विकल्पहीनता का समय
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इस देश का चरित्र खो गया है। यों समझिए कि दूध में अब दूध ही नहीं है। एक वक्त था कि गरीब आदमी, जिसके पास पैसे नहीं होते थे, वह चोरी करता था। छोटी-मोटी चोरी। दो सौ, ढाई सौ रुपये की चोरी। किसी की घड़ी चुरा ली। किसी का पर्स मार लिया। फिर वह पकड़ा जाता था। उसकी हालत पता लगती थी, तो मालूम होता था कि वह भूखा मर रहा था। जैसे फिल्म दीवार में वह बच्चा ब्रेड चुराकर भागा था। वह उनकी मजबूरी होती थी, जो अपनी मासूमियत में समझते थे कि अपराध करके भी बच जाएंगे। अब तो बड़े लोग चोरी कर रहे हैं, जिनके पास करोड़ों रुपये हैं! जिनके पास इतना पैसा है कि खुद उन्हें अंदाजा नहीं है। हमने कभी यह बात नहीं सुनी थी कि एक आदमी के पास करोड़ों रुपये हैं और उसका पेट नहीं भर रहा है। वह चोरी कर रहा है। घोटाले कर रहा है। इसलिए मैं कह रहा हूं कि अब कैरेक्टर नहीं रहा। चरित्र का हनन हो चुका है।
आज राजनेता भ्रष्ट हैं, अफसर भ्रष्ट हैं, पुलिस भ्रष्ट है। दुखद है कि यही बात अब आम आदमी में भी आ गई है। उसे जब मौका मिलता है, वह चोरी कर लेता है। हमें लगता जरूर है कि कुछ लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन उनका अपना एजेंडा है। वे सत्ता में पहुंचकर यही काम करने लगते हैं। गौर से देखें, तो उनका सिर्फ एक मकसद होता है कि जो कुर्सी पर हैं, उन्हें हटाकर खुद बैठ जाओ। बैठकर वे क्या करते हैं? वही, जो पहले के लोग कर रहे थे। इस देश की जनता का अब तक का अनुभव यही है। पुराने गए, तो नए आकर भी पुराने लोगों जैसे काम करने लगे।
इस देश के राष्ट्रीय चरित्र पर कभी मुझे बहुत गर्व था। वह चरित्र अब दिखता ही नहीं है। फिलहाल मुझे फलक पर ऐसा कोई सितारा, कोई लीडर नजर नहीं आता है, जिससे उम्मीद लगाई जा सके। फिर कोई आदमी अगर अकेला आ भी जाए, तो वह करेगा क्या? दूसरे लोग उसे कुछ करने देंगे? बड़ी मुश्किल है। अगर कोई कट्टर व्यक्ति आएगा, तो उसे दुनिया खारिज कर देगी। अगर कोई उदार आ गया, तो उसे कट्टर लोग नहीं रहने देंगे। यह ‘कैच ट्वेंटी टू सिचुएशन’ है।
इस दुनिया में जब भी कोई परिवर्तन आया है, तो केवल एक आदमी के कारण। परिवर्तन के दौर में पूरी दुनिया एक आदमी के पीछे चली है। चाहे वह बुद्ध रहे हों, ईसा मसीह रहे हों या फिर पैगंबर मोहम्मद। बाद में महात्मा गांधी और माओत्से तुंग आए। गांधीजी को गुजरे आज साठ साल से ऊपर हो चुके हैं, दुनिया की इतनी बड़ी आबादी में हम एक आदमी भी उनके जैसा पैदा नहीं कर सके। ऐसा आदमी जिसके कुछ उसूल हों, जिसके पीछे लोग चलें, जिसके कहने पर मरने को तैयार हो जाएं। राजनीतिक पार्टियों और कमेटियों से दुनिया और समाज में कुछ नहीं बदलता। जो हलचल होती है, वह बहुत सतही होती है। तब मैं कैसे मान लूं कि ये लोग कुछ बदलेंगे। मेरा पक्का विश्वास है कि परिवर्तन केवल एक आदमी लाता है और इस वक्त वह क्षितिज पर नहीं है।
भीड़ में आदमी का साया तक गुम हो जाता है। इस समय यही हालात हैं। कहीं उम्मीद नजर नहीं आ रही। ऐसा लगता है, मानो अंधेरे का घना कोहरा पसरा है। पूरी दुनिया में कहीं कोई आदमी नहीं दिख रहा, जो बदलाव ला सके। वास्तव में यह बहुत ही भयावह दृश्य है। भ्रष्टाचार, चोरी और घूस हमारी व्यवस्था का अंग बन चुके हैं। हिंदुस्तान में बेईमान आदमी की परिभाषा बदल चुकी है। आज कहा जाता है कि पैसे तो सब खाते हैं, लेकिन बेईमान आदमी वह है, जो पैसे लेकर भी काम नहीं करता। इस देश में आज 75 साल का होने के बाद मुझे यह परिभाषा मिली है। जबकि मैं पहले समझता था कि जितना मुझे मिलना था, मिल चुका है।
आज पैसे पर लोगों का गजब ईमान आया है! यह मैं नहीं कह रहा हूं, यह तो शास्त्रों में लिखा है। कलियुग में यही होने वाला था। इसका स्तर यह है कि आज गांवों तक में भ्रष्टाचार पहुंच गया है। हम ग्राम स्वराज की बात करते हैं। वहां पर आप सरपंच या किसी बाबू से बगैर पैसे के किसी काम के कागज पर दस्तख्त लेकर दिखाइए। गांव वाले को समझा जाता था कि वह बहुत सीधा-सादा होता है। लेकिन पंचायत राज की हकीकत बहुत अलग है। यहां पैसे से लेकर पानी तक की चोरी चल रही है। उन्हें न गांव में स्कूल खोलने में दिलचस्पी है और न ही अस्पताल खोलने में। उनकी दिलचस्पी है, सिर्फ अपनी जेब भरने में। ऐसी तरक्की से, जिसमें सबका भला होता हो, उन्हें तकलीफ होती है। वे केवल खुद का भला चाहते हैं।
जहां तक राजनीतिक दलों की बात है, तो बहुत आश्चर्य होता है कि आज हमारे पास सच्चे विकल्प नहीं हैं। बार-बार वही पार्टियां और वही चेहरे हमारे सामने आते हैं। चुनावों में चेहरा तो बदल जाता है, लेकिन उसका चरित्र वही बना रहता है। यह विचित्र विकल्पहीनता का दौर है। सबकुछ सिर्फ पैसे के लिए हो रहा है। लेकिन अंत में मैं आपको फिल्म त्रिशूल का एक डायलॉग याद दिलाता हूं। बाप से बेटा कहता है, ‘जिस पैसे के लिए आपने मेरी मां को छोड़ा था, आज उसी पैसे ने आपको छोड़ दिया। दुनिया में आज आपसे बड़ा कंगाल नहीं है कोई।’ मैं यह नहीं कहता कि कोई मेरी बातों से सहमत हों। आखिर कोई अपने भ्रम में रहना चाहता है, तो वह निर्विरोध रह सकता है। और अगर किसी को यह लगता है कि एक दिन सफेद घोड़े पर बैठकर कोई राजकुमार आएगा और सब कुछ ठीक हो जाएगा, तो उसे यह सपना देखने का भी हक है।