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कांग्रेस के हाथ से निकलता वक्त

Tue, 21 Feb 2017 07:32 PM IST
रशीद किदवई
रशीद किदवई Updated Tue, 21 Feb 2017 07:32 PM IST
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Time out from the hands of Congress
रशीद किदवई

जिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनमें से गोवा, पंजाब और उत्तराखंड में मतदान हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में अभी चार और चरणों के साथ ही मणिपुर में भी मतदान होना बाकी है। इन चुनावों के कांग्रेस पार्टी, खासतौर से इसके राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी के लिए क्या मायने हैं? देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के लिए ये चुनाव अपना खोए आधार में से कुछ हिस्सा हासिल करने का अवसर साबित हो सकते हैं।

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उत्तर प्रदेश में यदि नाकामयाबी मिलती है, तब तो राहुल गांधी पार्टी के भीतर ही मजाक का विषय बन जाएंगे, क्योंकि वैसे भी ऐसे कांग्रेस नेताओं की कमी नहीं है जो समाजवादी पार्टी के साथ हुए गठबंधन के पक्ष में नहीं थे।
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1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने एक वोट से विश्वास मत खो दिया था, तब मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी को भरोसा दिलाया था कि वह उनकी अगुआई वाली संभावित सरकार का समर्थन करेंगे। तब विश्वास से भरी सोनिया ने टीवी कैमरों के सामने कहा था कि उन्हें लोकसभा में बहुमत के लिए जरूरी 272 सांसदों का समर्थन हासिल है, मगर ऐन वक्त पर मुलायम पलट गए थे। नौ साल पहले जब भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार को सदन में विश्वास मत हासिल करना पड़ा था, तब मुलायम ने ही उसकी नैया पार लगाई थी। मगर इसके बाद जब 2009 में लोकसभा चुनाव हुए थे, तब कांग्रेस और सपा के बीच सीटों को लेकर समझौता नहीं हो सका था। मौजूदा विधानसभा चुनाव के लिए जब दोनों पार्टियों में गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला हुआ, तब 1990 के जख्म हरे हो गए, जब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राजीव गांधी ने मुलायम की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। जनता परिवार में बिखराव के बाद मुलायम मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। कांग्रेस में कई लोग मानते हैं कि राजीव के इस कदम ने उत्तर प्रदेश में पार्टी की गिरावट में अहम भूमिका निभाई। जनता दल में हुई टूट से 425 सीटों वाली तत्कालीन विधानसभा में मुलायम सरकार के पास सिर्फ 121 विधायकों का समर्थन रह गया था। तब राजीव ने गुलाम नबी आजाद और नारायण दत्त तिवारी की सलाह पर कांग्रेस के 94 विधायकों से मुलायम का समर्थन करने के लिए कहा था। 1989 तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का समर्थन करने वाले तीन स्तंभ थे, ब्राह्मण, दलित और मुसलमान। इन तीनों की संख्या जोड़ दी जाए, तो ये सूबे के कुल मतदाताओं के आधे के बराबर हैं। मगर मंडल आयोग की सिफारिशों से पैदा हुई उथल-पुथल और अयोध्या के मंदिर विवाद ने पार्टी के पैरों के नीचे से उसका आधार खिसका दिया। मुसलमान मुलायम के साथ चले गए, दलित बहुजन समाज पार्टी के साथ और ऊंची जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ।
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सपा-कांग्रेस गठबंधन यदि उत्तर प्रदेश में जीत हासिल करता है, तो इससे राहुल को नई ताकत मिलेगी। दो युवा नेताओं का आभामंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मजबूत चुनौती बन जाएगा। वास्तव में जींस पहनने वाले स्मार्टफोनधारी यह जोड़ी टीवी कैमरों के लिए एकदम मुफीद है। चूंकि राहुल अभी सत्ता से सीधे जुड़े नहीं हैं, लिहाजा उत्तर प्रदेश से बाहर अखिलेश के उभार के बावजूद दोनों के बीच टकराव की संभावना नहीं होगी।

वास्तव में यदि 2019 में देश में राज करने का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरेगा, तो मोदी विरोध का रास्ता पंजाब से होकर गुजरेगा। असल में पंजाब में जो भी पार्टी बादल परिवार से सत्ता हासिल करने में सफल होगी, विश्वसनीय विपक्ष के रूप में उसे उभरने से कोई नहीं रोक सकेगा। यदि वहां कांग्रेस जीतती है, तब तो इसका श्रेय राहुल के नेतृत्व और कैप्टन अमरिंदर सिंह पर जताए गए उनके भरोसे को दिया जाएगा। कहा जाएगा कि राहुल ने जो कदम उठाया, यह उसका फल है। यदि वहां आम आदमी पार्टी विजेता बनती है, तब तो अरविंद केजरीवाल यह साबित कर देंगे कि मोदी को वही चुनौती दे सकते हैं।

पंजाब और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस यदि नाकाम भी हो जाती है, तब भी राहुल की पार्टी अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। मगर इससे उनकी विश्वसनीयता पर जरूर भारी असर पड़ेगा और यह कहा जाएगा कि वह भाजपा को चुनौती देने में सक्षम नहीं हैं।

1998 के बाद सोनिया गांधी पहली बार राज्य विधानसभा के चुनाव में दस जनपथ से बाहर नहीं निकल रही हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच हुए गठबंधन को अंजाम तक पहुंचाने में सोनिया ने मदद की है। उनके पास यह देखने का अवसर है कि किस तरह राहुल उनके बिना पांच राज्यों-उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर के विधानसभा चुनावों में पार्टी को कहां तक ले जाते हैं। असल में लंबे समय से कांग्रेस के भीतर राहुल को सोनिया की जगह अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा हो रही है। यदि राहुल इन चुनावों में कांग्रेस को सम्मानजनक जीत दिलाने में सफल होते है, तो उससे सोनिया को जिम्मेदारियों से मुक्त होने में आसानी होगी और यह बदलाव जल्द दिखेगा।


जहां तक प्रियंका की बात है, तो इस बार भी काफी चर्चा थी कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के जरिये वह सक्रिय राजनीति में औपचारिक रूप से प्रवेश करेंगी, मगर उन्होंने खुद को अभी तक राहुल के साथ पारिवारिक क्षेत्र में संयुक्त प्रचार करने तक ही सीमित रखा है। हालांकि यह कहा जा रहा था कि इस बार वह डिंपल यादव के साथ एक मंच में नजर आ सकती हैं। वास्तव में प्रियंका को लेकर खबरें दस जनपथ या खुद प्रियंका की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से आती रही हैं। यह भी कहा जाता है कि प्रियंका राहुल को सफल होते देखना चाहती हैं। क्या वाकई ऐसा होगा? यदि ऐसा नहीं होता है, तब एक बार फिर कांग्रेस के भीतर से प्रियंका लाओ की मुहिम शुरू हो सकती है।

- लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 24 अकबर रोड के लेखक हैं

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