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भरोसेमंद है रूस से मैत्री
मनोज जोशी
Updated Fri, 05 Oct 2018 06:36 PM IST
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मोदी-पुतिन
एक स्तर पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा नियमित थी, क्योंकि वह 19वें भारत-रूस वार्षिक द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने आए थे। लेकिन दूसरे मायने में यह यात्रा खास थी, क्योंकि यह यात्रा उस वक्त हुई, जब भारत और रूस की परखी हुई दोस्ती नए खतरों और चुनौतियों का सामना कर रही है।
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पुतिन की यात्रा की खास बात यह है कि इस दौरान भारत द्वारा एस-400 एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल प्रणाली हासिल करने के लिए पांच अरब डॉलर के सौदे पर हस्ताक्षर किए गए। भारत ने अमेरिकी प्रतिबंध की धमकी के बावजूद रूस के साथ सौदे करने पर सहमति जताई है। भारत और रूस के बीच हथियारों का यह सौदा काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रो सैंक्शन ऐक्ट (सीएएटीएसए) नामक अमेरिकी कानून के दायरे में आता है। हालांकि इस कानून का उद्देश्य रूस को वर्ष 2014 में क्रीमिया पर कब्जा करने के लिए दंडित करना है, लेकिन अमेरिका चाहता है कि भारत रूस के साथ अपने आजमाए हुए हथियार हस्तांतरण रिश्ते को खत्म कर दे।
यह विडंबना ही है कि नई दिल्ली, जिसने 1970 और 1980 के दशक में अपने स्वतंत्र परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम के कारण भारत के खिलाफ पूर्ण अमेरिकी प्रतिबंध लागू करने के बावजूद कदम पीछे नहीं खींचा था, उसे आज इससे निपटने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बुधवार को अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने दोहराया कि अगर भारत एस-400 खरीदता है, तो उसे अमेरिकी प्रतिबंध का सामना करना पड़ेगा। बीते महीने सितंबर के शुरू में उच्च स्तरीय 2+2 बैठक के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल पोम्पियो ने समझौता करते हुए कहा था कि हमारा प्रयास भारत जैसे महान रणनीतिक साझेदार को दंडित करना नहीं है। लेकिन अब तक प्रतिबंध से किसी तरह की छूट के संकेत नहीं मिले हैं। पिछले महीने वाशिंगटन ने सुखोई 35 लड़ाकू विमान और एस-400 प्रणाली खरीदने पर चीनी इकाई के खिलाफ प्रतिबंध लगा दिया, जबकि तथ्य यह है कि चीन अमेरिका से कोई भी सैन्य उपकरण नहीं खरीदता है।
अमेरिकी नीति के दो कोण हैं। एक है, अपने रक्षा उद्योग को बढ़ावा देना। पिछले दस वर्षों में अमेरिका भारत को 15 अरब डॉलर के विमान और हेलीकॉप्टर बेचकर भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा सैन्य उपकरण आपूर्तिकर्ता बन गया है। लेकिन अमेरिकी नीति का दूसरा कोण दीर्घकालिक भू-राजनीतिक रणनीति से संबंधित है। वैश्विक शक्ति के रूप में अमेरिका क्षेत्रीय शक्तियों से अपने लक्ष्य के समर्थन की उम्मीद रखता है। हाल के वर्षों में चीन के उभार को रोकने की जरूरत के मद्देनजर भारत और अमेरिका के भू-राजनीतिक दृष्टिकोण एकजुट हो रहे हैं। हालांकि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में हमारे नीतिगत हित अक्सर एक समान नहीं होते। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान के संदर्भ में भारत और अमेरिका की नीति में भारी मतभेद है। इसी तरह अमेरिका अब चीन, रूस और ईरान को रोकना चाहता है। बेशक चीन को रोकना हमारे हित में है, लेकिन रूस और ईरान के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिका की वैश्विक योजना जो भी हो, भारत की अपनी भी जरूरतें हैं। रूस समय की कसौटी पर परखा हुआ भारत का मित्र है और आज हमें चीनी-रूसी सहयोग को रोकने के लिए मास्को के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने की जरूरत है। अतीत में अमेरिका ने परमाणु और मिसाइल मुद्दों को लेकर भारत पर प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन उन्होंने हथियारों के व्यापार को छुआ तक नहीं था। लेकिन अब सख्त सीएएटीएसए न केवल नए उपकरणों की खरीद पर प्रतिबंध लगाता है, पुराने हथियारों को बनाए रखने वाले जरूरी पुर्जों और घटकों पर प्रतिबंध लगाता है। दूसरे शब्दों में, अगर भारत को अपने सैन्य साजोसामान को बनाए रखना है, जिनमें से 65 फीसदी रूसी उपकरणों पर निर्भर हैं, तो उसे उन उपकरणों के पुर्जों की खरीद के लिए अमेरिका से इजाजत लेनी होगी।
रूस अब भी एक मजबूत सैन्य ताकत है और ऐतिहासिक रूप से वह न केवल आक्रामक हथियारों की आपूर्ति का इच्छुक है, बल्कि उन चीजों का भी, जिसे सामरिक कहा जा सकता है। यह परमाणु हमले करने वाली पनडुब्बी चक्र के लीज और अरिहंत परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी तथा सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल के निर्माण में मदद से स्पष्ट है। एस-400 सौदे के अलावा भारत की दिलचस्पी चार रूसी क्रीवाक वर्ग के युद्धपोत, 200 केए 226 टी हल्के हेलिकॉप्टरों के निर्माण और एके 103 एसाल्ट राइफलों में भी है। अमेरिका ने परिवहन विमान जैसी रक्षात्मक प्रणालियों की आपूर्ति की है और उसकी प्रणालियां हमेशा उपयोग से संबंधित अनेक शर्तों से बंधी होती हैं। इन परिस्थितियों में भारत को रूस की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है। हाइपरसोनिक वाहन, मानवरहित पनडुब्बी, लेजर गन जैसे कई क्षेत्र हैं, जिनमें चीन ने बड़ी प्रगति की है और यह हमारे खिलाफ शक्ति के संतुलन को झुका सकता है। पिछला रिकॉर्ड देखें, तो मुश्किल परिस्थितियों में अमेरिका द्वारा हमारी मदद की संभावना नहीं है, लेकिन अगर हम रूस के मित्र हैं, तो वह हमारी मदद जरूर करेगा। राजनीतिक रूप से तालिबान से निपटने के मामले में कुछ मतभेदों को छोड़कर भारत और रूस के बीच हितों का कोई टकराव नहीं है। मास्को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और एनएसजी में भारत की सदस्यता का समर्थन करता है और उसने शंघाई सहयोग संगठन की सदस्यता में हमारी मदद की है। लेकिन इस रिश्ते की एक बड़ी समस्या यह है कि यह सिर्फ हथियार हस्तांतरण तक ही सीमित है; रूस के साथ हमारा व्यापारिक रिश्ता मात्र दस अरब डॉलर तक की सीमित है। इस लिहाज से पुतिन की यह यात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों पक्षों ने निकट आर्थिक सहयोग, रेलवे, परमाणु ऊर्जा, लघु एवं मध्यम उद्यमों, उर्वरकों, अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन और समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
आखिरकार भारत को ही यह निर्णय करना है कि उसके हित में क्या सर्वोत्तम है। वह ऐसी किसी भी परिस्थिति में नहीं फंस सकता, जहां एक तीसरा देश उसकी हथियार खरीद और आर्थिक संबंधों पर वीटो रखता हो। मोदी ने जिस गर्मजोशी से पुतिन का स्वागत किया, वह संकेत है कि भारत विदेशी संबंधों में अपनी खास मुद्रा बनाए रखेगा।
-लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं।