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मिट्टी के घर से रायसीना हिल तक का सफर
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मनीषा प्रियम
उत्तर प्रदेश में जन्मे और सत्तारूढ़ भाजपा के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद देश के नए राष्ट्रपति होंगे। राष्ट्रपति पर देश के संविधान के संरक्षण की जिम्मेदारी होती है। वह संविधान, जिसे दलित समुदाय में ही जन्मे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने अपने बौद्धिक चिंतन से तैयार किया था।
रामनाथ कोविंद दलित समुदाय से राष्ट्रपति बनने वाले दूसरे व्यक्ति होंगे, क्योंकि के आर नारायणन दलित समुदाय से आने वाले देश के पहले राष्ट्रपति थे, पर यह पहली बार हुआ कि आजादी के बाद इस पद के लिए हुए चुनाव में दोनों प्रमुख प्रत्याशी दलित समुदाय से ही थे। यानी इस बार राष्ट्रपति चुनाव में सारी प्रतिस्पर्धा दलित प्रत्याशियों के इर्द-गिर्द रही। वास्तव में भाजपा ने विपक्षी दलों से पहले राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम की घोषणा कर एक बड़ा दांव खेला।
भाजपा के इसी दांव के कारण विपक्ष को भी अपना उम्मीदवार दलित समुदाय से चुनने के लिए मजबूर होना पड़ा। भाजपा के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के पक्ष में बहुमत के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं था, पर इसे कोविंद के व्यक्तित्व की सौम्यता कहें या भाजपा की चुनावी कुशलता कि रामनाथ कोविंद को 66 फीसदी मत मिले। रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी की घोषणा होते ही बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने गठबंधन के सहयोगियों का साथ छोड़कर रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा कर दी।
विपक्षी उम्मीदवार मीरा कुमार और रामनाथ कोविंद, दोनों अनुभवी राजनेता रहे हैं और दोनों की पहचान मृदुभाषी नेता की रही है। मीरा कुमार बाबू जगजीवन राम की बेटी के तौर पर राजनीति में आईं और लोकसभा अध्यक्ष की गरिमापूर्ण पद पर भी आसीन रही हैं। इधर रामनाथ कोविंद ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के रूप में की और भाजपा में विभिन्न पदों पर रहते हुए राज्यपाल जैसे सांविधानिक पद की जिम्मेदारी भी संभाली। बिहार का राज्यपाल रहते हुए ही भाजपा ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया था।
इससे पहले एपीजे अब्दुल कलाम भाजपा के प्रत्याशी के रूप में राष्ट्रपति तो जरूर बने थे, पर उनकी पहचान एक वैज्ञानिक के तौर पर ही थी। उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार वेंकैया नायडू की जीत की भी प्रबल संभावना है। ऐसे में भाजपा के लिए यह खुशी का क्षण तो है ही, पर शीर्ष सांविधानिक पद पर आसीन होने वाले रामनाथ कोविंद के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस शीर्ष सांविधानिक पद की गरिमा का निर्वहन वह कैसे करते हैं। उनके सामने घरेलू चुनौतियां तो हैं ही, बाहरी चुनौतियां भी हैं। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राजग सरकार ने भारत की विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन किया है।
अमेरिका और इस्राइल के साथ जहां भारत के संबंध पहले से मजबूत हुए हैं, वहीं पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते में तल्खी आई है। हाल ही में हमने देखा कि दोकलम मामले पर भारत दृढ़ता के साथ अपनी बात पर अड़ा हुआ है। भले चीन की सैन्य शक्ति भारत से मजबूत है, फिर भी भारत का चीन की आंख में आंख डालकर बात करना और पाकिस्तान जैसे जिद्दी देश को सबक सिखाने जैसे मामले भारत की सैन्य शक्ति से जुड़े हैं। रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति के रूप में देश की तीनों सेनाओं के घटकों के पदेन कमांडर इन चीफ भी होंगे। भारत की इस नई और अग्रसर सैन्य नीति पर उनका क्या रुख रहता है, आने वाले दिनों में यह देखने वाली बात होगी।
यदि हम घरेलू मोर्चे की चुनौतियों की चर्चा करें, तो सबसे पहली बात तो यही देखने वाली होगी कि अतीत में भाजपा से जुड़े रहने के बावजूद क्या वह विपक्षी दलों के शिष्टमंडल के साथ निष्पक्षता से उनकी बात पर गौर करेंगे। संसद के निर्वहन में यदि सरकार राज्यसभा की चुनौतियों को देखते हुए संयुक्त सत्र का सहारा लेती है, तो उनकी कैसी प्रतिक्रिया होगी। वह अपने ही दल की सरकार को नसीहत दे पाएंगे या अपनी सरकार के साथ निष्पक्षता से पेश आएंगे, यह सब आने वाले दिनों में पता चलेगा।
इन दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में गोरक्षा के नाम पर भय का माहौल बना है। इस माहौल का प्रधानमंत्री और निवर्तमान राष्ट्रपति ने भी विरोध किया है और विपक्षी दलों के तेवर भी इस मुद्दे पर सख्त हैं। इस मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी, इस पर मीडिया और देश की नजरें टिकी रहेंगी। कई बार ऐसी दलील दी जाती है कि कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। इसलिए कई बार सांप्रदायिक दंगे काबू में नहीं आ पाते, क्योंकि राज्य सरकारें उन पर अंकुश लगाने में अक्षम रहती हैं।
लेकिन राष्ट्रपति की हैसियत से उनकी नसीहत तो राज्यों को भी दी जा सकती है। क्या वह ऐसी नसीहत राज्यों को दे पाएंगे? निवर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रखर भूमिका निभाई है। वह विश्वविद्यालयों से बातचीत करते रहे हैं, राष्ट्रपति भवन में लेखकों का जमावड़ा भी हुआ है। ऐसे में इनसे भी यह अपेक्षा रहेगी कि वह विश्वविद्यालयों को राजनीति से अलग रखें। उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर वह देश के नागरिकों के लोकप्रिय नेता बन पाएंगे या नहीं।
हालांकि इस पद पर चुने जाने के बाद दी गई उनकी पहली प्रतिक्रिया बहुत ही भावुक और प्रभावी थी। अपने संक्षिप्त बयान में उन्होंने कहा कि मैं गरीबी के बीच से उठकर आज देश के सबसे शीर्ष पद पर पहुंचा हूं। बचपन में हमारा घर मिट्टी का था और जब भी बारिश होती थी, तो हम लोग यही मनाते थे कि कब बारिश बंद हो जाए। आज भी देश में करोड़ रामनाथ कोविंद (गरीब) हैं, जो कहीं खेतों में काम कर रहे होंगे, रात के खाने के लिए पसीना बहा रहे होंगे, उन सबको मैं आश्वस्त करना चाहता हूं कि मैं राष्ट्रपति भवन में भी उन्हीं लोगों का प्रतिनिधि बनकर रहूंगा।
सर्वे भवन्तु सुखिनः के भाव से मैं राष्ट्र की सेवा करता रहूंगा। उनके इस प्रथम संबोधन से यह उम्मीद बलवती हुई है कि वह देश के गरीबों के हित में काम करेंगे और दलगत भावना से ऊपर उठकर इस सांविधानिक पद की मर्यादा को नई ऊंचाई तक पहुंचाएंगे।
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रामनाथ कोविंद दलित समुदाय से राष्ट्रपति बनने वाले दूसरे व्यक्ति होंगे, क्योंकि के आर नारायणन दलित समुदाय से आने वाले देश के पहले राष्ट्रपति थे, पर यह पहली बार हुआ कि आजादी के बाद इस पद के लिए हुए चुनाव में दोनों प्रमुख प्रत्याशी दलित समुदाय से ही थे। यानी इस बार राष्ट्रपति चुनाव में सारी प्रतिस्पर्धा दलित प्रत्याशियों के इर्द-गिर्द रही। वास्तव में भाजपा ने विपक्षी दलों से पहले राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम की घोषणा कर एक बड़ा दांव खेला।
भाजपा के इसी दांव के कारण विपक्ष को भी अपना उम्मीदवार दलित समुदाय से चुनने के लिए मजबूर होना पड़ा। भाजपा के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के पक्ष में बहुमत के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं था, पर इसे कोविंद के व्यक्तित्व की सौम्यता कहें या भाजपा की चुनावी कुशलता कि रामनाथ कोविंद को 66 फीसदी मत मिले। रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी की घोषणा होते ही बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने गठबंधन के सहयोगियों का साथ छोड़कर रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा कर दी।
विपक्षी उम्मीदवार मीरा कुमार और रामनाथ कोविंद, दोनों अनुभवी राजनेता रहे हैं और दोनों की पहचान मृदुभाषी नेता की रही है। मीरा कुमार बाबू जगजीवन राम की बेटी के तौर पर राजनीति में आईं और लोकसभा अध्यक्ष की गरिमापूर्ण पद पर भी आसीन रही हैं। इधर रामनाथ कोविंद ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के रूप में की और भाजपा में विभिन्न पदों पर रहते हुए राज्यपाल जैसे सांविधानिक पद की जिम्मेदारी भी संभाली। बिहार का राज्यपाल रहते हुए ही भाजपा ने उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया था।
इससे पहले एपीजे अब्दुल कलाम भाजपा के प्रत्याशी के रूप में राष्ट्रपति तो जरूर बने थे, पर उनकी पहचान एक वैज्ञानिक के तौर पर ही थी। उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार वेंकैया नायडू की जीत की भी प्रबल संभावना है। ऐसे में भाजपा के लिए यह खुशी का क्षण तो है ही, पर शीर्ष सांविधानिक पद पर आसीन होने वाले रामनाथ कोविंद के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस शीर्ष सांविधानिक पद की गरिमा का निर्वहन वह कैसे करते हैं। उनके सामने घरेलू चुनौतियां तो हैं ही, बाहरी चुनौतियां भी हैं। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राजग सरकार ने भारत की विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन किया है।
अमेरिका और इस्राइल के साथ जहां भारत के संबंध पहले से मजबूत हुए हैं, वहीं पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते में तल्खी आई है। हाल ही में हमने देखा कि दोकलम मामले पर भारत दृढ़ता के साथ अपनी बात पर अड़ा हुआ है। भले चीन की सैन्य शक्ति भारत से मजबूत है, फिर भी भारत का चीन की आंख में आंख डालकर बात करना और पाकिस्तान जैसे जिद्दी देश को सबक सिखाने जैसे मामले भारत की सैन्य शक्ति से जुड़े हैं। रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति के रूप में देश की तीनों सेनाओं के घटकों के पदेन कमांडर इन चीफ भी होंगे। भारत की इस नई और अग्रसर सैन्य नीति पर उनका क्या रुख रहता है, आने वाले दिनों में यह देखने वाली बात होगी।
यदि हम घरेलू मोर्चे की चुनौतियों की चर्चा करें, तो सबसे पहली बात तो यही देखने वाली होगी कि अतीत में भाजपा से जुड़े रहने के बावजूद क्या वह विपक्षी दलों के शिष्टमंडल के साथ निष्पक्षता से उनकी बात पर गौर करेंगे। संसद के निर्वहन में यदि सरकार राज्यसभा की चुनौतियों को देखते हुए संयुक्त सत्र का सहारा लेती है, तो उनकी कैसी प्रतिक्रिया होगी। वह अपने ही दल की सरकार को नसीहत दे पाएंगे या अपनी सरकार के साथ निष्पक्षता से पेश आएंगे, यह सब आने वाले दिनों में पता चलेगा।
इन दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में गोरक्षा के नाम पर भय का माहौल बना है। इस माहौल का प्रधानमंत्री और निवर्तमान राष्ट्रपति ने भी विरोध किया है और विपक्षी दलों के तेवर भी इस मुद्दे पर सख्त हैं। इस मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी, इस पर मीडिया और देश की नजरें टिकी रहेंगी। कई बार ऐसी दलील दी जाती है कि कानून-व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। इसलिए कई बार सांप्रदायिक दंगे काबू में नहीं आ पाते, क्योंकि राज्य सरकारें उन पर अंकुश लगाने में अक्षम रहती हैं।
लेकिन राष्ट्रपति की हैसियत से उनकी नसीहत तो राज्यों को भी दी जा सकती है। क्या वह ऐसी नसीहत राज्यों को दे पाएंगे? निवर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रखर भूमिका निभाई है। वह विश्वविद्यालयों से बातचीत करते रहे हैं, राष्ट्रपति भवन में लेखकों का जमावड़ा भी हुआ है। ऐसे में इनसे भी यह अपेक्षा रहेगी कि वह विश्वविद्यालयों को राजनीति से अलग रखें। उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर वह देश के नागरिकों के लोकप्रिय नेता बन पाएंगे या नहीं।
हालांकि इस पद पर चुने जाने के बाद दी गई उनकी पहली प्रतिक्रिया बहुत ही भावुक और प्रभावी थी। अपने संक्षिप्त बयान में उन्होंने कहा कि मैं गरीबी के बीच से उठकर आज देश के सबसे शीर्ष पद पर पहुंचा हूं। बचपन में हमारा घर मिट्टी का था और जब भी बारिश होती थी, तो हम लोग यही मनाते थे कि कब बारिश बंद हो जाए। आज भी देश में करोड़ रामनाथ कोविंद (गरीब) हैं, जो कहीं खेतों में काम कर रहे होंगे, रात के खाने के लिए पसीना बहा रहे होंगे, उन सबको मैं आश्वस्त करना चाहता हूं कि मैं राष्ट्रपति भवन में भी उन्हीं लोगों का प्रतिनिधि बनकर रहूंगा।
सर्वे भवन्तु सुखिनः के भाव से मैं राष्ट्र की सेवा करता रहूंगा। उनके इस प्रथम संबोधन से यह उम्मीद बलवती हुई है कि वह देश के गरीबों के हित में काम करेंगे और दलगत भावना से ऊपर उठकर इस सांविधानिक पद की मर्यादा को नई ऊंचाई तक पहुंचाएंगे।