रक्षा क्षेत्र की जरूरत समझनी होगी
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रक्षा बजट की अपर्याप्तता को परिभाषित करने के लिए हाथ मलना जैसे मुहावरे का प्रयोग भी संभवतः काफी नहीं है। यह घोषित करने से ज्यादा छिपाने की एक नई कला है। पहले की तरह इस बार का रक्षा बजट भी वित्त मंत्री द्वारा पेश वित्त वर्ष 2020-21 के राष्ट्रीय बजट में छिपा हुआ है। सरकार एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अपनी आक्रामक मुद्रा, दूसरी ओर, इसके लिए जीडीपी के महज 1.5 फीसदी के बराबर आवंटन के अंतर्रविरोधों की व्याख्या करने में संभवतः सक्षम नहीं है। तथ्य यह है कि 2016 की नोटबंदी के चलते जीडीपी 2017 के बाद हर साल कम से कम 40 अरब डॉलर के संसाधनों को खोता जा रहा है। इस बार रक्षा बजट में 4,71,378 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह उन वस्तुओं की किस्त का भुगतान करने भर के लिए ही पर्याप्त होगा, जिनके ऑर्डर दिए गए हैं और जो पाइपलाइन में हैं।
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हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार रक्षा बजट में करीब 40,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है, लेकिन यह लगभग 3.56 फीसदी की वैश्विक मुद्रास्फीति दर से प्रभावित है, जिस कारण आवंटन में वृद्धि लगभग महत्वहीन हो गई है। यह रक्षा बजट काफी महंगे राफेल लड़ाकू विमानों, एम777 अल्ट्रालाइट हॉवित्जर, के-9 वज्र स्वचालित तोप, स्वदेशी रूप से विकसित धनुष और एस-400 वायु रक्षा तंत्र के आदेशों पर बकाये का भुगतान करने के लिए ही पर्याप्त होगा। लेकिन इस बात को लेकर गहरा संदेह है कि क्या भारतीय नौसेना 200 जहाजों या पी 8 आई समुद्री टोही विमानों को हासिल करने की अपनी योजना को आगे बढ़ाने की स्थिति में होगी। सरकार द्वारा किए गए वादों को ध्यान में रखते हुए सवाल उठता है कि क्या 83 तेजस एमके 1ए विमानों के आदेश हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को दिए जाएंगे और उसके बकाये का शीघ्रता से भुगतान हो पाएगा।
और यह कि 114 लड़ाकू विमानों को हासिल करने के लिए सरकार अपनी जड़ता दूर करेगी और स्क्वॉड्रन की घटती संख्या के मद्देनजर 28 स्क्वॉड्रन को बढ़ाने की दिशा में अगला कदम उठाएगी। हमारी निगरानी क्षमता के कुल विस्तार की समीक्षा, व्यवस्था में तत्काल आमूल-चूल परिवर्तन और व्यापक विस्तार की जरूरत है, जिससे परहेज किया जा रहा है। बालाकोट हमले से सीखे गए सबक को नजरंदाज नहीं किया जा सकता और एयरबोर्न वार्निंग ऐंड कंट्रोल सिस्टम (वायुक्षेत्र की रक्षा के लिए लंबी दूरी रडार निगरानी एवं नियंत्रण प्रणाली) के बेड़े को बढ़ाए जाने की जरूरत है, जो रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की क्षमता के दायरे में है।
इसी तरह क्या सरकार सीमा क्षेत्र की सड़कों एवं बुनियादी ढांचों की रणनीतिक परियोजनाओं और एसॉल्ट राइफल के उन्नत प्रकारों व सैनिकों के पुराने हथियार बदलने के लिए जरूरी छोटे हथियार खरीदने की स्थिति में होगी। क्या यह उम्मीद करनी चाहिए कि नौसेना के लिए 24 मल्टी मिशन हेलिकॉप्टरों की खरीद के लिए 3.5 अरब डॉलर के अतिरिक्त सेना के लिए छह अपाचे सशस्त्र हेलिकॉप्टर सौदे के लिए भी आवंटन किया गया होगा, जिस पर इसी महीने अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे के दौरान हस्ताक्षर किए जाएंगे। ये केवल कुछ चिंताएं हैं। माना जा सकता है कि सरकार सामरिक खतरे की प्रकृति को समझती और मानती है, क्योंकि रेत में मुंह छिपाने के शुतुरमुर्गी रवैये से काम नहीं चलता।
अपने बयान में नए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ एवं सैन्य मामलों के सचिव ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि रक्षा क्षेत्र में संसाधनों की भारी कमी है, लेकिन इसे तो सब जानते ही हैं। उनका मानना है कि रक्षा क्षेत्र में प्राथमिकताओं को सामने रखने से धन की कमी आड़े नहीं आएगी। लेकिन कैसे? वास्तव में यह वही है, जो हम वर्षों से कर रहे हैं, क्योंकि कोई अन्य विकल्प नहीं है, और इस प्रकार हम बहुत पिछड़ गए हैं। हम यह भूल गए हैं कि राष्ट्र-राज्य शांतिकाल के दौरान सैन्य क्षमताओं का निर्माण करते हैं, ताकि सेना प्रशिक्षित हो सके और आकस्मिकताओं के लिए तैयार रहे। हम संकट के आने का इंतजार नहीं कर सकते। कारगिल का उदाहरण हमारे सामने है।
दूसरी तरफ बलों को आधुनिक बनाने की खातिर संसाधन प्राप्त करने के लिए रक्षा भूमि को पट्टे पर देने का सीडीएस का प्रस्ताव खतरनाक है। यह दो वक्त की रोटी के लिए परिवार का जेवर बेचने की तरह है। वर्ष 1991 में रक्षा प्रतिष्ठान के भीतर डेवलपर्स लॉबी (जिनकी नजरें महानगरीय केंद्रों में अत्यंत मूल्यवान रक्षा भूमि पर लगी थीं) के इशारे पर इस तरह की धारणा पर विचार किया गया था। इस धारणा को विवेकवान नेतृत्व द्वारा शुरू में ही खत्म कर दिया गया था। यह देखना बेहद चिंताजनक है कि फिर एक बार रक्षा भूमि की बिक्री का मुद्दा सिर उठा रहा है और रक्षा भूमि को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की तरह ही देखा जा रहा है। राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार रक्षा बांड की बिक्री पर विचार क्यों नहीं करती?
सबसे दुखद बात यह है कि पूर्व सैनिकों की पेंशन के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बातें की जाती हैं, जबकि मात्र 55 फीसदी पेंशन परिव्यय उनके लिए है। जबकि इस बारे में मीडिया में कोई रिपोर्ट नहीं है कि जुलाई, 2019 के बाद से सरकार ने ‘वन रैंक वन पेंशन’ (ओआरओपी) में कोई संशोधन नहीं किया है। पिछले वेतन आयोगों और कई अन्य वजहों से होने वाली विसंगतियां दूर करने का कोई प्रयास नहीं है। पूर्व सैनिकों के संगठन ओआरओपी क्रियान्वयन को तार्किक रूप से युक्तिसंगत बनाने के लिए 2016 से सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं और उनके प्रयासों को सरकार के वकीलों द्वारा खत्म किया जा रहा है, जो 'तैयार' नहीं होने के कारण सुनवाई स्थगित करने की मांग करके जानबूझकर कार्यवाही में देरी कर रहे हैं। एक बात और जो लोगों की नजर में नहीं है, वह यह कि 2017 के बाद से सेवारत सैन्यकर्मियों को अपने पानी और बिजली का पूरा बिल भरना पड़ता है, जबकि दिल्ली के अनेक नागरिकों को यह मुफ्त में मिलता है।