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लद्दाख में विश्वविद्यालय के मायने

Wed, 26 Dec 2018 07:16 PM IST
Nootan Gupta गोविंद सिंह
गोविंद सिंह Published by: Nootan Gupta Updated Wed, 26 Dec 2018 07:16 PM IST
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University Matters in Ladakh
गोविंद सिंह
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने लद्दाख-कारगिल क्षेत्र को एक क्लस्टर यूनिवर्सिटी देकर एक ऐसा काम किया है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। वह ऐसे कई महत्वपूर्ण फैसले ले रहे हैं, जैसे कभी जगमोहन ने लिए थे। हालांकि इस फैसले से कारगिल के लोगों में कुछ निराशा दिखी, पर इससे इस पूरे अंचल में खुशी की लहर दौड़ रही है। एक उपेक्षित अंचल के लिए एक विश्वविद्यालय के क्या मायने हो सकते हैं, यहां के आंदोलनरत लोगों से बेहतर कौन जानता है! निश्चय ही इससे क्षेत्रीय असंतुलन की खाई कम होगी।  

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जम्मू-कश्मीर में कुल तीन अंचल हैं-जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख। जम्मू और कश्मीर खित्तों में 10-10 जिले हैं, तो लद्दाख में दो। जम्मू के 27,000 वर्ग किलोमीटर और कश्मीर के 15,000 वर्ग किलोमीटर की तुलना में लद्दाख का क्षेत्रफल 59 लाख वर्ग किलोमीटर है। लेकिन जम्मू की 53 लाख और कश्मीर की 69 लाख की तुलना में लद्दाख की आबादी मात्र 29 लाख है। इन तीनों में सबसे ज्यादा उपेक्षित क्षेत्र लद्दाख ही रहा है। चूंकि लोकसभा और विधानसभा में यहां का प्रतिनिधित्व नगण्य रहता है, इसलिए इनकी सुने तो कौन सुने? इसलिए आज तक इस अंचल के पास एक भी विश्वविद्यालय नहीं था। 

अब भी वहां कोई मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है, जबकि जम्मू और कश्मीर के पास छह-छह विश्वविद्यालय हैं। वैसे लद्दाख और कारगिल में भी चार डिग्री कॉलेज, कुछ पॉलीटेकनिक या अन्य संस्थान हैं, जो कश्मीर विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं। पर कश्मीर घाटी में हमेशा तनाव रहने के कारण वहां समय पर परीक्षाएं नहीं हो पातीं।

ऐसे में, लद्दाख के लोग उच्च शिक्षा के लिए अपने बच्चों को जम्मू, श्रीनगर, चंडीगढ़, दिल्ली और देहरादून जैसी जगहों में भेजते हैं। शिक्षा का स्तर कम होने से लद्दाख के लोग नौकरियों में पिछड़ जाते हैं। लद्दाख में तीन साल की डिग्री पांच साल से पहले पूरी नहीं हो पाती। लद्दाख के लोग हर बात के लिए कश्मीर पर निर्भर रहते हैं। राजधानी आधे समय के लिए श्रीनगर में होती है और आधे समय जम्मू चली आती है, जो लद्दाख वालों को बहुत दूर पड़ता है। साल में चार महीने यह मुख्य भूमि से लगभग कट जाता है। 

इसलिए लद्दाख अंचल एक अलग विश्वविद्यालय की मांग करता रहा है। उसकी इतनी-सी मांग भी अब तक पूरी क्यों नहीं हुई थी? सच यह है कि कश्मीर के नेताओं को घाटी के अलावा कुछ दिखता ही नहीं है। ऐसे में, राज्यपाल मलिक ने थोड़े समय में लद्दाखियों को जायज अधिकार देकर बहुत बड़ा काम किया है।  सरकार ने शुरुआत में इस विश्वविद्यालय को 65 करोड़ रुपये देकर जताया है कि वह सिर्फ घोषणा नहीं कर रही। निश्चय ही लद्दाख वासियों के लिए यह अपने आप को साबित करने का एक अच्छा मौका है। कई राज्यों में तो ऐसे भी विश्वविद्यालय हैं, जिन्हें दस साल में 10 करोड़ भी राज्य सरकार से नहीं मिले। 

जगह-जगह विश्वविद्यालय-कॉलेज खोल देने से भी कुछ नहीं होता, बशर्ते कि उन्हें पूरी तरह से सुविधाओं से लैस न किया जाए। अपनी जमीन और लोगों के प्रति समर्पित अच्छे शिक्षक हों, उन्हें हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध हों, ताकि इतने दुर्गम इलाके में जाने को वे तैयार हों, अच्छी प्रयोगशालाएं हों, अच्छे छात्रावास हों, तभी अच्छे विद्यार्थी निकलेंगे। यदि फिर भी धनी-मानी लोग अपने बच्चों को दिल्ली-चंडीगढ़ ही भेजते रहे, तो इसका कोई लाभ न होगा।

-लेखक केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू में प्रोफेसर हैं।
 
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