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2026 बनेगा भविष्य का शिल्पकार: यूएन का तीन समुदायों के लिए घोषित अंतरराष्ट्रीय नववर्ष, भारत के पास बड़ा अवसर

Tue, 30 Dec 2025 07:58 AM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Tue, 30 Dec 2025 07:58 AM IST
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सार
संयुक्त राष्ट्र द्वारा तीन समुदायों के लिए घोषित अंतरराष्ट्रीय नववर्ष भविष्य के शिल्पकार हैं, जिन्हें सफल बनाना सबका दायित्व है। मानवता आनंद, उल्लास, व आशाओं से लबालब भविष्य की इच्छा के साथ खिलती है। भारत के पास विश्व के सुनहले भविष्य के द्वार खोलने की क्षमता है।
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United Nations General Assembly has declared 2026 as International Year of Three Dimensionality
संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय (फाइल) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

वर्ष 2026 अद्भुत रंगों से सराबोर होगा। किसी वर्ष को इतनी संज्ञाएं, उपमाएं, और भाव कदाचित ही मिले होंगे, जितने 2026 को मिल गए। वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) जीवन-विकास के तीन अत्यंत महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालेगा, जो विश्व भर में जीवन, आजीविका, और पारिस्थितिकी तंत्र को उत्कृष्ट आकार देते हैं। समर्पित अंतरराष्ट्रीय वर्षों के माध्यम से, यूएन विश्व की सरकारों, समुदायों, और व्यक्तियों को अपने ग्रह की विशिष्टताओं को सीखने तथा प्रकृति व मानव कल्याण हेतु अनेक कार्यक्रमों में संलग्न होने के लिए आमंत्रित करता है। वर्ष 2026 में चतुर्दिक कल्याण के लिए तो संयुक्त राष्ट्र ने जैसे अपने हृदय-पटल ही खोल दिए हों!    

 
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2026 को त्रिआयामी अंतरराष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है: अंतरराष्ट्रीय चरागाह और पशुपालक वर्ष, सतत विकास के लिए स्वयंसेवकों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष, और महिला किसान का अंतरराष्ट्रीय वर्ष। एक वर्ष में तीन अंतरराष्ट्रीय वर्षों का अनुष्ठान! प्रत्येक अनुष्ठान सतत विकास में एक आवश्यक, किंतु तिरस्कृत-से योगदानकर्ता पर प्रकाश डालता है।


विश्व में सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक, और पारिस्थितिक विकास में चरागाहों, चरवाहों, महिला कृषकों और स्वयंसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान है। परंतु विडंबना है कि ये सभी योगदानकर्ता हमारी नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों के हाशिये पर हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को इन तिरस्कृतों के नाम कर उनकी उपेक्षा के कारण बनी खाई को भरने का सराहनीय प्रयास किया है।

चरागाह पृथ्वी के लगभग आधे भू-भाग पर फैले हैं। विश्व के पर्वतीय क्षेत्रों में तो लगभग 70 प्रतिशत हिस्से पर चरागाह ही हैं। विघटित वनों, घास के मैदानों, सवाना, आर्द्रभूमि, टुंड्रा, और मरुस्थलों की गोद में बसे ये अनूठे पारिस्थितिक तंत्र जैव-विविधता के घर हैं। करोड़ों पशुपालकों की आजीविका के आधार हैं। इनकी जैव-विविधता में पौधों और जंतुओं की अनेक दुर्लभ, संकटग्रस्त, और लुप्तप्राय प्रजातियां हैं, जो तब तक संरक्षित हैं, जब तक ये सुरक्षित हैं। चरागाहों पर निर्भर पशुपालक अपने पशुधन के जरिये करोड़ों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। लगभग 150 देशों में रहने वाले और विश्व की कम से कम एक-चौथाई भूमि का प्रबंधन करने वाले ये पशुपालक लगभग एक अरब पशुओं को पालते हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में तो समुदायों की सारी कृषि क्रियाएं पशुधन पर ही निर्भर हैं। चरवाहों की जीवनशैली प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करती है, स्थानीय व स्वदेशी सामुदायिक ज्ञान को जीवंत और संवर्धित रखती है, तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करती है। चरागाहों तथा चरवाहों के अंतराष्ट्रीय वर्ष में चरवाहा समुदायों के लिए भूमि व प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करने, उनकी गतिशीलता को समर्थन देने तथा चरागाह प्रबंधन, पुनरुद्धार, पशु सेवाओं एवं उचित मूल्य शृंखलाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। समावेशी संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करके, इस वर्ष का उद्देश्य पशुपालकों की आजीविका में सुधार लाना व टिकाऊ चरागाह प्रबंधन तथा सतत विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाना है।

कृषि उत्पादन में महिला किसानों की भूमिका पर प्रायः चर्चा नहीं होती। खेतों में बीज बोने से लेकर रोटी बनाने तक और संपूर्ण सस्य क्रियाओं के ज्ञान से लेकर नवाचार तक महिलाएं केंद्रीय भूमिका में हैं। अनेक आदिवासी और पर्वतीय क्षेत्रों में तो संपूर्ण कृषि क्रियाएं महिलाओं द्वारा ही संचालित होती हैं। महिलाओं की बहुसंख्या लघु और सीमांत किसान, मौसमी श्रमिक, मछुआरे, पशुपालक, मधुमक्खी पालक, वनपाल, प्रसंस्करणकर्ता, व्यापारी, वैज्ञानिक, पारंपरिक ज्ञानधारक और ग्रामीण उद्यमी की भूमिकाओं में देखी जा सकती है। उनका महत्वपूर्ण योगदान खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सरोकारों तथा संस्कारों को अक्षुण्ण रखना है। फिर भी, उन्हें प्रायः वह मान्यता नहीं मिलती, जो मिलनी चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय महिला कृषक वर्ष का उद्देश्य कृषि में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देना, उनके सशक्तीकरण को बढ़ावा देना तथा खाद्य सुरक्षा में योगदान देना है। महिला किसानों को संसाधनों तक पहुंच, भूमि स्वामित्व और निर्णय लेने के मामलों में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस वर्ष का उद्देश्य इन असमानताओं को दूर करना तथा कृषि में उनकी भागीदारी को समर्थन देने वाली नीतियों को प्रोत्साहन देना है। अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष लैंगिक अंतर को कम करने, संसाधनों और सेवाओं तक पहुंच में सुधार लाने तथा कृषि खाद्य प्रणालियों में महिला नेतृत्व को समर्थन देने को बढ़ावा देगा।

विश्व कल्याण के लिए जो अपना सर्वस्व देने को तैयार रहता है, उसके अंदर एक स्वयंसेवक छिपा होता है। मानव समाज में स्वयंसेवकों की कमी नहीं। प्रति दिन लाखों स्वयंसेवक लोगों को परामर्श देकर, स्वास्थ्य प्रणालियों का समर्थन करके, पर्यावरण संरक्षण प्रक्रियाओं को बल देकर, अथवा आपात स्थितियों में राहत देकर सामाजिक भलाई के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। स्वयंसेवा सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति को एक सटीक दिशा देती है। स्वयंसेवकों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष अधिकाधिक लोगों को स्वयंसेवा के लिए प्रोत्साहित करेगा। यह इस बात पर प्रकाश डालने का अवसर है कि किस प्रकार स्वयंसेवा लोगों को जोड़ती है, स्थानीय समाधान को आगे बढ़ाती है तथा स्थायी प्रभाव पैदा करती है।

त्रिआयामी अंतरराष्ट्रीय नववर्ष सचमुच हमारे लिए भविष्य के शिल्पकार की तरह आ रहा है, जिसे सफल बनाना हमारा दायित्व है। मानवता सदैव एक आनंद, उल्लास, और आशाओं से लबालब भविष्य की प्रबल इच्छा के साथ खिलती है। जीवन का यही मूल है। त्रिआयामी कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर उपस्थित हुआ नववर्ष 2026 सुख, शांति, आनंद, सर्व कल्याण और संतोष के साथ जीने वाले समाज की आशाओं को सींचने का संकल्प लेकर आया है। भारत के सुनहले भविष्य के द्वार तभी खुलेंगे, जब आतंकवाद के विष-बीज निर्मूल होंगे। इसके लिए सार्थक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की आवश्यकता है। भारत संपूर्ण विश्व के लिए सुनहले भविष्य के द्वार खोलने की क्षमता रखता है। बस राजनीतिक इच्छा-शक्ति को जगाने भर की देर है।  edit@amarujala.com
 
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