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पाकिस्तानी सेना की करतूतों को समझें

Thu, 08 Aug 2013 08:05 PM IST
शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Updated Thu, 08 Aug 2013 08:05 PM IST
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Understand the misdeeds of Pakistan Army

कश्मीर के पुंछ सेक्टर में पाकिस्तानी हमले में पांच भारतीय जवानों के शहीद होने की घटना अपवाद नहीं है। इस वर्ष जनवरी में पुंछ सेक्टर में ही पाकिस्तानी सैनिकों ने हमारी सीमा में घुसकर दो भारतीय जवानों के सिर काट लिए थे। पाकिस्तानी सेना अपनी इन करतूतों पर आतंकवादियों की आड़ लेकर पर्दा डालने की कोशिश करती है। मसलन, कारगिल जैसे बड़े ऑपरेशन को आज तक पाकिस्तानी कश्मीरी आतंकवादियों का हमला ठहराते हैं। असल में यह पाकिस्तानी सेना की गहरी साजिश है, जिसे समझने की जरूरत है।

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आगरा शिखर वार्ता के दौरान जनरल परवेज मुर्शरफ ने कश्मीरी आतंकवादियों को स्वतंत्रता सेनानी कहकर उनकी गतिविधियों को सही ठहराने की कोशिश कर सबको हैरत में डाल दिया था। परंतु मैंने अपने 37 वर्ष के सेना काल में यह देखा है कि अग्रिम क्षेत्रों में, जहां सेना तैनात होती है, सिवाय सेना के और कोई आ-जा नहीं सकता, क्योंकि पूरे क्षेत्र को सेना ने अपनी निगरानी में लिया होता है। जहां पर निगरानी नहीं होती, वहां बारूदी सुरंगें बिछी होती हैं और आमतौर पर इस कारण कोई भी आम आदमी इन क्षेत्रों में कदम नहीं रखता। जो कोई इस क्षेत्र में जाता भी है, तो वह सेना की मिलीभगत से ही जा सकता है। इसी कारण जासूसों को या आतंकवादियों को भारतीय सीमा में घुसाने के लिए पाकिस्तानी सेना बेवजह फायरिंग या खराब मौसम का सहारा लेती है। लिहाजा पाकिस्तानी सेना का यह कहना कि भारत के पांच जवानों की मौत में उसका कोई हाथ नहीं है, सरासर झूठ है।
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जब भी इस तरह की कोई घटना होती है, आवाजें उठने लगती हैं कि हमें पाकिस्तान सरकार से बातचीत बंद कर देनी चाहिए, या फिर उसे करारा जवाब देना चाहिए, इत्यादि-इत्यादि। इस बार भी संसद से लेकर सड़क तक यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा है। असली मुश्किल तो यही है कि पाकिस्तान में बात किससे की जाए? वाकई यह आकलन करने का वक्त है कि पाकिस्तान में सत्ता का असली केंद्र कहां है।
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विभाजन के बाद से आज तक पाकिस्तान लोकतंत्र का दिखावा करता रहा है, पर असली सत्ता सेना के हाथों में ही रही है। फील्ड मार्शल अयूब खां से लेकर जनरल परवेज मुशर्रफ तक वहां पांच सैनिक तानाशाहों ने लंबे समय तक राज किया है। कुछ समय के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव में लोकतांत्रिक सरकारें जरूर आती रही हैं, लेकिन वे भी केवल आंतरिक प्रशासन तक ही सीमित रहीं, जबकि पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति पर हमेशा से सेना का कब्जा रहा है।

बीते 20 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र में कई ऐसे प्रस्ताव पारित हुए हैं, जिनके तहत अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों पर आर्थिक तथा राजनयिक पाबंदियां लगाई गई हैं। इसी दबाव के कारण मुशर्रफ को सत्ता छोड़नी पड़ी। पाकिस्तान की हालत जर्जर है, वहां विदेशी निवेश न के बराबर है। भुगतान संतुलन का भारी संकट पैदा हो गया है और वहां की महंगाई 18 फीसदी तक चली गई, जो एक विफल राष्ट्र की निशानी है। पूरे देश में केंद्रीय कानून लागू नहीं है, और कई हिस्सों में तो कबाइली न्याय व्यवस्था चल रही है। खबरें ये भी आती हैं कि वहां स्थित आतंकी शिविरों के लिए सरेआम चौराहों पर चंदे एकत्र किए जाते हैं। आईएसआई इनमें आतंकी गुटों का संचालन और प्रशिक्षण का इंतजाम करती है। कुल मिलाकर कहें, तो आतंकवाद पाकिस्तान की विदेश नीति का छिपा हुआ हिस्सा है।

नवाज शरीफ ने चुनावी वायदों में भारत से संबंध सुधारने की बात कही थी, पर चुनाव जीतने में उन्होंने जिस तरह हिजबुल मुजाहिदीन जैसे गुटों से मदद ली, उसके बाद वह इन आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने की स्थिति में नहीं हैं। अफगानिस्तान में घटनाक्रम बदल रहा है, उसका फायदा भी आईएसआई उठाना चाहती है। ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए जरूरी है कि वह विश्व समुदाय को पाकिस्तान की करतूतों से अवगत कराए और अमेरिका और जापान जैसी बड़ी आर्थिक ताकतों को पाकिस्तान पर आर्थिक सख्ती लगाने के लिए राजी करे।


भारत सरकार को भी पाकिस्तान से चल रहे व्यापार पर दोबारा विचार करना चाहिए। पड़ोसी देश को एहसास दिलाना चाहिए कि इस प्रकार की कुत्सित चालों के सामने हमारी सेना मजबूर नहीं है, बल्कि मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है।

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