार मजबूत हुई ज्यों-ज्यों समर्थन खींचा उन्होंने!
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यह अनहोनी भले ही हो, इसमें रहस्य नहीं है। फिर भला कोई बेनकाब क्या करेगा? माना कि लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। कोई सीबीआई की तरफ इशारे करता है, तो कोई फायदे के सौदों की दलीलें देता है। पर उन बातों को इतना सीरियसली लेने की जरूरत नहीं है। कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...
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सच तो यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार बाजार के भरोसे निश्चिंत है। बाजार यानी राजनीतिक सुपर बाजार और चुनने के लिए विकल्पों की भरमार। एक समर्थन खींचता है, तो दूसरा देता है और सरकार का छकड़ा चलता रहता है। इस बेभरोस जमाने में बेचारी स्थिरता की और क्या जान लीजिएगा!

वे नासमझ हैं, जो समर्थन खींचते जाने के साथ सरकार के मजबूत होते जाने को भ्रष्टाचार, मौकापरस्ती वगैरह से जोड़ते हैं। समर्थन देना और वापस लेना दो अलग-अलग और स्वतंत्र क्रियाएं हैं। हां! दोनों में डिमांड और सप्लाई का नाता जरूर है। डिमांड न हो, तो मजाल है कि कोई सप्लाई करने वालों से सिद्धांत छुड़वा दे।

और डिमांड हो, तो किसकी मजाल है कि आपूर्ति का रास्ता रोक ले। पार्टियां टूट जाती हैं, पर आपूर्ति का सिलसिला नहीं टूटता। पर कोई यह न समझे कि यह सिर्फ लेन-देन का मामला है। यह तो आस्था का मामला है। समर्थन खींचने वाले से समर्थन देने वाला हमेशा बढ़कर होता है।


तभी तो डॉक्टर साहब ने कह दिया है कि समर्थन रहे या जाए, पर उनकी सरकार सुधारों को रुकने नहीं देगी। जो समर्थन घटने से डर गया, समझो मर गया। समर्थन की बैसाखी पर टिका हौसला भी कोई हौसला है लल्लू!

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