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कृतज्ञता के आंसू से भीग गई गोद
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 04 Feb 2013 08:50 AM IST
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ईश्वर की पूजा-उपासना आस्था का एक रूप तो है ही, इससे भी बड़ी भगवद्भक्ति है, दीन-दुखियों की सेवा करना। हमारे धर्मग्रंथों में वर्णित हर प्रसंग में यह सीख दी गई है कि रोगियों की अपने हाथों से सेवा करने से साक्षात प्रभु के दर्शन होते हैं।
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स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य दुर्गाचरण नाग काली की उपासना के बाद अपना समय गरीबों और बीमारों की सेवा में लगाकर अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करते थे। वह रोगियों को निःशुल्क दवा देते और अपने हाथों से उनकी सेवा करते थे।
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कोलकाता में प्लेग का प्रकोप हुआ। नाग महाशय प्लेग से प्रभावित क्षेत्र में पहुंच जाते। वह झोपड़ियों में जाकर रोगियों को दवा देते और उनके शरीर की सफाई करते। एक दिन वह एक झोपड़ी में गए, तो प्लेग से प्रभावित एक मरणासन्न वृद्ध बोला, डॉक्टर साहब, मैं अब बच नहीं पाऊंगा। अंतिम समय है। मेरी इच्छा है कि अंतिम क्षण मेरे मुंह में गंगा जल की पावन बूंदें तो पड़ ही जाएं, गंगा मैया के दर्शन भी हो जाएं।
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नाग महाशय समझ गए कि अब इस वृद्ध का अंतिम समय है। उन्होंने उसे कंधे पर उठाया और एक किलोमीटर दूर गंगा किनारे तक ले गए। उन्होंने उसे गंगा जल पिलाया तथा अपनी गोद में उसका सिर लेकर बैठ गए। कुछ देर बाद उस वृद्ध का निधन हो गया। अंतिम सांस लेने से पूर्व वृद्ध की आंखों से बह रहे आंसू नाग महाशय के प्रति कृतज्ञता के परिचायक थे।