फूजी और हिमालय का अभूतपूर्व मिलन
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प्रधानमंत्री की जापान यात्रा स्वतंत्रता के बाद के हमारे संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण बन जाएगी, ऐसा किसने सोचा था! शिंजो अबे और नरेंद्र मोदी शक्ति और दृढ़ इच्छाशक्ति के ऐसे दो लोकतांत्रिक ध्रुव हैं, जो वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन बदलने की हिम्मत रखते हैं। शिंजो अबे जब भारत आए थे, तब संसद को संबोधित करते हुए वह ऐसे पहले विदेशी अतिथि बने थे, जिन्होंने दारा शिकोह का जिक्र करते हुए, उनके दो महासागरों के मिलन की अवधारणा का जिक्र करते हुए भारत-जापान संबंधों के गहरे आयामों को रेखांकित किया था। मोदी की टोक्यो यात्रा उस दृष्टि से जापान के पवित्र और अत्यंत महिमावान पर्वत फूजी व भारत के उतने ही पवित्र हिमालय के मिलन को अभिव्यक्त करने वाली बन गई है।
भारत-जापान मैत्री का महत्व इसी से आंका जा सकता है कि इस संपू्र्ण एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ही विश्व के नए आर्थिक सूर्योदय का भरोसा निहित है। अमेरिका और यूरोप अस्ताचलगामी शक्तियां हैं, जो चीन, भारत और जापान के साथ पूर्वी एशिया में बाजार ढूंढ रही हैं। मलक्का की खाड़ी से बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर, दक्षिण और पूर्वी चीन सागर तथा प्रशांत महासागर नई शक्ति स्पर्धा और प्रभुत्व स्थापना की जद्दोजहद का क्षेत्र बने हैं। इस परिदृश्य में भारत ही ऐसा एकमात्र लोकतांत्रिक शक्तिशाली देश है, जो चीन के विस्तारवादी प्रभाव से पूर्वी एशिया एवं दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों को भयमुक्त कर सकता है।
आसियान देशों का भारत से बढ़ता संबंध चीन और अमेरिका के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करने का सामरिक प्रयास है। बीजिंग द्वारा पैदा की जा रही प्रतिकूल स्थितियों के बाद भी भारत ने दक्षिण चीन सागर में तेल अन्वेषण का कार्य जारी रखने का फैसला किया है। लिहाजा जापान और भारत जैसे दो महत्वपूर्ण देशों के बढ़ते संबंध जहां चीन को अतिक्रमण से रोकने में कारगर साबित होंगे, वहीं पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में भारत अपनी खोई स्थिति फिर हासिल करने में कामयाब हो सकेगा।
नया विश्व पश्चिम में नहीं, पूर्व में है, और इस दौर में यदि अमेरिका चीन के प्रभुत्व को नियंत्रित करने के उद्देश्य से दक्षिण-पूर्वी एशिया और प्रशांत महासागर में पूरी ताकत के साथ उपस्थिति दर्ज करा रहा है, तो चीन भी भारत तथा जापान की बढ़ती मैत्री को अपने लिए चेतावनी मानकर अपनी क्षेत्रीय प्रभुता बनाए रखने के लिए कोई कदम उठाने से हिचकेगा नहीं। इस लिहाज से देखें, तो मोदी-अबे सहयोग ने केवल भारत में ही आर्थिक पूंजी-निवेश तथा विकास का मार्ग नहीं खोला है, बल्कि पूरे पूर्वी एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया को भविष्य के प्रति नई आशा का संदेश दिया है।
बहरहाल, क्योटो और वाराणसी के मध्य सहयोग संबंधी समझौते, हिंदुस्तान ऐयरोनॉटिक लिमिटेड सहित छह संस्थानों से प्रतिबंध हटाने, रक्षा समझौते, मालाबार सैन्य अभ्यास बढ़ाने, भारत में 100 स्मार्ट शहर बनाने में सहयोग देने, 33.6 अरब डॉलर की जापानी पूंजी निवेश सहायता जैसी पहल भविष्य की पहली बंधनवार है, जो भारत को न सिर्फ एक साहसी आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा, बल्कि भू-राजनीतिक और निर्णायक शक्ति के तौर पर मान्य करने के लिए वर्तमान महाशक्तियों को बाध्य करेगा।
(लेखक राज्यसभा में भाजपा सांसद हैं)