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अनब्रोकन-द अनटोल्ड स्टोरी: गुनाह और ग्लैमर की धुंध
Sun, 10 Sep 2023 08:00 AM IST
शिव शरण शुक्ला
नवीन चौधरी, लेखक
नवीन चौधरी, लेखक
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Sun, 10 Sep 2023 08:00 AM IST
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शीना बोरा व इंद्राणी मुखर्जी
विस्तार
कहा जाता है कि जिंदगी कई बार किसी कहानी या किसी फिल्म से अधिक विचित्र मोड़ लिए और अचरज भरी होती है। इस बात पर आपको अधिक यकीन तब होता है, जब इंद्राणी मुखर्जी द्वारा लिखित अनब्रोकन-द अनटोल्ड स्टोरी पढ़ते हैं।
25 अगस्त, 2015 को इंद्राणी मुखर्जी को उनकी अपनी ही बेटी शीना बोरा की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस मामले में उनके पूर्व पति संजीव खन्ना सह-अभियुक्त थे। गिरफ्तारी के समय इंद्राणी मुखर्जी स्टार टीवी के पूर्व सीईओ पीटर मुखर्जी की पत्नी थीं। बाद में पीटर को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इस किताब के जरिये इंद्राणी मुखर्जी मीडिया और पीटर मुखर्जी द्वारा लगाए तमाम आरोपों पर अपना पक्ष उसी बोल्ड अंदाज में रखती हैं, जिसके लिए वह जानी जाती थीं।
जब शीना बोरा हत्याकांड की खबर ब्रेक हुई, तो पूरा देश हैरान था कि क्या एक मां पैसे के लिए अपनी बेटी की हत्या कर सकती हैं? इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड के बाद पूरा देश इंद्राणी मुखर्जी से नफरत करने लगा था। इंद्राणी मुखर्जी इस किताब में पूरा प्रयास करती हैं कि उनके ऊपर लगे दाग साफ हो जाएं। किताब कई जगह उनके प्रति सहानुभूति उत्पन्न करती है, वहीं कई सवाल भी खड़े करती है। किताब में कई जगह इंद्राणी मुखर्जी के कथन और व्यवहार के बीच जबर्दस्त विरोधाभास दिखता है।
किताब की प्रस्तावना में इंद्राणी शुरू से स्वयं को एक अलग, प्रभावी और ऐसी महिला के रूप में दर्शाती हैं, जिसे कभी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ा। वह जेल से निकलते ही स्टारबक्स की ब्लैक कॉफी की इच्छा जाहिर करती हैं। वह किताब की प्रस्तावना में कुछ साथी कैदियों के किस्से बताते हुए लिखती हैं कि उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि गरीब लोग किस तरह इतने कम में गुजारा करते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन में कहीं ऐसी कमी नहीं हुई। वहीं आगे अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए वह जिक्र करती हैं कि कैसे उनके पास घर से सहयोग समाप्त होने के बाद पैसे नहीं थे और कमाने के लिये उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ी।
यह किताब समाज के उसे गंदे चेहरे को उजागर करती है, जहां परिवारों में हुए यौनिक अपराध इज्जत की खातिर दबा दिए जाते हैं। इंद्राणी मुखर्जी का उनके पिता ही बलात्कार करते हैं और शीना बोरा उन्हीं से उत्पन्न पुत्री है। यह सोचना ही बड़ा कष्टप्रद है कि किसी महिला की अपनी बेटी ही उसकी बहन भी है। उसके पिता ही उसकी बेटी के भी पिता हैं। इंद्राणी की मां द्वारा पिता को माफ कर देना पाठक को द्रवित करता है और क्षोभ से भर देता है।
इंद्राणी मानती हैं कि उनके महत्वाकांक्षी, सफल और सुंदर होने के कारण मीडिया, उनके पूर्व साथी और समाज का एक वर्ग उन पर हमलावर रहा है। वह अपने महत्वाकांक्षी होने को स्वीकार करती हैं और साथ ही साथ ‘गोल्ड-डिगर’ होने के आरोप को नकारती हैं। इस आरोप की वजह संभवतः यह रही कि 14 वर्ष की आयु में इंद्राणी जिन-जिन पुरुषों की तरफ आकर्षित हुई या शादी की उनमें कुछ समानताएं लगातार दिखती हैं, वे सभी सुंदर और अमीर हैं। इंद्राणी यह बताने का प्रयास करती हैं कि किसी अच्छे दिखते इंसान को पसंद करना स्वाभाविक है और चूंकि वह अमीर भी है, सिर्फ इसलिए गोल्ड-डिगर का आरोप समाज की मानसिकता को दर्शाता है।
लेकिन यहीं पर कुछ विरोधाभास नजर आते हैं। इंद्राणी शीना बोरा को मजबूरी में जन्म देती हैं, अपनी मानसिक स्थिति बताती हैं, लेकिन इस स्थिति में उनका साथ देने वाले और सब कुछ जानते हुए बेटी को अपना नाम देने वाले दोस्त सिद्धार्थ दास से दो वर्ष के बाद विवाह नहीं करतीं। इंद्राणी ने कई जगह लिखा कि सिद्धार्थ न आर्थिक रूप से सक्षम था, न ही दिखने में अधिक आकर्षक। संजीव खन्ना में दोनों गुण होने, प्रेम होने के बाद इनका बिखराव संजीव की असफलता के साथ ही शुरू होता है। किताब इस बिखराव का दोष पूरी तरह संजीव के व्यवहार को ही देती है।
इंद्राणी अपने पति संजीव खन्ना को छोड़ती हैं, क्योंकि संजीव खन्ना स्वयं के बिजनेस में सफल नहीं थे और इंद्राणी बार-बार अपनी पहचान बनाने के लिए अपना काम करने के लिए इच्छा जाहिर करती थीं, जिसे संजीव ने स्वीकार नहीं किया। इंद्राणी का खुद को स्थापित करना ज्यादा महत्वपूर्ण था, लेकिन यहीं पर जब वह पीटर मुखर्जी के साथ जाती हैं और पीटर रिटायरमेंट लेकर विदेश में सेटल होने की बात करते हैं, तो इंद्राणी अपने बिजनेस और अन्य सभी चीजों को छोड़कर उनके साथ जाने को तैयार हैं। वह लिखती भी हैं, मैं चाहती तो ऐसा भी कर सकती थी, मेरे पास यह भी हो सकता था, लेकिन फिर भी मैंने पीटर को चुना।
इंद्राणी पीटर मुखर्जी से मुलाकात के दौरान उनके लुक्स से अप्रभावित होती हैं, बल्कि हल्का मजाक भी उड़ाती हैं, मगर उन्हें पसंद करने की वजह यही बताती हैं कि पीटर को जो चाहिए था, उसे पाने का रास्ता वह खोज लेता था। पीटर उस समय स्टार टीवी के सीईओ थे।
इंद्राणी की तमाम सफाइयों के बीच उनकी छोटी बेटी विधि मुखर्जी (जो संजीव खन्ना से उत्पन्न हुई) की किताब डेविल‘स डॉटर का जिक्र जरूरी हो जाता है। जहां इंद्राणी अपने हर उस कार्य को सही साबित करने का प्रयास करती हैं, जिन पर सवाल थे, अपने से दूर की गई पहली बेटी शीना बोरा के लिए उठे दर्द को भावुक तरीके से बताती हैं, वहीं विधि अपनी किताब में लिखती हैं कि वह अपनी मां को नहीं समझ पाईं। उन दोनों के बीच तमाम विषयों पर मतभेद रहे और इंद्राणी का दबाव उसने महसूस किया। यह इंद्राणी मुखर्जी द्वारा बनाई छवि के विपरीत है। विधि कहती हैं कि उनकी किताब मां को लिखी एक लंबी चिट्ठी है, क्योंकि वह खुद उन्हें जानना चाहती हैं। गौरतलब है विधि की किताब को छापने से रोकने के प्रयास हुए थे, किंतु इंद्राणी किताब में कहती हैं कि उन्हें किताब से कष्ट तो था, लेकिन वह अपनी बेटी को उसका दर्द बयान करने देना चाहती थीं। यह विरोधाभास का एक और उदाहरण है।
शीना बोरा केस में पौने सात साल जेल में काटने के बाद इंद्राणी अब जमानत पर हैं, क्योंकि उनके खिलाफ कोई भी मजबूत सबूत नहीं है। इसके बावजूद केस के दौरान अपनी बेटी की किताब का विरोध करने वाली इंद्राणी की इस किताब का अभी आना फिर से यह संदेह उत्पन्न करता है कि कहीं इंद्राणी मुखर्जी केस का फैसला आने से पहले अपने बारे में एक सॉफ्ट ओपिनियन तो तैयार नहीं करना चाहती हैं? सवाल यह भी उठता है कि इस किताब को उन लोगों के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा, जो हत्याकांड के उजागर होने के बाद से इंद्राणी मुखर्जी के खिलाफ रहे? यह संदेह इसलिए भी उत्पन्न होता है, क्योंकि इस पूरे मामले में इंद्राणी मुखर्जी यह दावा भी करती हैं कि शीना बोरा जिंदा है और अमेरिका में हैं।
हां, शुद्ध दिलचस्पी के नजरिये से देखें, तो अध्याय थ्रिलर उपन्यास की तरह बुने गए हैं, जिससे गति बनी रहती है और पाठक को ‘रीडिंग प्लेजर’ मिलता है।