{"_id":"65ac7db45cf0a9fc73001f87","slug":"time-machine-history-of-suez-canal-and-connection-with-napoleon-attack-on-egypt-2024-01-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"टाइम मशीन: स्वेज नहर की कहानी से कुछ इस तरह जुड़ा है नेपोलियन का नाम","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
टाइम मशीन: स्वेज नहर की कहानी से कुछ इस तरह जुड़ा है नेपोलियन का नाम
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
Suez Canal
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
इतिहास बोलता है कि 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश हुकूमत भूमध्य सागर को फारस की खाड़ी से जोड़ने का एक रास्ता बनाना चाहती थी। बर्तानवी सेना के अधिकारी फ्रांसिस रॉडन चेस्ने की इस योजना के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट ने बाकायदा बजट को मंजूरी दी थी। तब स्वेज नहर की तामीर नहीं हुई थी। चेस्ने की योजना तो परवान नहीं चढ़ी, मगर स्वेज साकार हो गई। विश्व की सबसे अनोखी मानव निर्मित नहर से यूरोप को भारत और एशिया से जोड़ने का रास्ता खुला। लाल सागर के रास्ते और स्वेज पर बन रहे इतिहास के नए अध्याय से पहले तक इस समुद्री रास्ते से हर साल करीब 18,000 जहाज गुजरते थे। स्वेज विश्व व्यापार की प्रमुख धमनी है, जिसके बंद होने से अब जहाज अफ्रीका की परिक्रमा करते हुए उस पुराने और लंबे रास्ते से जा रहे हैं, जहां केप ऑफ गुड होप में अटलांटिक और हिंद महासागर मिलते हैं। इस रास्ते से वास्कोिडगामा भारत आया था।स्वेज और रेड सी जैसा इतिहास दुनिया के किसी भूगोल के पास नहीं है। इजिप्ट के 12वें फराओ सेन्यूसिरेट ने ईसा से करीब 1,800 साल यहां एक समुद्री नहर की बुनियाद रखी थी। फराओ पूर्व और पश्चिम को व्यापार के लिए जोड़ना चाहते थे। इस पुरानी नहर के प्रमाण आज भी स्वेज शहर के पास मौजूद हैं। बाद के दशकों में बालू जमने से यह नहर बंद हो गई।
ईसा पूर्व 285 में टॉलेमी सेकेंड ने नहर की रेत साफ कराई और व्यापार मार्ग फिर चल पड़ा। लेकिन सन 400 में बायजेंटइन शासकों ने इस मार्ग को फिर भुला दिया। रेत जमने से नहर बंद हो गई। सन 641 में अमर इब्न अल एसा ने नहर खोली। भूमध्य सागर व लाल सागर के बीच आवाजाही शुरू हो गई। सन 760 में अब्बासीद खलीफा अबू जफर अल मंसूर ने नहर बंद कर दी। इसमें रेत भर दी गई। इसके बाद अगले 1,100 सालों तक भूमध्य सागर से लाल सागर के बीच कारोबार जमीनी रास्तों से हुआ।
इतने रोमांचक किस्से हैं इस भूगोल के पास कि नेटफ्लिक्स के धारावाहिक बन सकते हैं। तो आइए बैठिए टाइम मशीन में। हम आपको ले चलते हैं एक ऐसे दौर में, जहां आप मिलेंगे दुनिया की सबसे अनोखी कंपनी से, विश्व के सबसे अजीबोगरीब अधिग्रहण से, इतिहास को बदलने वाले एक युद्ध से और ऐसे प्रधानमंत्री से, जिसकी वजह से ब्रिटेन की ताकत हमेशा के लिए डूब गई।
हम टाइम मशीन में अपनी यात्रा शुरू करते हैं।... और लीजिए यह टाइम मशीन आपको 1798 में ले आई। यह इजिप्ट पर नेपोलियन के हमले का दौर है। फ्रांस को भूमध्य सागर के इलाके में ब्रिटेन का दबदबा तोड़ना था। दूसरा निशाना था भारत के साथ ब्रिटेन का कारोबार, जिस पर नेपोलियन कब्जा करना चाहता था। बर्तानवी नौसेना से हार, प्लेग से बीमार फौज और फ्रांस से मदद मिलने में देरी के कारण नेपोलियन का मध्य पूर्व अभियान हादसा बनकर इतिहास में दर्ज हो गया। अलबत्ता उसके साथ आए थे वैज्ञानिक और इंजीनियर, जिन्होंने भूमध्य सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाले रास्ते की एक बुनियादी पैमाइश कर ली थी। एक नहर जैसा कुछ बनाने की तैयारी थी नेपोलियन की, जो बनी तो, मगर कुछ अजीबोगरीब ढंग से।
मगर असली रोमांच तो अब आएगा, आप मिलेंगे फिर्डनांड डे लेस्पस से। इस डिप्लोमेट ने अलेक्जेंड्रिया में तैनाती के दौरान स्वेज को लेकर नेपोलियन के इंजीनियरों की योजना का अध्ययन किया था। नवंबर, 1854 में उन्होंने इजिप्ट के वायसराय सईद पाशा से स्वेज के संकरे समुद्री रास्ते को खोदने की इजाजत ले ली। अब भूमध्य व लाल सागर को जोड़ने वाला रास्ता बनने वाला था। लेस्पस ने एक अनोखी कंपनी बनवा दी, जिसका नाम था यूनिवर्सल कंपनी ऑफ मैरीटाइम कैनाल ऑफ स्वेज। इस कंपनी का मालिक अकेला इजिप्ट नहीं था, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया और रूस भी हिस्सेदार थे।
बाद में इन देशों का हिस्सा इजिप्ट ने खरीद लिया था। दस साल बाद 18 अगस्त, 1869 को भूमध्यसागर और लाल सागर का मिलन हुआ। अब टाइम मशीन हमें 1875 में ले आई है, जहां इस भूगोल का यह हिस्सा एक अजीब इतिहास से मुखातिब होता है। हुआ यूं कि इजिप्ट के वायसराय इस्माइल पाशा की हुकूमत आर्थिक मुसीबतों में घिर गई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरेली को मौका मिला। उन्होंने स्वेज कंपनी में एक तरह से अधिग्रहण कर लिया। फिर इजिप्ट में बगावत हो गई। इजिप्ट और उसकी स्वेज कंपनी अब ब्रिटेन की थी। ब्रिटेन ने नहर में आवाजाही रोक दी। यूरोप के देशों का कारोबार टूटने लगा। लंबी जद्दोजहद के बाद 1882 में कांस्टेनोपल समझौता हुआ। इसके बाद स्वेज को दोबारा खोला गया।
टाइम मशीन अब और आगे आती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद से आजादी की लहरें उठ रही थीं। 1951 में इजिप्ट ने भी ब्रिटेन के सैन्य जमावड़े का विरोध करना शुरू कर दिया था। ब्रिटेन को इजिप्ट की पुलिस बगावतियों की मदद का शक था। जनवरी, 1952 में ब्रिटिश फौज ने इस्माइलिया में इजिप्ट पुलिस की बैरक पर धावा बोल दिया। जुलाई, 1952 में इजिप्ट के सुल्तान फारूक के खिलाफ बगावत हो गई। रिवोल्यूशनरी कमांड काउंसिल ने सत्ता संभाल ली। यह पार्टी स्वेज पर ब्रिटिश नियंत्रण के खिलाफ थी। वर्ष 1956 तक ब्रिटेन ने भी इजिप्ट से सैन्य वापसी शुरू कर दी।
इस बीच इजिप्ट क्रांति की चौथी बरसी आई और जुलाई, 1956 में पूरी दुनिया को चौंकाते हुए राष्ट्रपति अब्दुल गमाल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। स्वेज को संभालने वाली ब्रिटिश फ्रेंच कंपनी अब फिर इजिप्ट की हो गई। सर रॉबर्ट एंथनी ईडन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अचानक इजिप्ट के खिलाफ ऑपरेशन मस्कीटियर्स का एलान कर दिया।
नवंबर, 1956 में ब्रिटेन ने फ्रांस और इस्राइल के साथ इजिप्ट पर हमला कर दिया। ब्रिटिश और फ्रेंच एयरफोर्स ने पोर्ट सईद पर कब्जा कर लिया। मित्र सेना के पैराट्रूपर्स ने स्वेज के आसपास बड़ा मोर्चा बांध दिया। लगे हाथ इस्राइल ने सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा कर लिया। दुनिया दहल उठी। इसे नए उपनिवेशवाद की शुरुआत माना गया। एंथनी इडेन के दुस्साहस से ब्रिटेन की वह बुरी गत बनी कि पुराना मित्र अमेरिका भी ब्रिटेन पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी देने लगा।
टाइम मशीन में आपको पता ही चल गया होगा कि इस वक्त तक संयुक्त राष्ट्र संघ ने ब्रिटेन पर प्रतिबंधों का मसौदा बना लिया था। बाजारों में कोहराम मच गया। ब्रिटिश पाउंड बुरी तरह टूट गया। ब्रिटेन का विदेशी मुद्रा भंडार घटने लगा। इधर अमेरिका के राष्ट्रपति आइजनहावर ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को ब्रिटेन की सहायता से रोक दिया। अंतत: सात नवंबर, 1956 को प्रधानमंत्री एंथनी ईडन ने घुटने टेक दिए। संयुक्त राष्ट्र संघ का शांति समझौता लागू हुआ। आैर नौ जनवरी, 1957 को एंथनी ईडन ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन इस अभिशप्त नहर स्वेज ने महाशक्ति के तौर पर ब्रिटेन का आभामंडल खत्म कर दिया।
टाइम मशीन अब लाल सागर के तट पर उतर रही है। कहने वालों को कौन रोक सकता है, जो कह रहे हैं कि स्वेज इस बार अमेरिका के आभामंडल की बलि मांग रही है।
मिलते हैं अगली यात्रा पर।
Napoleon period attack on Egypt