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व्यापार समझौता और किसानों का हित
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भारत और अमेरिका के बीच ‘खुले व्यापार समझौते’ की संभावना काफी समय से व्यक्त की जा रही है। हाल ही में वाणिज्य मंत्रालय के स्रोतों के माध्यम से खबरें आई हैं, कि दोनों देश मुक्त व्यापार समझौते की संभावना पर बातचीत करते रहे हैं और इस दिशा में एक आरंभिक व्यापार समझौते की वार्ता को परिणति तक पहुंचाना चाहते हैं।
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ऐसे संकेत हैं कि अपने व्यापक परिणामों के कारण ऐसा समझौता एकमुश्त नहीं होगा, बल्कि विभिन्न चरणों में सामने आएगा। इसके पहले चरण के शीघ्र सामने आने की संभावना बढ़ गई है। अमेरिका चाहता है कि उसके कृषि व डेयरी उत्पादों का आयात भारत में तेजी से बढ़े। जबकि भारतीय पक्ष को देखें, तो अमेरिकी कृषि व डेयरी उत्पादों का आयात बढ़ना हमारे हित में नहीं है।
भारत व अमेरिकी किसान अलग-अलग परिस्थितियों में कार्य करते हैं और उनकी बराबरी नहीं हो सकती। भारत के एक औसत किसान के पास एक हेक्टेयर भूमि है, तो अमेरिका के एक औसत किसान के पास 176 हेक्टेयर भूमि है।
इतना ही नहीं, अमेरिकी कृषि व खाद्य व्यवस्था पर ऐसी विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियां छाई हुई हैं, जिनके पास अपार संसाधन हैं और उनकी महत्वाकांक्षा वैश्विक खाद्य व्यवस्था को नियंत्रित करने की है। अमेरिकी सरकार से वहां की कृषि व खाद्य व्यवस्था को सब्सिडी मिलती है, जो भारत समेत किसी भी विकासशील देश में संभव ही नहीं है।
इसलिए यदि ‘भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते’ (पहले या दूसरे चरण) से भारत में सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात की संभावना बढ़ती है, तो इससे भारतीय किसानों की समस्याएं बढ़ने की आशंका है। वह भी ऐसे वक्त में, जब पहले ही भारतीय किसान कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं।
अमेरिका सोयाबीन का एक बहुत बड़ा निर्यातक देश है। यदि भारत में अमेरिकी सोयाबीन का आयात बढ़ा, तो भारत के सोयाबीन किसानों की समस्याएं बढ़ सकती हैं। अमेरिका मक्के का भी बड़ा निर्यातक है और इस तरह मक्के की खेती पर निर्भर भारतीय किसानों की समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
अमेरिका का सोयाबीन और मक्का मुख्य रूप से जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसल है। विश्व के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि ‘जीएम’ फसलें स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक हैं। इस कारण भारत में अभी ‘जीएम’ खाद्य फसलों पर प्रतिबंध है।
यदि अमेरिका से मुक्त व्यापार समझौता हुआ, तो ‘जीएम’ खाद्य आयातों पर प्रतिबंध हटाने के लिए भारत पर दबाव पड़ेगा और आगे चलकर ‘जीएम’ खाद्य फसलों पर भी प्रतिबंध हटाने का दबाव बढ़ेगा। ‘जीएम’ फसलों के प्रसार से जो बहुराष्ट्रीय कंपनियां जुड़ी हैं, उनमें अमेरिकी कंपनियों की प्रमुख भूमिका रही है।
इसी तरह डेयरी उत्पादों व किसानों को देखें, तो भारत व अमेरिका के डेयरी किसानों में कोई बराबरी नहीं है। भारत के औसत डेयरी-किसान के पास दो-तीन दुधारू पशु होते हैं, जबकि अमेरिका के औसत डेयरी फार्म के पास 1,000 से अधिक गाय होना सामान्य बात है।
इसके अतिरिक्त अमेरिका के डेयरी उद्योग पर भी बहुत बड़ी साधन-संपन्न कंपनियां हावी हैं और वहां डेयरी किसानों/उद्योग को सरकार से सब्सिडी भी मिलती है। ऐसे में अमेरिका से सस्ते डेयरी उत्पादों के आयात से भारत के डेयरी उत्पादकों को बहुत क्षति होगी।
इसके अलावा अमेरिका में दूध-उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘जीएम’ ग्रोथ-हार्मोन का उपयोग होता है। ऐसे में भारतीय उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचेगा। मुर्गीपालन के उत्पादों के निर्यात बढ़ाने में भी अमेरिका की बहुत रुचि है।
इससे स्थानीय उत्पादकों का बाजार प्रभावित होगा। चूंकि अमेरिका के फार्म व कंपनियां अधिक साधन-संपन्न हैं, और उन्हें सरकारी सब्सिडी मिलती है, अतः विकासशील देशों के उत्पादक उनके सामने टिक नहीं सकते।
इन सब स्थितियों व संभावनाओं पर अभी से चिंतन-मनन आवश्यक है, ताकि समझौते में इन सभी खतरों को दूर रखने की समुचित तैयारी हो सके। सरकार को चाहिए कि इस व्यापार समझौते से जुड़े कार्य पारदर्शिता के माहौल में करे, ताकि इस बारे में प्रमाणिक जानकारी के आधार पर एक खुली बहस हो सके। (सप्रेस)