कश्मीर में खुद की बुलाई मुसीबत, विदेशी नेताओं को इस मामलों से रखा गया दूर
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 जुलाई को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से वाशिंगटन में मुलाकात की थी। उस मुलाकात के बाद हुए संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रपति ट्रंप ने कश्मीर विवाद के समाधान के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की।
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 जुलाई को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से वाशिंगटन में मुलाकात की थी। उस मुलाकात के बाद हुए संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रपति ट्रंप ने कश्मीर विवाद के समाधान के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की।
उन्होंने कहा, 'यदि मैं मदद कर सकता हूं, तो मुझे मध्यस्थ बनना अच्छा लगेगा।' ट्रंप ने यह दावा भी किया कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मदद के लिए आगे आने को कहा है। उन्होंने कहा, 'दो हफ्ते पहले मैं प्रधानमंत्री मोदी के साथ था। और हमने इस विषय (कश्मीर) पर बात की थी। और उन्होंने वास्तव में कहा, 'क्या आप मध्यस्थ या पंच बनना पसंद करेंगे?' मैंने कहा, 'कहां?' (मोदी ने कहा) 'कश्मीर'।'
राष्ट्रपति ट्रंप के दावों को हमारे विदेश मंत्रालय ने तुरंत खारिज कर दिया। इसके तीन हफ्ते बाद पांच अगस्त को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया, जम्मू और कश्मीर का दर्जा पूर्ण राज्य से घटाकर सिर्फ केंद्र शासित कर दिया, हजारों कश्मीरियों को जेल में डाल दिया गया, इंटरनेट और फोन लाइनें बंद कर दी गईं, पहले से भारी-भरकम सैन्यीकृत घाटी में हजारों अतिरिक्त बल भेजे गए, और इसकी बेबस आबादी पर रात और दिन का कर्फ्यू लाद दिया गया।
अनुच्छेद 370 को खत्म करना सत्तारूढ़ दल के चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा
अनुच्छेद 370 को खत्म करना सत्तारूढ़ दल के चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा था। हालांकि यह तो 1990 के दशक के शुरुआत से था। भाजपा 1998 से 2004 तक सत्ता में रही और फिर बिना इस घोषणा पर अमल के मई 2014 और मई 2019 में भी वह सत्ता में आई। तो फिर अभी क्यों? अनेक टिप्पणीकारों की राय है कि राष्ट्रपति ट्रंप की मध्यस्थता की पेशकश के कारण यह कदम तेजी से उठाया गया, और उनका दावा है कि
इस तरह से कश्मीर को पूरी तरह से घरेलू मुद्दे में बदल दिया गया, पाकिस्तान को पूरी तरह से बाहर कर दिया गया और किसी भी विदेशी नेता या राष्ट्र के लिए अपने मामलों में मध्यस्थता करना असंभव कर दिया गया है।
अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने में ट्रंप की मध्यस्थता की पेशकश भी कोई कारण थी या नहीं, यह केवल प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ही जानते हैं-और वह हमें यह नहीं बताने जा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने सितंबर के आखिर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान इमरान खान से हुई एक अन्य मुलाकात में एक बार फिर से मध्यस्थता की पेशकश की। एक रिपोर्टर ने अमेरिकी राष्ट्रपति को यह कहते हुए कोट किया, 'मैं तैयार, इच्छुक और सक्षम (कश्मीर में मध्यस्थता के लिए) हूं।
यह एक जटिल मुद्दा है। यह लंबे समय तक चल सकता है। यदि दोनों तैयार हों, तो मैं यह करने को तैयार हूं।' एक अन्य रिपोर्टर ने ट्रंप को इस तरह से कोट किया, 'मैं चाहता हूं कि कश्मीर में सबके साथ न्याय हो; मैं एक अच्छा पंच साबित हो सकता हूं।'
यूरोपीय सांसदों की यात्रा की प्रेस और सोशल मीडिया में तीखी आलोचना
उनका नाम है बेनहार्ड जिमनिओक। वह जर्मन की धुर दक्षिणपंथी पार्टी (वास्तव में फासीवादी जैसी) अल्टरनेटिव फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) के प्रतिनिधि हैं। जिमनिओक यूरोपीय संसद के उन तेईस सांसदों में शामिल थे, जिन्होंने हाल ही में कश्मीर का दौरा किया।
उनके प्रवास को एक ऐसे एनजीओ ने प्रायोजित किया था, जिसके मूल के बारे में ठीक से पता नहीं और उसकी फंडिंग कहां से हुई इसके बारे में भी ठीक से जानकारी नहीं है, इसके बावजूद नई दिल्ली में सत्ता के गलियारे में उसका पर्याप्त प्रभाव है।
कश्मीर प्रवास से पहले यूरोपीय संघ के सांसदों की उसने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश मंत्री और यहां तक कि प्रधानमंत्री से भी मुलाकात करवाई।
इन यूरोपीय सांसदों की यात्रा की प्रेस और सोशल मीडिया में तीखी आलोचना भी हुई। सवाल किए गए कि जब भारतीय सांसदों को कश्मीर में जाने से रोक दिया गया, तब इन विदेशियों की सरकार प्रायोजित न सही, सरकार की मंजूरी से घाटी की यात्रा क्यों कराई गई। यहां तक कि भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इस आमंत्रण को अनैतिक और हमारी राष्ट्रीय नीति का हनन बताकर आलोचना की।
विदेश में भारत की छवि को नरम करने में मदद मिलेगी
आयोजकों ने संभवतः यह सोचा होगा कि चरम इस्लामफोबिया से प्रभावित धुर दक्षिणपंथी पार्टियों के सांसदों का रुख सत्तारूढ़ हिंदुत्व व्यवस्था के प्रति सहानुभूतिपू्र्ण हो सकता है और इसीलिए उन्हें कश्मीर में जाने की इजाजत दी गई।
इसके बजाय हुआ यह कि उनका जिस तरह से लाल कालीन बिछाकर स्वागत हुआ, उसने यूरोप के इन हाशिये के राजनेताओं में आत्म महत्व की अतिरंजित भावना भर दी। आखिर हम ऊपर जिक्र किए गए जर्मन राजनीतिक दल अल्टरनेटिव फॉर ड्यूशलैंड के बेनहार्ड जिमनिओक की टिप्पणियों का क्या अर्थ लगाएं? द इंडियन एक्सप्रेस ने जिमनिओक के हवाले से लिखा, 'पाकिस्तान और भारत अपने रिश्ते को सामान्य बनाने के लिए नए सिरे से प्रयास करते हैं, तो मैं समझता हूं कि यूरोपीय समुदाय को, यदि वांछित हो, तो एक ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए।'
उन्होंने आगे कहा, 'यदि भारत और पाकिस्तान भी गतिरोध का समाधान चाहते हैं, तो मैं और मेरे साथ यहां आए एएफडी के मेरे सहयोगियों को इसे बढ़ावा देने के लिए तैनात किया जा सकता है। यदि दोनों पक्ष हमें तटस्थ मध्यस्थ के रूप में शामिल करने को इच्छुक हों, तो हम इससे पीछे नहीं हटेंगे।'
कश्मीर को घरेलू मुद्दे में बदलने के बजाय अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया गया
दुनिया के अमीर और सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति होने के नाते उन्होंने माना कि उनके पास दो गरीब देशों के विवाद में दखल देने का हक है, खासतौर से तब और जब वे आणविक हथियारों से लैस हैं। अब यहां तक कि एक अनजाना-सा राजनेता खुद को इस लायक मान रहा है कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच एक ईमानदार मध्यस्थ और पंच बन सकता है।
सरकार ने खुद के लिए असहज स्थिति पैदा कर ली है; लेकिन यह तो होना ही था। ऐसा तब होता है जब कोई भारत की विदेश नीति को किसी संदिग्ध एनजीओ को आउटसोर्स कर दे।