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बयानों का गहरा मतलब निकालने पर ही पाकिस्तान की साजिश समझ में आएगी

मारूफ रजा Updated Wed, 24 Apr 2019 08:20 AM IST
इमरान खान, पाक प्रधानमंत्री (फाइल फोटो)
इमरान खान, पाक प्रधानमंत्री (फाइल फोटो)
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लगता है, भारत की अन्य राजनीतिक चुनौतियों की तुलना में और कभी-कभी उससे भी अधिक पाकिस्तान का जिक्र और उससे निपटने के तरीके प्रधानमंत्री मोदी और उनकी चुनावी टीम के प्रचार अभियान का एक बड़ा हिस्सा है। इस बीच पाकिस्तान से आए दो प्रमुख बयान यहां सुर्खियों में रहेः पहला बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा है कि अगर मोदी की मौजूदा सरकार चुनाव जीत जाती है, तो भारत के साथ शांति स्थापित करने की ज्यादा संभावना रहेगी।
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और दूसरा बयान दिल्ली स्थित पाकिस्तान के निवर्तमान उच्चायुक्त सोहेल महमूद का है, जिन्होंने कहा कि इन चुनावों के बाद पाकिस्तान भारत से फिर रिश्ते सुधरने की उम्मीद करता है। पर इन बयानों का गहरा मतलब निकालने पर ही पाकिस्तान की साजिश समझ में आएगी।

पाकिस्तान की जानकारी रखने वाले एक पश्चिमी पर्यवेक्षक का मानना है कि एक वजह से पाकिस्तानी सेना भारत में सख्त नेतृत्व चाहती है, ताकि वह लंबे समय से जारी अपने रुख को बनाए रखे कि भारत से पाकिस्तान को खतरा है। इससे वहां के सैन्य प्रतिष्ठान को पाकिस्तान पर अपनी राजनीतिक-आर्थिक पकड़ बनाए रखने और वहां के बजट के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा जमाने का मौका मिलेगा।

भारत को बार-बार वार्ता का प्रस्ताव देते हुए हो सकता है कि इमरान खान पाकिस्तान के नए चेहरे के रूप में उभरना चाहते हों। पर यह मानना कठिन है कि भारत से लड़ने की पाकिस्तान की गहरी इच्छा को वह आसानी से बदल दें। वास्तव में भारत की उपेक्षा ने पाकिस्तान को सबसे ज्यादा परेशान किया है, जैसे कि पठानकोट में एयर बेस पर हमले के बाद द्विपक्षीय वार्ता रद्द की गई।

पाकिस्तान का सैन्य-राजनीतिक नेतृत्व यह दिखाना चाहता है कि वह अतीत को पीछे छोड़कर भारत के साथ वार्ता करना चाहता है। ऐसे बयानों के जरिये पाकिस्तान अपनी एक जिम्मेदार परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र की छवि बनाना चाहता है और पश्चिम की आशंकाओं को दूर करते हुए यह बताना चाहता है कि भारत एक लड़ाकू पड़ोसी है। यह एक ऐसी रणनीति है, जो अतीत में काम कर सकती थी, पर भारत के हालिया कूटनीतिक प्रयासों की बदौलत पाकिस्तान की इस कहानी को अब कोई नहीं मानेगा।

हमारे सशस्त्र बल को अपने इस तकलीफदेह पड़ोसी से निपटने को लेकर कोई भ्रम नहीं है, लेकिन भारत के राजनयिकों ने मान लिया है कि अंततः भारत को पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की जरूरत होगी और यह जितनी जल्दी हो, उतना बेहतर! ये भारत के वे लोग हैं, जिन्होंने भारत की विभिन्न सरकारों को पाकिस्तान के साथ बातचीत करने के लिए मजबूर किया है।

आश्चर्य की बात है कि हमारा विदेश मंत्रालय पाकिस्तान की इस साजिश को क्यों नहीं समझ रहा है। भारत-पाक संबंधों पर वार्ता का असली नतीजा तभी मिलेगा, जब पाकिस्तान की सेना सार्वजनिक रूप से भारतीय नेतृत्व के साथ बातचीत में शामिल होगी। पर हमारे नेता हमेशा ऐसा करने से कतराते रहे हैं। वे मानते हैं कि हमें पाकिस्तान को लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करनी चाहिए। इससे पता चलता है कि हमारे नीति निर्माता कितने भोले हैं। पाकिस्तान की सत्ता की चाबी वहां की सेना के पास है।

इसलिए भारत के नीति निर्माताओं को सबसे पहले यह जानना चाहिए कि पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर करने से उसे क्या लाभ हो सकते हैं। अगली बार अगर हम उससे बातचीत करते हैं, तो उसमें सेना को भी शामिल करना चाहिए और पाकिस्तान को सख्त संदेश देना चाहिए कि अगर वह कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद को प्रायोजित करता है, तो भारत अपने तरीके से पलटवार करेगा। ऐसा करने पर ही दुनिया भारत के साथ खड़ी होगी और समर्थन देगी।

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