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सिकुड़ती नौकरियों का सच

Thu, 24 Jan 2019 06:51 PM IST
Raman Singh नारायण कृष्णमूर्त
नारायण कृष्णमूर्त Published by: Raman Singh Updated Thu, 24 Jan 2019 06:51 PM IST
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Truth of shrinking jobs
बेरोजगारी

एक समय था, जब 1960 और 1970 के दशक में फिल्मों में समाज की वास्तविकताओं को दर्शाया जाता था, जिसमें ग्रेजुएट करके बेरोजगार बैठे युवाओं की स्थिति भी शामिल थी। यह उन दिनों की बात है, जब भारत की अर्थव्यवस्था मुक्त न थी और भारत सरकार सबसे बड़ी नियोक्ता थी। सरकारी नौकरी के साथ नौकरी की सुरक्षा शामिल होती थी। भाग्यशाली लोगों को रहने के लिए सरकारी आवास मिला, जिसके आसपास क्षेत्रों में बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध थी। एक तरह से जो सरकारी नौकरी में थे, उनका जीवन व्यवस्थित था।


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1990 के दशक में अर्थव्यवस्था के मुक्त होने के बाद निजीकरण ने सरकारी नौकरियों का आकर्षण कम किया और अगली पीढ़ी के कई लोगों ने अनिश्चितताओं के बावजूद निजी क्षेत्र में रोजगार को प्राथमिकता दी। लेकिन स्वाभाविक रूप से जब 1990 के दशक के अंत और 2000 की शुरुआत में अर्थव्यवस्था में सुस्ती का दौर आया, तो लोगों का आकर्षण सरकारी नौकरियों की तरफ फिर बढ़ा। दूसरी ओर सबसे बड़ी नियोक्ता सरकार ने पिछले दो दशकों में अपने रोजगार दर्शन को काफी हद तक बदल दिया है। पहली बार, 2004 से केंद्र एवं राज्य सरकारों की सभी नई भर्तियों में पेंशन परिभाषित नहीं है, जो कई लोगों के लिए असंतोष की एक बड़ी वजह बनी।

इसी तरह, लगभग उसी समय, सरकारी मशीनरी ने अनुबंध श्रमिकों का एक पूल बनाना शुरू कर दिया, जो उनके लिए अनुकूल काम करता था। इसलिए, कई पदों को खाली छोड़ दिया गया और एक नियमित कर्मचारी के बजाय, सरकार एक निश्चित मूल्य और समय अवधि के लिए अनुबंध पर लोगों को काम पर रखने लगी। इससे नियोक्ताओं को फायदा हुआ, क्योंकि उन्हें इन कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य और पेंशन जैसे दीर्घकालिक लाभों से नहीं जूझना पड़ा। स्थायी कर्मचारियों की तुलना में अनुबंध पर रखे कर्मचारियों को कम वेतन दिया जाता था, जिससे सरकार का कुल वेतन खर्च घट गया। शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में अनुबंध पर कर्मचारी रखने का प्रचलन काफी है, जहां स्थायी कर्मियों की तुलना में अनुबंध कर्मचारियों को रखना आसान है।
  
अनुबंध पर कर्मचारी रखने का एक कारण यह भी था कि कई असंतुष्ट उम्मीदवारों ने , जो स्थायी पद के योग्य नहीं थे, अदालतों से उन लोगों की भर्तियों पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे, जो चयनित हुए थे। इनमें से कुछ मामले वाजिब थे और कुछ विशुद्ध रूप से प्रतिशोधवश दायर किए गए थे। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने खाली पदों को अनुबंध कर्मचारियों से भरना बेहतर समझा। रोजगार की इस नई प्रवृत्ति को सार्वजनिक उपक्रमों में भी लागू किया गया, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ प्रतिभा का और संकट पैदा हुआ। वांछित योग्यता वाले ज्यादातर उम्मीदवारों ने निजी क्षेत्रों में रोजगार शुरू किया, जहां सही वित्तीय पैकेज के साथ उन्हें नौकरी की अनिश्चितता का मुआवजा दिया गया।
 
पिछले कुछ वर्षों में सरकार के अदूरदर्शी दृष्टिकोण ने सरकारी सेवाओं, विशेषकर शिक्षा में भारी रिक्तियों की एक बड़ी समस्या पैदा की है। जुलाई, 2018 में राज्यसभा में सरकार द्वारा दिए एक जवाब के मुताबिक, सरकारी सेवा में कुल रिक्त पदों की संख्या अब बीस लाख के आसपास हो गई है जिनमें सर्वाधिक रिक्त पद स्कूली शिक्षकों, पुलिस, रेलवे, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और स्वास्थ्य कर्मियों की है। मानो यही काफी नहीं था, अब सरकार ने उच्च जाति के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए दस फीसदी आरक्षण दिया है, जिससे रिक्त सरकारी पदों पर पहले से ही खराब भर्तियों का दबाव ही बढ़ेगा।
 
बदलते कार्यबल के वातावरण में रोजगार के इच्छुक उम्मीदवारों में वांछित योग्यता की कमी दूर करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद स्थापित की है, ताकि संभावित नियोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए विशिष्ट रोजगार के अनुरूप उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया जा सके। यह प्रक्रिया उतनी तेजी से नहीं हुई, जितनी तेजी से होनी चाहिए और उच्च स्तर पर नौकरियां आमतौर पर कौशल विकास केंद्रों द्वारा निर्धारित प्रशिक्षण तक सीमित नहीं होती हैं। उदाहरण के लिए, एक शिक्षक या डॉक्टर को सही योग्यता के साथ समय के साथ अनुभव हासिल करने और उत्कृष्टता प्राप्त करने की आवश्यकता होती है, न कि सिर्फ नौकरी करने के लिए।
 
हमारे सामने एक और समस्या है, जो सरकारी उद्यमों को पंगु बना रही है, जिसे अतीत में रोजगार सृजन के रूप में देखा गया था। यदि आप 2016-17 के पब्लिक इंटरप्राइज सर्वे के आंकड़ों को देखें, तो पाएंगे कि सार्वजनिक उपक्रमों में नौकरियों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। पिछले दस वर्षों का आंकड़ा देखने से ही पता चलता है कि सरकारी नौकरियों में स्थायी कर्मचारियों की संख्या में लगातार कमी आई है, जबकि उनकी आय का स्तर बढ़ रहा है। ऐसा परिणाम हानिकारक है और रोजगार सृजन की दिशा में समर्थन का संकेत नहीं देता है, जहां काम पर रखने में सरकार की प्रत्यक्ष भूमिका है। यदि आप निजी क्षेत्रों की तरफ देखें, तो पिछले करीब दो दशक से नौकरियां या तो फ्रीज हैं या आउटसोर्सिंग पर निर्भर हैं।
 
तो इस स्थिति का सामना कैसे करें? नौकरियों के लिए आरक्षण देने के बजाय, जो बहुत कम रह गई हैं, सरकार को अनिवार्य रूप से एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां रोजगार सृजन स्वतः हो जाए। उदाहरण के लिए, कृषि ऋण माफी का मामला लीजिए–ऋण माफ करने के बजाय, यदि धन का उपयोग खेत के उत्पादन को बढ़ाने के लिए किया जाए या खेत मजदूरों को प्रत्यक्ष आय प्रदान की जाए, तो रोजगार का सृजन होगा। इसके परिणामस्वरूप सरकार को अपने खर्च में कटौती नहीं करनी पड़ेगी, जिससे वह खाली पदों को भर सकेगी। ऋण माफी के बजाय वही राशि अगर कानून-व्यवस्था या शिक्षा या स्वास्थ्य पर खर्च की जाए, तो समग्र आर्थिक एवं सामाजिक लाभ होंगे।
 
विशेष रूप से जहां भारत सरकार नियोक्ता है, वहां उसे खाली पदों को तेजी से भरना चाहिए। इससे न केवल एक स्पष्ट संदेश मिलेगा, बल्कि भावी पीढ़ियों के लाभ के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के माध्यम से आवश्यक बुनियादी ढांचे को भी बढ़ावा देगा। स्वरोजगार सबके लिए अच्छा उपाय नहीं है, बल्कि यह कुछ लोगों के लिए ही बेहतर विकल्प है। 

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