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इस मर्ज की दवा क्या है

Thu, 11 Apr 2013 11:11 PM IST
सरिता बरारा
सरिता बरारा Updated Thu, 11 Apr 2013 11:11 PM IST
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unnecessary treatment

पहले जमाने में वैद्य या डॉक्टर मरीज की नब्ज देखकर उसकी बीमारी का पता लगा लेते थे, लेकिन अब मामूली-सा जुकाम भी हो जाता है, तो आपको डॉक्टरों द्वारा कई तरह के टेस्ट कराने और एंटीबायोटिक्स की लंबी लिस्ट थमा दी जाती है।

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किसी मरीज को दिल की बीमारी हो या न हो, उसे ईसीजी समेत कई तरह की जांच कराने के साथ-साथ यह भी बता दिया जाता है कि कौन से लैब से टेस्ट कराना बेहतर रहेगा।
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एक मरीज केवल एंग्जाइटी का शिकार है, यह एक न्यूरोलॉजिस्ट अच्छी तरह से जानता है, फिर भी वह एमआरआई सहित कई टेस्ट करवाने की सलाह देता है। आखिर विभिन्न तरह की ढेरों जांच की जरूरत क्यों पड़ रही है?
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पिछले वर्ष अमेरिकन बोर्ड ऑफ इंटरनल मेडिसिन ने कंज्यूमर रिपोर्ट नाम की एक संस्था के साथ मिलकर 'चूजिंग वाइजली' नामक एक अभियान की शुरुआत की थी, जिसका मकसद मरीजों और डॉक्टरों, दोनों को विभिन्न तरह के टेस्ट और दवाइयों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के प्रति आगाह करना था।

एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में उपचार के लिए खर्च होने वाली राशि का एक तिहाई हिस्सा गैरजरूरी उपचार पर खर्च हो जाता है।

बार-बार टेस्ट कराने और जरूरत से अधिक दवाइयों से सेहत को कितनी हानि पहुंच सकती है, यह मरीज को जानना बहुत जरूरी है।

जानकारी न होने पर जो भी टेस्ट या दवाई लिख दी जाती है, उसी के आधार पर उपचार कराना मरीज की मजबूरी बन जाती है।

डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों के बीच साठगांठ और विभिन्न टेस्ट लैब से उनका तय कमीशन आज की जमीनी हकीकत है, जिसे तोड़ना आसान नहीं है।

डॉक्टरों के लिए बनाई गई संहिता भी अक्सर बेमतलब साबित होती है।

पहले जहां फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को छोटे-मोटे उपहार दिया करती थीं, अब कॉन्फ्रेंस के नाम पर विश्व के पर्यटन स्थलों की सैर करवाती हैं और सोने के सिक्के और लैपटॉप जैसे महंगे उपहार देती हैं।

कई कंपनियां तो कारें तक देने को तैयार हो जाती हैं, बशर्ते कि डॉक्टर मरीजों को उनकी दवाइयां ही खरीदने की सलाह दें। इस मामले में नामी अस्पतालों के डॉक्टर भी पीछे नहीं हैं।

ऐसे हालात में एक मरीज के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कैसे जान पाए कि डॉक्टर की लिखी कौन-सी दवा या मेडिकल टेस्ट वास्तव में जरूरी है या फिर वह डॉक्टर की सलाह या उसे मिलने वाले कमीशन से प्रेरित नहीं है?

स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने स्वीकार किया है कि उनके मंत्रालय के पास डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों के बीच साठगांठ की सैकड़ों शिकायतें हैं।

योजना आयोग के एक विशेषज्ञ दल के अनुसार, फार्मा उद्योग ने 2008 में अपने वार्षिक कारोबार का 25 प्रतिशत हिस्सा जहां दवाइयों की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए खर्च किया वहीं शोध पर केवल सात प्रतिशत ही।

दूसरी ओर डॉक्टर जन औषधियों को प्रिसक्राइब नहीं करते, जबकि उनका दाम ब्रांडेड दवाइयों से 70 से 80 प्रतिशत कम होता है। विडंबना यह है कि भारत अमेरिका समेत कई देशों को जन औषधियों का निर्यात करता है।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे में इस साठगांठ की समस्या से निपटने के लिए कानून लाने की बात की गई है, जिसके तहत दवा कंपनियों को डॉक्टरों को ‘शोध, लेक्चरों, सफर और मनोरंजन के लिए दी जाने वाली राशि का खुलासा करना जरूरी होगा।

एक ऐसी नैतिक संहिता की भी बात की गई है, जिसके तहत फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को किसी भी तरह का उपहार, धन या दूसरी तरह के फायदे अपनी दवाइयों को बढ़ावा देने के लिए नही दे सकें और न ही वे ऐसी जगहों पर बैठकों या सम्मेलनों का आयोजन करें, जो मनोरंजन, खेल के आयोजनों या मौज मस्ती और अवकाश देने से जुड़ी हों।

अनैतिक तरीके अपनाने पर सजा देने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों की इस अनैतिक साठगांठ को तोड़ने के लिए केवल कानून ही कारगर हो सकता है।


दूसरी ओर जन औषधियों को बढ़ावा देने के साथ-साथ जागरूकता अभियान चलाए जाने की भी जरूरत है, जिससे मरीजों को उपचार के नाम पर न तो लूटा ही जा सके और न ही उनके स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़े।

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