{"_id":"6da58fec-924a-11e2-b06d-d4ae52bc57c2","slug":"tuladhar","type":"story","status":"publish","title_hn":"तुलाधार भक्त की विरक्ति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
तुलाधार भक्त की विरक्ति
Updated Thu, 21 Mar 2013 10:41 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय पौराणिक धर्मग्रंथों में यह सीख दी गई है कि हमें सांसारिक सुख-सुविधाओं के प्रति लोभ नहीं रखना चाहिए। अगर हम विरक्त जीवन बिताते हैं, तो उन कष्टों और परेशानियों से स्वाभाविक रूप से बच जाते हैं, जो गलत तरीके से अर्जित धन से जीवन-यापन करने में आती है। दलित तुलाधार अत्यंत सात्विक और संतोषी थे। वह प्रतिदिन नदी में स्नान करने के बाद भगवान की पूजा-उपासना करते थे।
विज्ञापन
मेहनत-मजदूरी करके परिवार की गुजर-बसर करते थे। उनके पास केवल एक धोती तथा गमछा था तथा पुराने हो जाने के कारण दोनों फट गए थे। एक दिन किसी ने नदी के किनारे दो नए वस्त्र रख दिए, ताकि तुलाधार की दृष्टि उन पर पड़े तथा वह उन्हें अपने उपयोग के लिए ले जाएं। तुलाधार स्नान करके नदी से बाहर निकले, कपड़ों पर निगाह डाली, परंतु उन्हें छुआ तक नहीं और आगे बढ़ गए।
विज्ञापन
दूसरे दिन स्नान से लौटते समय उन्होंने नदी के किनारे सोने की डली रखी देखी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं इसे ग्रहण कर लूंगा, तो बिना परिश्रम के मिले इस धन से मेरी बुद्धि विकृत हो जाएगी और अनेक दोषों का शिकार होना पड़ेगा। लोभ मेरे हृदय की पवित्रता और भक्ति भावना को नष्ट कर देगा। सोने की डली को वहीं पड़ा छोड़कर वह आगे बढ़ गए। इस त्यागवृत्ति तथा निश्छलता के कारण भक्त तुलाधार की गणना देश के अग्रणी भक्तजनों में हुई।
विज्ञापन